श्री अरविंद दार्शनिक, योगी, गुरु, कवि और राष्ट्रवादी थे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। कई सालों तक एक प्रभावशाली नेता रहे, फिर आध्यात्मिक सुधारक बन गए। इनका जन्म कलकत्ता में हुआ था। जब वे सात वर्ष के थे, तो उन्हें शिक्षा के लिए उनके भाइयों के साथ इंग्लैंड भेज दिया गया। श्रीअरविंद को अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, ग्रीक और इटैलियन भाषा में महारत हासिल थी।

सिविल सेवा से राजनीति तक
श्रीअरविंद ने केवल अठारह वर्ष की आयु में इंग्लैंड के किंग्स कॉलेज, कैम्ब्रिज से इंडियन सिविल सर्विसेज (आईसीएस) की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1893 में वे बड़ौदा राज्य सेवा में शामिल हुए। सबसे पहले उन्होंने सर्वे और सेटलमेंट विभाग में काम किया, बाद में राजस्व विभाग में और फिर सचिवालय में चले गए। 1897 में बड़ौदा में अपने काम के दौरान, उन्होंने बड़ौदा कॉलेज (अब महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी आॅफ बड़ौदा) में अंशकालिक फ्रांसीसी शिक्षक के रूप में काम करना शुरू किया। बाद में उन्हें उप-प्रधान के पद पर पदोन्नत किया गया।
बड़ौदा में रहने के दौरान, उन्होंने ‘इंदु प्रकाश’ के कई लेखों में योगदान दिया था। इसके साथ ही उनकी रुचि देश के स्वतंत्रता संग्राम में बढ़ती गई। फिर तो उन्होंने राज्यों में घूमना और क्रांतिकारियों से जुड़ना शुरू कर दिया। इसी सिलसिले में लोकमान्य तिलक और सिस्टर निवेदिता के साथ संपर्क स्थापित किया।

‘बंग-भंग’ का आंदोलन
1906 में ‘बंग-भंग’ आंदोलन में उन्होंने सक्रिय रूप से भाग लिया। नेशनल लॉ कॉलेज की स्थापना में अपना योगदान दिया और मात्र पचहत्तर रुपए मासिक पर अध्यापन कार्य किया। यही नहीं, किशोरगंज (अब बांग्लादेश में) में स्वदेशी आंदोलन प्रारंभ किया और कमीज-पतलून को त्याग कर धोती, कुर्ता और चादर पहनना शुरू किया। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय विद्यालय से अलग होकर ‘वंदे मातरम्’ का प्रकाशन प्रारंभ किया। ‘वंदे मातरम्’ में प्रकाशित लेखों और अपने भाषणों द्वारा अंग्रेजी सरकार की दमन नीति की वे कड़ी निंदा करते रहे।

‘अलीपुर षड्यंत्र केस’
अरविंद का नाम 1905 के बंगाल विभाजन के बाद हुए क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ा और 1908-09 में अलीपुर बमकांड मामले में उन्हें चालीस युवकों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। अरविंद पर राजद्रोह का मुकदमा चला। उन्हें एक वर्ष तक अलीपुर जेल में कैद रखा गया। वहां अरविंद का जीवन ही बदल गया। वे जेल की कोठरी में ज्यादा से ज्यादा समय साधना और तप में लगाने लगे। यहां वे भारतीय दर्शन और वेदों का अध्ययन करते। गीता पढ़ते और भगवान श्रीकृष्ण की अराधना करते। भगवान कृष्ण की अराधना में श्रीअरविंद ऐसे डूबे कि आंदोलन छोड़ कर योग और अध्यात्म में ही रम गए।

श्रीअरविंद आश्रम की स्थापना
जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने दो नए प्रकाशनों की शुरुआत की। अंग्रेजी में ‘कर्मयोगिन’ और बांग्ला में ‘धर्म’। उन्होंने अपने व्यक्तित्व में आए परिवर्तन को भी ‘उत्तरपाड़ा भाषण’ के माध्यम से लोगों के सामने रखा। 1910 में वे कलकत्ता छोड़ कर पांडिचेरी रहने लगे। योगी बनने के बाद उन्होंने वहां श्रीअरविंद आश्रम की स्थापना की।
निधन
अठहत्तर साल की उम्र में श्रीअरविंद ने अंतिम सांस ली। उनकी साधना पद्धति के अनुयायी आज कई देशों में हैं।