शिखर चंद जैन
किसी तालाब में दो मेढक रहते थे- हंपी और डंपी। हंपी एक मेहनती, चुस्त और मददगार स्वभाव का मेढक था, जबकि डंपी बिल्कुल आलसी और स्वार्थी। एक दिन तालाब किनारे एक बूढ़ा कुम्हार आया। मिट्टी के बरतनों से भरा टोकरा ढोते-ढोते वह थक गया था और प्यासा था। तालाब के किनारे आकर उसने अपना लोटा डुबाया ताकि उसमें पानी भर कर पी सके, तभी उसके हाथ से लोटा छूट गया और तालाब में डूब गया। कुम्हार हताश हो गया। तभी उसने डंपी को देखा और बोला, ‘मेढक भाई! मेरा लोटा पानी में डूब गया, क्या तुम निकाल दोगे? मैं बूढ़ा और कमजोर हूं, तैरना भी नहीं आता।’
डंपी ने दुत्कारते हुए रुखे स्वर में कहा, ‘दिखता नहीं है? मैं अपने भोजन की व्यवस्था करने में जुटा हुआ हूं।’
हंपी थोड़ी ही दूरी पर था, उसने सारी बात सुनी तो झट डुबकी मारी और कुम्हार का लोटा निकाल कर उसे पकड़ा दिया। कुम्हार बड़ा खुश हुआ। उसने उसे एक मिट्टी का दीपक देते हुए कहा, ‘लो दोस्त! तुम्हारे लिए एक छोटा-सा उपहार है।’
डंपी मुंह बिचका कर बोला, ‘लगता है, तुमने इस तुच्छ उपहार के लिए ही इसकी मदद की है।’
हंपी ने कहा, ‘नहीं भैया! मुसीबत में कोई भी हो, उसकी मदद करनी चाहिए। हो सकता है कभी हम पर भी मुसीबत आ जाए।’
थोड़े दिनों बाद की बात है। तेल-घी का एक व्यापारी जंगल से गुजर रहा था। वह अपना माल बेचने शहर जा रहा था। रास्ते में तालाब देख कर उसने सोचा कि चलो जरा तरोताज हो जाते हैं। व्यापारी तालाब में मुंह हाथ-धोने के लिए झुका, तो उसका चश्मा खुल कर गिर गया। व्यापारी बुरी तरह घबरा गया, क्योंकि बिना चश्मे के उसे कुछ भी नहीं दिखता था। तालाब किनारे बैठ कर वह पछताने लगा कि बेवजह वह क्यों तालाब के पास आया।
तभी हंपी किनारे पर आया और बोला, ‘क्या बात है अंकल? बहुत परेशान लग रहे हैं?’
व्यापारी ने कहा, ‘बेटा! मेरा चश्मा गिर गया… बिना चश्मे के मुझे कुछ नहीं दिखता।’
हंपी बोला, ‘इतनी-सी बात! अभी लाता हूं आपका चश्मा।’ हंपी ने डुबकी लगाई और चश्मा निकाल लाया। व्यापारी ने खुश होकर उसे एक डिब्बी में भर कर तेल दिया और बोला, ‘लो, इसको रख लो तुम्हारे काम आएगा।’
डंपी ने तिरछी नजरों से देखते हुए सुनाया, ‘लोग फालतू के गिफ्ट पाने के लिए नौकर की तरह दूसरों का काम करते रहते हैं।’ हंपी ने उसकी बात सुन कर भी अनसुनी कर दी।
कुछ दिनों बाद। हंपी तालाब में इधर-उधर तैर रहा था तभी उसने एक पत्थर के पास सोने की अंगूठी अटकी हुई देखी। वह आश्चर्य में पड़ गया। सोचने लगा कि आखिर यह कीमती अंगूठी कहीं उसी व्यापारी की तो नहीं। उसी समय उसने एक महिला के रोने की आवाज सुनी। हंपी तालाब किनारे गया, तो देखा एक महिला सचमुच रो रही थी और उसका पति उसे ढांढस बंधा रहा था। हंपी ने पूछा, ‘क्या बात है बहन? तुम रो क्यों रही हो?’
महिला ने सुबकते हुए उसे अपनी अंगूठी खोने की बात बताई। हंपी ने पानी में डुबकी मारी और अंगूठी ले आया। अंगूठी देखते ही महिला की जान में जान आ गई। वह खुश हो गई। महिला के पति ने भी हंपी को शुक्रिया कहा और बोला, ‘दोस्त! मेरे पास रुई है, तुम उपहार के रूप में थोड़ी-सी रुई रख लो। शायद तुम्हारे काम आ जाए।’ हंपी ने भी रुई लेकर धन्यवाद कहा।
समय बीता। गर्मियों के दिन आ गए। तेज धूप पड़ती थी और बारिश का नामोनिशान नहीं था। ऐसे में मेढकों के लिए कीट-पतंगों की बड़ी समस्या होने लगी। उनका पेट तो उन्हीं से भरता था। नौबत ऐसी आई कि हंपी और डंपी भूखे रहने लगे। तभी एक दिन हंपी ने देखा कि तेल का व्यापारी उधर से गुजर रहा था। उसके दिमाग में एक विचार आया। उसने व्यापारी को आवाज लगाई और पूछा, ‘क्या आप मुझे माचिस की एक डिबिया दे सकते हैं?’ व्यापारी ने कहा, ‘हां-हां… क्यों नहीं।’ उसने खुशी-खुशी हंपी को माचिस की डिबिया दे दी।
हंपी ने कुम्हार द्वारा उपहार में मिले दीपक में व्यापारी द्वारा दिया गया तेल भरा और रुई की बाती बना कर उसमें लगा दी। फिर माचिस से दीपक को जला दिया। दीपक जलते ही उसके चारों तरफ कई कीट-पतंगे मंडराने लगे। हंपी मजे से उन्हें चट करने लगा। उधर डंपी उसे दावत मनाते देख मन ही मन कुढ़ कर रह गया और अपने रूखे व्यवहार के लिए पछताने लगा।
