बढ़ना
लड़की आगे बढ़ती है और
उसके पीछे छूट गया बहुत कुछ
चलता है उसके साथ-साथ
वह आगे बढ़ती है और बढ़ने के इस क्रम में
नहीं भूल पाती पीछे छूटे हुए को
लड़की चलते-चलते रुक जाती है और
दम साधे सुनने लगती है
पीछे छूट गए अपने इतिहास के कदमों की आहट
जो आज भी बिना किसी आवाज के
चला आ रहा है उसके पीछे-पीछे।
स्त्री: तीन कविताएं
(एक)
उन्हें पसंद है रोती हुई स्त्री
दुख की चादर लपेटे खुद में ही खोई
स्त्री आकर्षित करती है उन्हें
आकर्षित करता है उस स्त्री का दुख
उसका अकेलापन
उसकी नम-सी दिखती आंखों के राज
भिगो देते हैं उन्हें भीतर से और
वे उससे प्रेम करने लगते हैं
वे परखने लगते हैं अपने कंधों की मजबूती
कि जिन्हें बढ़ाना है उन्हें चुप-सी खड़ी स्त्री के लिए
स्त्री को उदास देख कल्पनाएं फड़फड़ाने
लगती हैं पंख
और वे महाकाव्य रच डालना चाहते हैं उसकी
उदास आंखों पर
वे कल्पना करने लगते हैं ऐसे पलों की
जिसमें हो एक कमजोर-सी स्त्री और
वे सुना रहे हों उसे अपनी कविता के कोमल हिस्से
बेहद एकांत क्षणों में।
(दो)
स्त्री मुस्कुराती है और असहज होने लगती है दुनिया
स्त्री मुस्कुरा रही है और
थम-थम कर चलती दुनिया में
गति आ गई है।
(तीन)
वह स्त्री जिसकी उम्र चालीस के करीब है
जिसके हंसी के ठहाकों से छिप गई हैं
गालों पर पड़ती उम्र की लकीरें
जिसकी आंखों में देखा जा सकता है
समुद्र के उफान का सौंदर्य
उसने भुला दी है अपनी उम्र और
हंस रही है मन भर
वह स्त्री हंसती है
और दिखाई देता है उसकी हंसी के भीतर
पूरा ब्रह्मांड उलटता हुआ।
यह एक दृश्य है जिसमें लड़की पियानो बजा रही है
उसके चेहरे पर मुस्कान है और
आंखें लगभग मुंदी सी
पियानो बजाती वह लड़की पियानो बजा रही है
या कि लीन है समाधि में
उसकी उंगलियों ने छेड़ी है कोई धुन
जो पियानो के की-बोर्ड से नहीं उठती
वह आ रही है उस साज से
जो बज रहा है इस पल उस लड़की के भीतर कहीं
जिसकी सरगम को पढ़ा जा सकता है
उसकी मुंदी आंखों और मुस्कान की संधि में। ०
