दिनेश विजयवर्गीय

भोर का तारा

सुबह सवेरे जल्दी उठ कर
सैर को जाते बबलू जी
दादा के संग कदम मिला कर
दौड़ लगाते बबलू जी।

दूर गगन में अब तक भी
टिम टिमा रहे थे कुछ तारे
पर नजर न आया तारा भोर का
उदास हो गए बबलू जी।
हर प्रात: तुम चलो घूमने
कहते बबलू से दादाजी
अब लेते आनंद प्रकृति का
योगा करते बबलू जी।

अब रही न चाह भोर तारे की
सैर को जाते बबलू जी
अलसायापन दूर हो गया
हंसमुख रहते बबलू जी।

शब्द-भेद

कुछ शब्द एक जैसे लगते हैं। इस तरह उन्हें लिखने में अक्सर गड़बड़ी हो जाती है। इससे बचने के लिए आइए उनके अर्थ जानते हुए उनका अंतर समझते हैं।

सुत / सूत

बेटा, पुत्र को सुत कहते हैं। जैसे हनुमान का एक नाम पवन सुत भी है। मगर सूत के कई अर्थ होते हैं। एक सूत, सूत्र से बना है, जिसका अर्थ होता है धागा। दूसरा अर्थ है सारथी यानी रथ हांकने वाला। जैसे कर्ण को सूत पुत्र इसलिए कहा गया कि जिन्होंने उसका पालन-पोषण किया वे रथ हांकते थे। सूत का एक अर्थ पौराणिक कथा कहने वाला भी होता है। महाभारत की कथा को सूतजी ने आगे बढ़ाया था। इसी से सूत्रधार शब्द बना है। सूत का एक अर्थ उत्पन्न होने से भी है। इसका एक अर्थ अच्छा, भला भी होता है।