रामप्रकाश कुशवाहा
मैं पूरी दुनिया को अपने घर में बदल देना चाहता हूं
आत्मीयता के एक सुखद पर्यावरण के रूप में
दुनिया में अपनी साझी उपस्थिति के साझे संविधान के साथ
प्रक्रिया और परिणति की असहमति के बावजूद
अतीत के संवेदना-पुरुषों की तरह
एक वृहत्तर ‘स्व’ की खोज में…
अपनी अस्मिता की खोज की यात्रा के साथ
अपने आखिरी गंतव्य के
उद्गम-पल की खोज में
वापस लौट जाना चाहता हूं मैं
अफ्रीका के उस आदि-मानव के कुल में
चूमते हुए दुनिया की सारी बंदर-प्रजाति को
आगे और आगे सभी स्तनपायियों और
बहु-कोशकीय दुनिया को पार करता हुआ
समा जाना चाहता हूं उस आदिम अकेली
बीज कोशिका में
जिसके हम सब वंश-विस्तार हैं…
मैं मानता हूं कि परमाणुओं के गुण-धर्म, पसंद-नापसंद
रुचि-अरुचि और स्वभाव से ही हुई है
अचेतन भौतिक पदार्थों से सचेतन जीवन-जगत की रचना
और यह कि सभी का सक्रिय गुणात्मक व्यवहार ही
इस सृष्टि की रचना का रहस्य है…
मैं मानव-जाति के सबसे प्यारे बच्चों के
उन सुंदर सपनों को फिर से साकार देखना चाहता हूं
जैसा कि भारत में दो मांओं के पुत्र पौराणिक कृष्ण ने
वसुधैव कुटुंबकम के रूप में तो
अरब में अनाथ बच्चे मुहम्मद ने
सारी दुनिया को एक ही कबीले के रूप में
बदल देने के लिए देखा था
जैसा देखा था यीशु मसीह ने
सारी दुनिया के पवित्रतम शिशु के रूप में
मैं भी सारी मानव-जाति को
अपने ही अस्तित्व के पूरक विस्तार के रूप में
अपने ही अभिन्न परिवार के रूप में
पुन: पाना और जीना चाहता हूं…
मुझे संकीर्णताएं अश्लील लगती हैं
और खंडित अस्मिताएं पागलपन
मेरी दृष्टि में दुनिया के सारे क्षुद्रताजीवी मूर्ख हैं
मैं जानता हूं और एक बार फिर
पाना और जीना चाहता हूं
अपने पुरखों को कभी मिला और अब खोया हुआ-सा
अपना ‘दुनिया-घर’!
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