नागेश पांडेय ‘संजय’
बड़ी बुआ जी
घर आई हैं बड़ी बुआ जी।
पापा को बांधेंगी राखी,
तिलक लगाएंगी।
परमल की बर्फी लाई हैं,
उन्हें खिलाएंगी।
सब खाएंगे, मगर बाद में;
इसी बात पर अड़ीं बुआ जी।
पापा के बचपन की बातें,
बुआ बताती हैं।
सुना-सुना उनकी शैतानी,
हमें हंसाती हैं।
बिना दांत के खिल-खिल हंसतीं,
लगती हैं फुलझड़ी बुआ जी।
बुआ बड़ी ज्ञानी-दानी हैं,
और पुजारी हैं।
सबसे मेलजोल में माहिर,
सबकी प्यारी हैं।
सब कहते हैं कभी आज तक,
नहीं किसी से लड़ीं बुआ जी।
घर आई हैं बड़ी बुआ जी।
शब्द-भेद
कुछ शब्द एक जैसे लगते हैं। इस तरह उन्हें लिखने में अक्सर गड़बड़ी हो जाती है। इससे बचने के लिए आइए उनके अर्थ जानते हुए उनका अंतर समझते हैं।
सुस्त / सुस्थ
जब किसी में प्रसन्नता, उत्साह कम दिखता है, उसकी गति धीमी हो, जिसका बल कम हो और काम ठीक से पूरा नहीं कर पाता हो, उसे सुस्त कहते हैं। जबकि सुस्थ का अर्थ होता है पूरी तरह स्वस्थ, निरोग, प्रसन्न।
हाता / हाथा
चारों ओर से दीवार बना कर या बाड़ लगा कर घेरे गए स्थान जहां पशुओं आदि को बांधने का काम किया जाता है यानी अहाता को हाता कहते हैं। जबकि औजारों आदि की मूठ, हत्था, दस्ता को हाथा कहते हैं।
