तरसेम गुजराल
इतिहास की परतों में चली गई कुछ तारीखें हर बार हमसे सवाल पूछती हैं। हम उन सवालों के जवाब देने के लिए प्रस्तुत हों या न हों। वे सवाल अपनी जगह हैं। 23 मार्च भी ऐसी ही एक तारीख है। भगत सिंह (28 सितंबर 1907-23 मार्च 1931) से उस समय की सरकार ने उनसे सांस लेने का अधिकार छीन लिया। पाश (9 सितंबर 1950-23 मार्च 1988) की गांव में ही खालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा हत्या कर दी गई। दोनों में सिर्फ दुनिया से विदा होने के दिनांक की ही नहीं वैसे भी कुछ आधारभूत समानताएं हैं। दोनों ने अपना जीवन समाजवादी आदर्श, स्वतंत्रता और शोषण मूलक व्यवस्था के विरोध में अर्पित किया। भगत सिंह, विक्टर ह्यूगो, हालकेन टालस्टाय, दास्तोवस्की, गोर्की, बर्नाड शॉ, डिकेन्स को पढ़ना पसंद करते थे। पाश ने मार्क्स, एंगेल्स, गोर्की को ध्यान से पढ़ा ही, भगत सिंह के वह मुरीद रहे, परंतु भगत सिंह की बुतपरस्ती के लिए नहीं। विचारधारा को समझने और आगे बढ़ाने के लिए। कहा- ‘भगत सिंह के जीवन के सामान्य तथ्यों पर रोशनी डालने, उसके बुतों को हार पहनाने… से ज्यादा लाभ नहीं होगा। जरूरत है, उसकी विचारधारा को समझने व आगे बढ़ाने की। जिस दिन वह फांसी पर चढ़ा, उसकी कोठरी में लेनिन की किताब मिली थी, जिसका एक पृष्ठ मोड़ा हुआ था।’
पाश और भगत सिंह। दोनों में प्रतिक्रियावाद, रूढ़िवाद, सांप्रदायिकता के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस था। और अपने विचार पर अटल रहने तथा जान जोखिम में डालने तक अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने का भरपूर जज्बा था। दोनों जीवन से प्यार करने वाले और व्यापक परिवर्तन के लिए बलिदान देने को तैयार पाए गए। बात यहां भगत सिंह और पाश की बराबरी की नहीं। पाश के भगत सिंह की प्रगतिशीलता को अपने भीतर उतारने की है। पाश को याद करना उतना ही असहज होना है जितना उनकी कविताओं को पढ़ कर। वह कविता को एक अलग धरातल पर प्रतिष्ठित कर पाए। भाषा की बिजली बहती तार को हम नंगे हाथों से छूते हैं। आत्म साक्षात्कार करते हैं तो आत्मलिप्तता से बाहर आकर। चुभती हुई बातें, माहौल इतनी सहजता से बयान होता है कि चुस्त फिकरे या फिसलन तैरना कुछ नजर नहीं आता। इसलिए जनाक्रोश और तीखेपन के बावजूद आदमी की यातना, राजनीतिक, सामाजिक बर्बरता का विरोध जीवंत होता है। वह शब्दों को अर्थों से युद्ध करने के लिए उतार देते हैं। निजार कब्बानी (1923-1998), सीरियाई कवि की कविता ‘लिखना चाहता हूं तुम्हारे लिए कुछ अलग शब्द’ की चार पंक्तियां हैं-
लिखना चाहता हूं तुम्हारे लिए कुछ अलग शब्द
इजाद करना चाहता हूं नई जुबान, सिर्फ तुम्हारे लिए
बिल्कुल तुम्हारी देह और मेरे प्यार के बराबर
चला जाना चाहता हूं दूर अपने शब्दकोश से
(राजेश कुमार झा का अनुवाद)
पाश ने कविता की जो नई जुबान तैयार की उसमें प्रचलित शब्द भी पचने लगते हैं। पंक्तियों के बीच पढ़ने पर वे प्रचलित शब्दकोश से अलग लगते हैं क्योंकि वह कुछ अलग दर्ज करना चाहते थे, जहां हम हैं और वहां हम क्यों है? हम उस सब को क्यों झेल रहे हैं, झेलते चले जा रहे हैं? दुनिया की वंचित मानवता वहां साफ दिखती है। वह उस दर्द, उस उपेक्षा, उस विडंबना को जाहिर कर पाए जो उनकी कविता की ताकत बनी। पाश के जीवनकाल में तीन कविता संग्रह प्रकाशित हुए। लोहकथा (उन दिनों वह जेल में बंद थे) 1970 में, उड्डदे बाजा मगर (उड़ते हुए बाजों के पीछे) 1974 में, साडे समियां पिच (हमारे समयों में) 1978। उनकी कविताएं पंजाबी कविता की सीमा पार हिंदी और उससे आगे भारतीय कविता का हिस्सा हो गर्इं। हिंदी की लगभग सभी पत्रिकाओं-पत्रों में कविताओं के अनुवाद प्रकाशित हुए। अनेक समीक्षापरक चिंतन परक लेखों में अपनी बात के समर्थन में काव्य पंक्तियां उद्धरत की गर्इं। उनकी कविता झूठ-मूठ का कुछ नहीं चाहती-
हम झूठ-मूठ का कुछ भी नहीं चाहते
और हम सब कुछ सचमुच का देखना चाहते हैं
जिंदगी, समाजवाद या कुछ और। अर्थतांत्रिक राजनीति ने समाजवाद का तमाशा बना दिया। पूंजी जिन कुछ हाथों/घरानों में केंद्रित होती चली गई, वहां समाज में श्रम को इज्जत मिलना असंभव-सा व्यापार है। श्रम और पूंजी का द्वंद्व तब से चलन में आया जब आदमी ने सरप्लस पूंजी का संचय करना आरंभ किया। यातना के भीतर सरप्लस पूंजी की पैठ होती है। इस पर पनपते निजाम को बदलने के लिए ही हाथ है।
हाथ यदि हों तो
जोड़ने के लिए ही नहीं होती
न दुश्मन के सामने खड़े करने के लिए ही होते हैं
हाथ श्रम करने के लिए ही नहीं होते
शोषक हाथों को तोड़ने के लिए भी होते हैं।
जब देश की राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल भारत को दुर्दशा से मुक्त करने की अपील कर रही थीं तब देश के राजनीतिज्ञों द्वारा समाजवाद लाने का संकल्प अधूरा था। उन्होंने गणतंत्र दिवस उद्बोधन में कहा, ‘देश के विकास और उपज की धूप का आनंद वंचितों को भी मिलना चाहिए। विकास की गति को तीव्र करते समय हमारा सारा बल और समर्पण हर देशवासी को लाभ पहुंचाने पर होना चाहिए। जब तक आंख में आंसू है, तब तक हमारा संकल्प अधूरा है।’ पाश की कविता का सचमुच का समाजवाद पूंजी केंद्रित विश्व की साठगांठ में जमीनी हकीकत नहीं बन पाया। कुचक्रों के कारण तथा समाजवाद की आकांक्षा के नाम पर भेद देखते हुए आंतरिक विसंगतियों की वजह से वह ध्वंस सामने आया जो मार्क्स एंगेल्स की कल्पना तक में नहीं था। यदि यह आज भी सामाजिक विषमताओं के कारण मनुष्य को बेहतर जीवन, बेहतर जीवन स्थितियां, एक बेहतर इंसान बनाने के संकल्प से दूर है तो सिद्धांत को व्यवहार में बदलने में काफी कमी है। पाश का हमला इसी प्रपंच के विरुद्ध है कि वह है तो सचमुच का क्यों नहीं। उसका रूपाकार केवल स्वप्न था धोखे के पीछे क्यों है?
पाश ने कहा-
हम चाहते हैं अपनी हथेली पर कोई इस तरह का सच
जैसे गुड़ की चाशनी में कण होता है
जैसे हुक्के में निकोटिन होती है
जैसे मिलन के समय महबूब के होठों पर
कोई मलाई जैसी चीज होती है।
यह बिंबों की भाषा लग सकती है परंतु इसके पीछे सब कुछ का सचमुच घटना, जीवन में होने की अभिलाषा। जीवन पर्यंत नए इंसान, नए समाज, नए देश के प्रति स्वप्नदर्शी रहना, स्वप्न को साकार के लिए प्रयत्नशील रहना और लोगों को उसमें शामिल होने के लिए प्रेरित करना रचनात्मक आत्मनिरीक्षण तो है ही, एक बौद्धिक कवायद तथा सौंदर्यशास्त्रीय आग्रह भी है। पाश की ताकतवर सीने में उतर जाने वाली कविता और अपार लोकप्रियता के प्रति आग्रहशील होकर पंजाबी के बाद के कुछ कवियों ने इस ढंग की कविता लिखने की कोशिश की। परंतु एक कसरत से ज्यादा कुछ नहीं पाया। राजनीतिक कविता को सयाने लोग ‘फिसलन भरी जमीन’ यों ही नहीं कहते। मंगलेश डबराल ने एक बार अपनी डायरी में लिखा था-राजनीतिक कविता के नाम पर ज्यादातर जो कुछ दिखाई देता है, वह दरअसल किसी बड़ी कविता को निर्मित कर सकने वाला कच्चा माल है। यह हम मार्क्सवादी कवियों की एक बड़ी खामी है कि हम कविता की सामग्री को ही कविता की तरह पेश करते रहते हैं और गैर-मार्क्सवादी खेमे के लिए गैर-कलावादी। जिन्होंने पाश की कविता को पचाने की जगह वैसे अंदाज की कविता लिखनी चाही, कविता की सामग्री ही चित्रित कर पाए। पाश की संवेदनशीलता में विचारधारा के प्रति गहरा समर्पण है, विचारधारा को लेकर उलझन या अटकाव नहीं है। इसे आप ईमानदारी की महक कह सकते हैं। कहते हैं-
तुम्हें पता नहीं कामरेड
तुमने शब्दों को क्या कर डाला है
उनमें लिपटी संवेदना ने
भला तुम्हारा क्या छीना था?
सिर्फ अपनी सुविधा के लिए
शब्दों को तराशना सीख लिया है
जैसे हदबंदी के लिए कोई पटवारी से मिलता है
तुमने उन्हें इस तरह कभी नहीं देखा
जैसे अंडों में मचल रहे चूजे हों।
जीवन को भरपूर प्यार करने से वह कृतज्ञता से भर उठते हैं।
मैं आदमी/ बहुत कुछ छोटा छोटा मोड़ कर बना है/ और उन सभी चीजों के लिए/ जिन्होंने मुझे बिखर जाने से बचाए रखा/ मेरे पास बहुत शुक्राना है/ मैं शुक्रिया करना चाहता हूं…। पाश खेतों के बेटे थे। मिट्टी की महक पसंद करते थे। लालची लुटेरी शक्तियों द्वारा प्रचारित घटिया, अस्वास्थ्यकर आस्वादन के प्रति विरक्ति का भाव रखते थे। यह साफगोई देखें-
मुझसे उम्मीद न करना कि मैं खेतों का बेटा होकर
आपके चगले हुए स्वादों की बात करूंगा
जिनकी बाढ़ में बह जाती है
हमारे बच्चों की तितली कविता
और हमारी बेटियों की कंजकों की हंसी।
पाश के दायित्वपूर्ण संपादन कार्य की हिंदी में बहुत ही कम या नहीं के बराबर बात हुई है। पाश ने ‘स्याड़’, ‘हाक’ और ‘एंटी फोरटी सेवन’ पत्र प्रकाशित किए। ‘स्याड़’ 1972 से 1974 तक प्रकाशित होता रहा। ‘हाक’ अनियतकालिक पत्र था। 1980 से आरंभ किया गया और 19 अंक प्रकाशित हुए। समयावधि 1980 से 1985 तक रही। इसके बाद पाश अमेरिका चले गए। वहां जाकर ‘एंटी फोरटी सेवन’ निकाला। इस समय को दो हिस्सों में देख सकते हैं। पहली नक्सलवादी लहर के कमजोर पड़ने पर सरकारी दमन का समय दूसरे सांप्रदायिक उभार का था। पाश की सांप्रदायिक रुझान के विरुद्ध लड़ाई ज्यादा तवज्जो मांगती है। उन्होंने अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर ही दी थी- ‘हमारे बुद्धिजीवी हाथों से काम करने वाले जनसाधारण से कतराते हैं।’ स्याड़ का संपादकीय उस कोशिश की घोषणा थी कि साहित्य आम जनता के बारे में नहीं आम जनता के स्तर पर रचा जाए। जनवरी 1973 के अंक में तो एक खेत मजदूर के साथ साक्षात्कार प्रकाशित किया गया। इरादा था उन लोगों से बातचीत की जाए जो समाज के जीवन का स्तंभ हैं। लिखा था- ये हैं वे लोग, जो समूचे समाज की जिंदगी का स्तंभ हैं और इंसानियत के तकाजे से जिंदगी पर सबसे ज्यादा हक भी इन्हीं का ही होना चाहिए। हम इंकलाब को मुंह मारने वाले लेखक अपनी सूझ और अनुभव के कद में जिंदगी के इन कलाकारों और लड़ाकों से कितने छोटे हैं।’ जाहिर है कि वह पत्रकारिता और लेखन में आसपास के साधारण लोगों को शामिल करना, उनके संघर्ष का आदर करना जरूरी समझते थे। उन्होंने खेत मजदूर ही नहीं पंचायत, किसान यूनियन, कारखाने, ट्रेड यूनियन, हरित क्रांति पर लेख प्रकाशित कर अपने व्यापक सरोकारों का परिचय दिया। आठवें दशक के अंतिम चरण में सिख-निरंकारी टकराव के साथ ऐसी राजनीति का दौर नजर आया जो सांप्रदायिक सवालों को तीखेपन से उभार रही थी। इस समय की पत्रकारिता के मुख्य विषय पंजाबी कौम, पंजाबी सभ्यांतर, मार्क्सवादी दृष्टिकोण ही रहे। पाश की पत्रकारिता का अगला चरण इसी दौर से संबंधित है। ‘हाक’ का प्रयोजन स्टडी सेंटर जैसा था। अखबारों के पंख काटने वाले प्रतिबंधों की भी चर्चा थी। ‘एंटी फोरटी सेवन’ का थीम ज्यादा गहरा है। सन सैंतालीस भारत के लिए उपनिवेशवाद के जुल्म से मुक्ति का साल है वहीं विभाजन के रूप में गहरी जख्मी मानसिकता का खुलासा है। सांप्रदायिक झुकाव अपने चरम को छू गए और लाखों लोगों को विवश, प्रताड़ित, दुख की गठरी उठाए विस्थापन झेलना पड़ा। ‘एंटी फोरटी सेवन’ का मतलब है उस सांप्रदायिक, विस्फोटक ज्वलनशील, उन्मादी मानसिकता का प्रखर विरोध। पाश के लिए ‘एंटी फोरटी सेवन’ उसी तरह मिशन बन गया था जैसे प्रेमचंद के लिए ‘हंस’ और ‘जागरण’। मैकफाश्लैंड (कैलिफोर्निया) 2-08-86 को महिंद्र सिंह संधू के… लिखे पत्र में उन्होंने कवि अमरजीत चंदन का जिक्र किया जिसे वह एक शाम चार घंटे के लिए मिले थे। आत्मीयता से उसका जिक्र करते हुए कहा- ‘इंग्लैंड के पंजाबी लेखकों में वह पहला था जिसने खुलकर व स्पष्ट रूप में खालिस्तानियों के विरुद्ध स्टैंड लिया था। इस बात पर सभी उसकी प्रशंसा करते थे। परंतु अपनी शुष्क और रिजर्व प्रकृति के कारण उसके मित्र बहुत ही कम हैं। बहुसंख्यक लेखकों/ बुद्धिजीवियों को उसने विरोधी बना रखा है। मैंने उसे अकेले होकर वाजिब स्टैंड बनाए रखने के लिए टोका तो उसने कहा कि वह इसी तरह का ही है।’ इसी पत्र में ‘पुनश्च’ से लिखा- कुछ ‘एंटी-47 फ्रंट के प्रति यहां तक छोटे स्तर पर काफी मजबूत ग्रुप है। जिसका मुख्य घेरा कैलिफोर्निया में है। (वैसे काटैक्ट शेष अमेरिका, कनाडा व इंग्लैंड में भी है)’ इस ग्रुप में सामर्थ्य काफी है परंतु सीमाएं भी हैं। इसे इंकलाबी या कम्युनिस्ट पक्षीय प्लेटफार्म नहीं बनाया जा सकता है। अभी के हाल में इसका उद्देश्य केवल सांप्रदायकिता का विरोध ही है। आगे चल कर दोनों तरह से इसे मानवीय अधिकारों के फोरम में तब्दील व स्थापित किया जा सकेगा। पाश अपने समय के महत्वपूर्ण कवि तो हैं ही। उनकी पत्रकारिता भी एक मिशन के रूप में मानवतावादी, सांप्रदायवाद और हर तरह की संकीर्णता के विरोध में प्रतिबद्धता से भरपूर रही। कवि के रूप में डाक्टर नामवर सिंह उनकी तुलना कवि लोर्का से कर चुके हैं। उनका रचना संसार जनपक्ष का रचना संसार है। वह अपनी तरह के शानदार कवि थे। देश उनको भूल नहीं सकता।
