काजी नजरुल इस्लाम धार्मिक कट्टरता के सख्त विरोधी थे। वे कवि, संगीतज्ञ और स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने बांग्ला साहित्य को नई पहचान दिलाई। हमेशा से सत्ता के विरोध में लिखने वाले नजरुल इस्लाम को विद्रोही कवि के रूप में भी जाना जाता है।

व्यक्तिगत जीवन

नजरुल इस्लाम का जन्म पश्चिम बंगाल के आसनसोल में चुरुलिया गांव के एक गरीब मुसलमान परिवार में हुआ था। नजरुल इस्लाम के पिता काजी फकीर अहमद एक मस्जिद के इमाम थे। नजरुल इस्लाम बचपन में अक्सर बीमार रहते थे, इसलिए परिवार के लोग उन्हें दुक्खू मियां कहने लगे थे। उन्होंने एक हिंदू लड़की प्रमिला से शादी की थी।

शिक्षा

काजी नजरुल इस्लाम की शुरुआती शिक्षा मस्जिद के मदरसे में हुई। जब वे दस वर्ष के थे तभी उनके पिता की मौत हो गई थी। उसके बाद परिवार की देखभाल नजरुल की जिम्मेदारी बन गई। वे पिता की जगह मस्जिद में केयरटेकर के रूप में काम करने लगे। उन्होंने संगीत और साहित्य में रुचि दिखाई। इसी रुचि के कारण वे अपने चाचा फजले करीम की संगीत मंडली में शामिल हो गए। इस दौरान उन्होंने बांग्ला और संस्कृत भाषा सीखी। उन्होंने कई हिंदू पौराणिक कथाओं पर आधारित नाटक लिखे, जिनमें ‘शकुनी वध’, ‘युधिष्ठिर का गीत’, ‘दाता कर्ण’ शामिल हैं।

कराची रेजिमेंट में

नजरुल ने 1917 में पढ़ाई छोड़ दी और ‘डबल कंपनी’ नामक रेजिमेंट में शामिल हो गए। वहां से उन्हें उत्तर-पश्चिम सीमा के नौशेरा में भेज दिया गया। उसके बाद नजरुल और उनकी रेजिमेंट को कराची भेज दिया गया। कराची कैंट में नजरुल के पास ज्यादा काम नहीं था। इस बीच उन्होंने रवींद्रनाथ ठाकुर, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, रूमी और उमर खय्याम को पढ़ा। उनसे प्रेरणा लेते हुए नजरुल ने 1919 में अपनी पहली किताब लिखी- ‘एक आवारा की जिंदगी’। उसके बाद उनकी पहली कविता मुक्ति छपी।

कलकत्ता वापसी

प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1920 में बंगाल रेजिमेंट को भंग कर दिया गया। वे वापस कलकत्ता आ गए और यहां आकर वे ‘मुसलमान साहित्य समिति’ और ‘मुसलिम भारत’ के कार्यालय में ठहरे। यहीं रह कर उन्होंने अपना पहला उपन्यास ‘बंधन हारा’ लिखा। ‘मुस्लिम भारत’ के प्रथम अंक से ही उनका उपन्यास धारावाहिक रूप में छपने लगा। देशबंधु चित्तरंजन दास के एक बंगाली साप्ताहिक ‘बांग्लार कथा’ में उन्होंने उस समय का अमर क्रांतिकारी गीत लिखा। इस कविता ने देश की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे क्रांतिकारियों में नया जोश भर दिया।

विद्रोही कवि

नजरुल देश की आजादी के लिए लिख रहे थे। 1922 में उनका काव्य संग्रह ‘अग्निवीणा’ प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक ने उन्हें रातोरात क्रांतिकारियों का प्रेरणास्रोत बना दिया। इस संग्रह की सबसे प्रसिद्ध कविता ‘विद्रोही’ थी। उसके बाद नजरुल अंग्रेजों को खटकने लगे, पर जनता के बीच विद्रोही कवि के रूप में उभरे।

एकता के पक्षधर

नजरुल सांप्रदायिक सद्भाव पर जोर देते थे। उनका मानना था कि भारत तभी आजाद हो सकता है जब परस्पर सांप्रदायिक सौहार्द की भावना हो। वे अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति से चिंतित थे। उनका मानना था कि ब्रिटिश हुकूमत हिंदू और मुसलमानों के बीच फूट डाल रही है। इस स्थिति को देखते हुए उन्होंने अप्रैल 1926 में एक गीत लिखा, उसका संगीत भी खुद तैयार किया और अविभाजित बंगाल के कृष्णानगर में कांग्रेस अधिवेशन में खुद गाया।

सम्मान

कलकत्ता विश्वविद्यालय ने बांग्ला साहित्य में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए 1945 में तत्कालीन सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित किया। स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म भूषण’ और बांग्लादेश सरकार ने उन्हें ‘महाकवि’ के रूप में सम्मानित किया। अगस्त, 1976 में उनका निधन हो गया।