रामकुमार आत्रेय

दिन छिपने में अभी समय था। बाबू संतराम घूमने के लिए घर से निकले। शाम के समय दूर तक घूमना उनकी आदत थी। पिता ने बचपन में सिर पर पगड़ी बांधना सिखाया था। उसे वे अब तक निभा रहे थे। आवारा पशु और कटखने कुत्तों से बचाव के लिए हाथ में एक छड़ी रखना भी वे नहीं भूलते थे।
घर से अभी वे थोड़ी दूर ही गए थे कि सामने से आ रहे एक किशोर ने उनके आगे अपना हाथ फैलाते हुए कहा- ‘बाबू जी, एक रुपया दीजिए। बड़ी मेहरबानी होगी।’ बाबू संतराम रुक गए। किशोर को एड़ी से चोटी तक निहारा। उनकी अनुभवी आंंखों ने उस किशोर में एक खास बात नजर आई। किशोर की वेशभूषा बता रही थी कि वह दीन अवश्य है, लेकिन चेहरे की चमक घोषणा कर रही थी कि उसके भीतर बेईमानी नहीं है। उसकी वाणी में बाबूजी को स्वाभिमान की खनक सुनाई दी। दूसरी खास बात यह थी कि भिखारी आमतौर पर आना-दो आना ही भीख के रूप में मांगते थे, जबकि वह शुरू में ही एक रुपए की मांग कर रहा था।

‘अरे बेटा, दूसरे भिखारी तो आना-दो आना मांगते हैं और तुम सीधे एक रुपया मांग रहे हो? एक रुपया भीख में तुम्हें कौन और क्यों देगा?’ उनके मन की बात होंठों पर आ गई।

‘बाबूजी, मैं भिखारी नहीं हूं।’ किशोर ने अपना आगे बढ़ा हाथ पीछे खींच लिया था।

‘तुम भिखारी नहीं हो। कमाल की बात है, भाई। तुम अभी एक रुपया मांग रहे थे और अब कह रहे हो कि भिखारी नहीं हो?’ संतराम ने नाराजगी भरे स्वर में पूछा था।

‘बाबूजी, मैंने एक रुपया जरूर मांगा था। पर भीख के रूप में नहीं, दान के रूप में। इसे आप एक निर्धन की सहायता भी कह सकते हैं। एक रुपए से कम मुझे किसी से लेना भी नहीं है।’ किशोर ने साफ-साफ कहा था।

ऐसी बात नहीं कि संतराम किसी को भीख नहीं देते थे। देते थे, लेकिन जांच-परख के बाद। किशोर की बातों ने उन्हें मोह लिया था, इसलिए वे उसके विषय में सब कुछ जान लेना चाहते थे।

‘एक-एक रुपया मांग कर तुम कितने रुपए इकट्ठा करना चाहते हो? और क्यों?’ उन्होंने बात आगे बढ़ाई थी।

‘बाबूजी, मैं पचास रुपए इकट्ठा करना चाहता हूं ताकि निकट वाले बाग से एक डलिया बेर खरीद सकूं। बेर सहित डलिया की कीमत पचास रुपए है।’

‘डलिया में पांच-सात किलो से कम बेर थोड़े ही आते होंगे। फिर इतने बेरों का क्या करोगे तुम?’

‘बाबूजी, मैं गली-गली घूम कर उन्हें बेचूंगा। आजकल बेर सस्ते मिल रहे हैं। कल और कोई चीज ठीक से मिल सकती है। इस तरह मैं इज्जत के साथ अपना और अपनी मां का पेट भर सकूंगा। मेरी मां अब बहुत कमजोर हो गई है। बूढ़ी तो है ही। मुझे यही तरीका सही नजर आया। बाबूजी, आप एक रुपया दे रहे न मुझे?’ एक समझदार व्यक्ति की तरह बातें करते हुए किशोर ने विनम्रता से पूछा था।

‘मैं तुम्हें सिर्फ एक रुपया नहीं दूंगा, पूरे पचास रुपए दूंगा। ताकि तुम्हें हर किसी के सामने गिड़गिड़ाना न पड़े।’ संतराम ने खुश होते हुए उतर दिया।

‘नहीं बाबूजी, आप मुझे एक रुपया ही दीजिए।’

‘पचास क्यों नहीं लोगे भाई? ऐसा क्यों? अगर बुरा लग रहा हो तो लौटा देना। ठीक है न?’

‘नहीं बाबूजी। आप पचास रुपए लौटाने की बात कर रहे हैं, कल उन पर ब्याज भी मांगेंगे। यह तो कर्ज लेना हो गया न। मैं किसी से कर्ज नहीं लूंगा। बस, एक रुपया दे दीजिए।

‘यह काम तुम्हें किसने सिखाया?’ उन्होंने चौंकते हुए जानना चाहा।

‘मां ने! और कौन सिखाएगा?’

‘मैं तुम्हारी मां से मिलना चाहूंगा। रही बात, पचास रुपयों की, इनसे अपना काम शुरू करो तुम। यह कर्ज नहीं है, सहायता है। जब तुम्हारे पास अपना पैसा हो जाए, तब लौटा देना। अब ना मत करना।’ संतराम ने पचास रुपए का एक नोट किशोर की ओर बढ़ाते हुए कहा था।
किशोर ने झिझक के साथ वे रुपए ले लिए थे। उसने संतराम को बताया था कि उसकी मां अभी झोपड़ी में नहीं है। वह किसी के यहां झाडू लगाने, बर्तन साफ करने गई है। आज के बाद वह उसे मजदूरी करने के लिए किसी के यहां नहीं जाने देगा।

संतराम यह सब भूल गए थे। काफी समय बीत चुका था। उस घटना के बाद न कभी वह किशोर उन्हें मिला और न ही उन्होंने उसे ढंूढ़ने की कोशिश की। मालूम नहीं, इस घटना को एक वर्ष हो चुका था या दो वर्ष।

आज जब वे घूमने निकले थे तो एक युवक ने उनका रास्ता रोक लिया। फिर उसने उनके चरण छुए और पचास रुपए का एक नोट आगे बढ़ाते हुए कहने लगा- ‘बाबूजी, लीजिए आपके पचास रुपए। इनसे मेरा जीवन संवर गया है। मैं कभी आपका यह अहसान नहीं भूल पाऊंगा।’

संतराम के पूछने पर युवक ने पूरी बात उन्हें बताई। सामने एक छोटी-सी दुकान पर उन्हें बिठा कर बताया कि यह दुकान उसी की है। दुकान में दो-तीन खुली डलिया रखी हुई थीं। पूछने पर उसने बताया कि वह भीख मांगने वाले बच्चों को डलिया देकर फल-सब्जी बेचना सिखा रहा है। इस प्रकार बहुत-से बच्चे अब भीख मांगना छोड़ कर यह काम कर रहे हैं।

उनसे वह डलिया का किराया वसूल लेता है। अब मां भी खुश है, वह भी और दूसरे बच्चे भी। संतराम युवक के साथ उसकी मां से मिलने चल दिए।