देवेंद्र कुमार
उस सुबह बादल घिरे थे। हल्की बारिश हो रही थी। प्रतिमा देवी रोज की तरह मंदिर जा रही थीं। मंदिर के निकट पहुंचते ही उन्होंने पुजारी को किसी पर चिल्लाते हुए सुना। एक आदमी मंदिर की सीढ़ियों के पास सिर झुकाए खड़ा था। प्रतिमा देवी ने पूछा तो पुजारी ने उस आदमी की ओर संकेत करते हुए कहा- ‘यह मंदिर में सेवा के समय कभी नहीं दिखाई देता, लेकिन प्रसाद के समय लाइन में सबसे आगे रहता है।’
प्रतिमा देवी उसे जानती हैं। वह है संजू, उसका एक हाथ कलाई से कटा हुआ है। उसके पास कोई काम नहीं है। कहता है कि वह तो काम करना चाहता है, पर कोई काम देता ही नहीं। उसका आधा हाथ देखते ही मना कर देते हैं। वह सारा दिन इधर से उधर फिरता रहता है। प्रतिमा देवी ने अक्सर संजू को लोगों से झिड़कियां खाते देखा है। उन्हें यह सोच कर बुरा लगता है कि कभी-कभी कोई कितना बेचारा हो जाता है। उन्होंने कहा- ‘संजू, पुजारी जी ठीक कह रहे हैं। तुम्हारा एक हाथ खराब है, लेकिन दूसरे हाथ से भी तो बहुत कुछ किया जा सकता है।’
संजू ने प्रतिमा देवी की ओर देखा, जैसे पूछ रहा हो- आखिर मैं क्या कर सकता हूं। उन्होंने कहा- ‘संजू, झाड़ू से मंदिर के आसपास सफाई कर डालो, यह काम एक हाथ से बखूबी किया जा सकता है।’
संजू ने एक तरफ रखी झाड़ू उठाई और सफाई करने लगा। प्रतिमा देवी पूजा करने के बाद मंदिर से बाहर आर्इं तो संजू हाथ रोक कर उनकी तरफ देखने लगा। उन्होंने कहा- ‘संजू, रुक क्यों गए? जैसा मैंने कहा है उसी तरह रोज करोगे तो तुम्हारा जीवन आसान हो जाएगा, किसी से कुछ मांगना नहीं पड़ेगा।’ फिर उसे पीछे आने का इशारा करके अपने फ्लैट की ओर चल दीं।
संजू सहमा-सा उनके पीछे चल दिया। प्रतिमा देवी संजू को ड्राइंग रूम में ले गर्इं, उसे बैठने को कहा। पर वह खड़ा ही रहा। कई बार कहने पर कुर्सी पर बैठ गया। प्रतिमा देवी एक प्लेट में कुछ खाने को ले आर्इं, वह संजू का संकोच समझ रही थीं। उन्होंने कहा- ‘संजू यह भीख नहीं, तुम्हारे काम का मेहनताना है। तुमने आज मंदिर के आसपास सफाई की है। मेरी बात का मान रखा है। क्या यह हाथ फैलाने से अच्छा नहीं है? अब रोज मंदिर की सफाई करना। आज के बाद भीख मांगने की नौबत नहीं आएगी। तुम्हारे भोजन की जिम्मेदारी मेरी।’
संजू अचरज से प्रत्तिमा देवी की ओर देखता रह गया। इतना ही कह पाया- ‘लेकिन आप ही क्यों।’
‘इस बात के फेर में मत पड़ो। इतना समझ लो कि मैं तुम्हें क्या, किसी को भी भीख मांगते हुए नहीं देखना चाहती।’
लेकिन मेरे जैसे तो न जाने कितने होंगे, तब आप…’ संजू ने कुछ कहना चाहा।
जवाब प्रतिमा देवी की मुस्कान ने दिया। कहा- ‘मन लगा कर काम करो और किसी के आगे हाथ फैलाने की सोचना भी मत।’
प्रतिमा देवी अब रोज संजू को मंदिर के बाहर सफाई करते देखतीं और संतोष से भर उठतीं। लेकिन एक दिन गड़बड़ हो गई। उस सुबह प्रतिमा देवी ने किसी औरत के चिल्लाने की आवाज सुनी। सफाई का काम करने वाली मुन्नी संजू को डांट रही थी और वह चुप खड़ा था। मुन्नी बहुत गुस्से में थी- ‘तू मेरे पेट पर लात मारने चला है, सोसाइटी में घुसना बंद न करा दिया तो मेरा नाम भी मुन्नी नहीं।’
प्रतिमा देवी ने मुन्नी को पास बुला कर पूछा, तो वह बिफर उठी- ‘संजू मेरी रोजी छीनने की कोशिश कर रहा है, तो मैं चुप रहने वाली नहीं।’ प्रतिमा देवी को मालूम था कि मुन्नी को मंदिर की सफाई करने के लिए सोसाइटी की ओर से महीने की पगार के अलावा सौ रुपए अलग से मिलते थे। उसे लगता था कि संजू उसे मिलने वाले सौ रुपए हड़पने के लिए ही मंदिर की सफाई करने लगा है। प्रतिमा देवी ने कहा- ‘मुन्नी, तुम बेकार ही घबरा रही हो। संजू से मैंने यह काम करने को कहा है। सोसाइटी का इससे कुछ लेना-देना नहीं है। मैं नहीं चाहती कि संजू या कोई और किसी मजबूरी की वजह से लोगों के सामने हाथ फैलाने पर मजबूर हो। क्या तुम ऐसा चाहती हो?’
‘नहीं कभी नहीं, मुझे तो खुद संजू को लोगों की झिड़कियां खाते देख कर बुरा लगता है।’ मुन्नी ने कहा।
उस दिन के बाद संजू को फिर कोई परेशानी नहीं हुई। वह सुबह-शाम दोनों समय मंदिर के आसपास साफ-सफाई करता था और प्रतिमा देवी ने उसके लिए भोजन की व्यवस्था कर दी थी। अब किसी को संजू से कोई शिकायत नहीं थी। दोपहर में संजू सोसाइटी के पार्क में पेड़ की छाया में बैठ कर खाना खाता था, तो शाम को उसे सोसाइटी के गेट के बाहर बच्चों से घिरे देखा जा सकता था। उस समय गेट के बाहर मंदिर का प्रसाद बांटा जाता था। संजू बच्चों को लाइन में खड़ा रहने में मदद करता था। और हुड़दंगी बच्चे उसका कहा मान भी जाते थे।
एक दिन प्रतिमा जी ने इस बारे में पूछा तो उसने कहा था- ‘वे सब मुझे अपने बच्चों जैसे लगते हैं। इन्हें देख कर अपने बचपन की शरारतें याद आ जाती हैं।’ फिर बताया- ‘गांव में हमारे घर के पास से एक पगडंडी नदी की तरफ जाती थी। उसके दोनों तरफ घनी झाड़ियां थीं। उनमें सांप-बिच्छू निकलते थे। इसलिए उधर से कोई नहीं जाता था। जब मेरी किसी शरारत पर मां मुझे मारने दौड़ती तो मैं उस पगडंडी पर चल देता और जोर-जोर से कहता- ‘मैं नदी में जा रहा हूं।’ तब मां भाग कर मुझे लिपटा लेती। गुस्सा भूल कर दुलार करने लगती। मैं भी हंस कर उसे गुदगुदा देता। तब मां मेरा हाथ अपने सिर पर रख कर कसम खिलाती कि मैं फिर कभी उस सांप-बिच्छू वाली पगडंडी से नदी की तरफ नहीं जाऊंगा।’ कहते हुए उसकी आवाज भर्रा गई। प्रतिमा देवी ने संजू से फिर कभी कुछ नहीं पूछा।
एक सुबह प्रतिमा जी मंदिर आर्इं तो संजू नहीं दिखाई दिया। दूसरे दिन भी नहीं आया। उन्होंने सोसाइटी के गेट पर पूछा तो गार्ड ने कहा- ‘कल रात को आया था, साथ में दो बच्चे थे। कह रहा था कि बच्चों को छोड़ने जा रहा है।’
‘कुछ बताया कि बच्चों को कहां छोड़ने जा रहा है? कौन से बच्चे थे।’
‘कुछ बताया नहीं, बस इतना ही कहा था।’
उस दिन के बाद संजू फिर कभी नहीं दिखाई दिया। आखिर कहां चला गया था। और वे बच्चे कौन थे? बच्चों को कहां छोड़ने चला गया था संजू। वे बच्चे, जो शायद उसके कोई नहीं थे।

