वंदे मातरम, सुजलाम् सुफलाम् मलयज शीतलाम् शस्यश्यामलाम् मातरम्।…’ यानी भारत का राष्ट्रगीत। इस गीत की रचना प्रख्यात बांग्ला रचनाकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, प्यारीचांद मित्र, माइकेल मधुसूदन दत्त, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, रवींद्रनाथ ठाकुर आदि उन्नीसवीं सदी के साहित्यकार थे, जिन्होंने बांग्ला साहित्य को पहचान दिलाई। इन लेखकों से पहले के साहित्यकार बांग्ला की जगह संस्कृत या अंग्रेजी में लिखना पसंद करते थे। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय पहले साहित्यकार थे, जिन्होंने लोगों के मन को छुआ था। उनका जन्म कलकत्ता के निकट कंथलपाड़ा के एक गांव में हुआ था।

प्रारंभिक शिक्षा

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के पिता यादवचंद्र चट्टोपाध्याय बंगाल के मिदनापुर जिले के डिप्टी कलेक्टर थे। इसलिए उनकी प्रारंभिक शिक्षा वहीं हुई। उसके बाद की शिक्षा हुगली कॉलेज और प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता में हुई। 1858 में उन्होंने स्नातक किया और 1869 में कानून की डिग्री हासिल की। बंकिमचंद्र इतने प्रतिभाशाली थे कि बीए करने के बाद डिप्टी मजिस्ट्रेट के पद पर नियुक्त हो गए। वे कुछ समय तक बंगाल सरकार के सचिव पद पर भी रहे। रायबहादुर और सीआइई की उपाधियां भी पार्इं।

साहित्य से आजादी का अलख

बंकिमचंद्र के अंदर ब्रिटिश शासन की क्रूरता को खत्म करने का जुनून था। उन्होंने सरकारी नौकरी में रहते हुए 1857 का गदर देखा था, जिसमें शासन प्रणाली में बदलाव किए गए थे। शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से महारानी विक्टोरिया के हाथों में आ गया था। बंकिम सरकारी नौकरी की वजह से किसी सार्वजनिक आंदोलन में भाग नहीं ले सकते थे। लेकिन उनके अंदर गुस्सा उबल रहा था। वे देश को जागरूक करना चाहते थे और उन्होंने यह जागरूकता साहित्य द्वारा लाने की कोशिश की।

प्रमुख रचनाएं

उन्होंने अपना पहला उपन्यास ‘रायमोहन्स वाईफ’ अंग्रेजी में लिखा था। उसके बाद उन्होंने 1865 में ‘दुर्गेश नंदिनी’ नाम से पहला बंगाली उपन्यास लिखा। फिर उन्होंने ‘कपालकुंडला’, ‘मृणालिनी’, ‘विषवृक्ष’, ‘चंद्रशेखर’, ‘कृष्ण कांतेर विल’, ‘देवी चौधुरानी’, ‘सीताराम’, ‘कमला कांतेर दफ्तर’, ‘विज्ञान रहस्य’, ‘लोकरहस्य’, ‘धर्मतत्त्व’ जैसे ग्रंथ लिखे। ‘आनंदमठ’ उनका सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है, जिसमें वंदे मातरम् गीत भी है, जो अब देश का राष्ट्रगीत है। इन ग्रंथों में उन्होंने वैचारिक स्तर पर नए प्रयोग किए।

राष्ट्रवादी विचारों के पोषक

वह अंग्रेजों से आजादी का दौर था। आजादी के लिए देश में राष्ट्रवाद की भावना को उभारा जा रहा था। बंकिमचंद्र ने अपने साहित्य से राष्ट्रवादी विचारों का अलख जगाया। इसके लिए उन्होंने 1872 में ‘बंगदर्शन’ पत्रिका शुरू की। इस पत्रिका से उन्हें बड़ी लोकप्रियता मिली। इस पत्रिका की वजह से नए लेखकों को भी मौका मिला। बंकिमचंद्र ने जो भी लिखा उसका प्रभाव केवल आजादी तक नहीं, बल्कि उसके बाद भी चलता रहा।

गुरु बंकिम

‘बंकिम बांग्ला लेखकों के गुरु और बांग्ला पाठकों के मित्र हैं।’ यह वाक्य रवींद्रनाथ ठाकुर ने लिखे थे। बंकिम ने मात्र सत्ताईस साल की उम्र में ‘दुर्गेश नंदिनी’ नाम का उपन्यास लिखा था। इससे साहित्य में उनकी धाक जम गई। उन्होंने जब साहित्य के क्षेत्र में प्रवेश किया, तब कहानी और कविताएं कम ही लिखी जाती थीं। इसलिए उन्होंने इसी विधा को पकड़ा और कुछ समय बाद इस दिशा के पथ-प्रदर्शक बन गए।

उनके साहित्यिक पत्र ‘बंगदर्शन’ की लोकप्रियता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि रवींद्रनाथ ठाकुर इसी में लिख कर साहित्य के क्षेत्र में आए थे। रवींद्रनाथ बंकिम को अपना गुरु मानते थे।

निधन : 8 अप्रैल, 1894 को उनका निधन हो गया।