डॉ. वरुण वीर
समूचे विश्व में भौतिक विकास की आंधी ने प्रकृति के साथ जो दुर्व्यवहार किया है उसका असर वैश्विक पर्यावरण समस्या के रूप में दिन-प्रतिदिन देखने को मिलता है। बेमौसम बरसात, कभी अधिक सर्दी तो कभी अधिक गर्मी। पर्यावरण असंतुलित हो चुका है। भूमि में जल का स्तर बहुत नीचे तक चला गया है और भूमि की उर्वरा शक्ति समाप्त होती जा रही है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जल, वायु, भूमि प्रदूषण गहरे रूप से फैलते जा रहे हैं। हम सभी इन समस्याओं से प्रतिदिन उलझ रहे हैं और जिसका कारण केवल मनुष्य की अज्ञानता, मूर्खता तथा लालच है। जरूरत से अधिक वस्तुओं का संग्रह पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है। अष्टांग योग में अपरिग्रह का सीधा संबंध पर्यावरण से है। प्रकृति में विकार आना अपरिग्रह के सिद्धांत को न अपनाने के कारण ही है। ‘अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासम्बोध:’। जब मनुष्य हानिकारक तथा अनावश्यक वस्तुओं और हानिकारक और अनावश्यक विचारों को त्याग देता है ‘जन्मकथंता संबोध’ अर्थात वर्तमान जन्म में क्या कर रहा है? शरीर क्या है? इंद्रियां क्या हैं? मैं क्या हूं? आदि विषयों के बारे में जब जिज्ञासा और ज्ञान हो जाता है, तब भूत तथा भविष्य संबंधी जिज्ञासा और सामान्य अनुमान आदि ज्ञान हो जाता है। इस सिद्धांत को अपनाने से भौतिक विषयों के प्रति मोहभंग हो जाता है। जैसे संग्रह करने में दोष, उसकी रक्षा का संघर्ष होने का दोष तथा हिंसा दोष आदि जब देखता है तब मनुष्य का मन विषयों से हटना शुरू हो जाता है और ऐसी स्थिति में वह अपने जीवन के विषय में उसकी महत्ता को विचारना आरंभ कर देता है। जीवन का लक्ष्य क्या है? यह जीवन क्यों है? आदि इस स्थिति में व्यक्ति अंतमुर्खी होता है और योग के अत्यंत सूक्ष्म विषयों के माध्यम से सूक्ष्म प्रकृति से संबंध स्थापित कर अत्यंत सूक्ष्म तत्त्व आत्मा को जानने तथा साक्षात्कार की ओर अग्रसर होता हुआ परम सूक्ष्म तत्त्व परमात्मा के साक्षात्कार की ओर गति करता है। उस स्थिति में इस भौतिक जगत का उतना ही भोग करता है, जितना उसे जीवन में आवश्यकता होती है। प्रकृति का अधिक दोहन करना उसके लिए अनैतिक कार्य हो जाता है।
मनुष्य जितना अंतमुर्खी होगा उतना ही वह भौतिक जगत का उपभोग कम करेगा। लेकिन आज समाज, राष्ट्र तथा जीवन की शैली बदल चुकी है। पूरी तरह से उस युग में नहीं जाया जा सकता, जहां पर प्रकृति का दोहन नहीं होता था। आज आधुनिक युग है और दुनिया छोटी हो चुकी है। संपूर्ण विश्व की सरकारें पर्यावरण के प्रति सजग तथा साथ मिल कर पर्यावरण को ठीक करने का कार्य कर रही हैं। लेकिन कार्यशैली और विचार का आधार अपरिग्रह सिद्धांत न होने के कारण पर्यावरण की समस्या का समाधान सोचने में भ्रमित दिखाई देते हैं। विद्यालय स्तर पर विद्यार्थियों को सिखाए जाने की अत्यंत आवश्यकता है कि भौतिक वस्तुओं का उपभोग उतना ही किया जाए जितनी आवश्यकता हो तथा प्रकृति का हनन न हो, तभी भविष्य में असंतुलित पर्यावरण से मुक्ति मिल सकती है। भौतिक विकास की आंधी सभी राष्ट्रों के बीच प्रतिस्पर्धा पैदा करती है, जो कि राष्ट्रों में ईर्ष्या का भाव दर्शाती है। मनुष्य के लिए जरूरत से अधिक सुख-सुविधा उपलब्ध कराना भी मनुष्य को शारीरिक और मानसिक रूप से आलसी बनाना ही है। भौतिक विकास तथा प्रकृति का दोहन उतना ही हो, जिससे कि प्रकृति का हनन न हो। कम कपड़ों का संग्रह, घर में जरूरत से अधिक सामान न रखना, कम बिजली तथा पानी का प्रयोग, भोजन का दुरुपयोग यानी मिताहारी होना (जितनी भूख हो उससे कम खाना) जो कि स्वास्थ्य के लिए उपयोगी नियम है। और शाकाहारी होने के साथ-साथ शाकाहार का प्रचार करना भी जरूरी है।
मांसाहार भी वैश्विक पर्यावरण की समस्या का एक बहुत बड़ा कारण है। आईपीसीसी के प्रमुख रह चुके आरके पचौरी विश्व को मांसाहार की समस्या से अवगत करा चुके हैं। मांसाहार और वैश्विक पर्यावरण की समस्या का गहरा संबंध है। मांस उत्पादन से पानी की बर्बादी अधिक होती है। ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन, संसाधनों पर बढ़ता दबाव, जानवरों विशेष रूप से गाय और सुअर द्वारा सीधे उत्सर्जित मीथेन गैस कार्बन डाइआॅक्साइड की तुलना में तेईस गुना हानिकारक है। ग्रीन हाउस गैसों का सालाना पचास अरब टन कुल कार्बन उत्सर्जन के अठारह फीसद के लिए मांस उत्पादन जिम्मेदार है। 2009 में इस समस्या को लेकर 192 देशों के लगभग बीस हजार प्रतिनिधियों ने कोपेनहेगन सम्मेलन में भाग लिया था। आज खेत में बीज बोने से लेकर रसोई घर में अनाज, फल, सब्जी पहुंचने तक रासायनिक पदार्थों का भरपूर मात्रा में प्रयोग किया जाता है, जो कि खेत से लेकर उसका उपभोग करने वाले व्यक्ति तक अनेक प्रकार के घृणित असाध्य रोग पैदा हो रहे हैं और अनेक प्रकार के रोगों के इलाज के लिए किसान को अपनी जमीन तक बेचनी पड़ जाती है तथा साथ ही भूमि बंजर हो जाती है। जहां भी रसायनों का प्रयोग किया जाता है, वहां पानी जरूरत से अधिक मात्रा में प्रयोग किया जाता है। पश्चिमी जगत की देखादेखी आवश्यकता से अधिक भौतिक वस्तुओं का संग्रह और उसका उपभोग पर्यावरण को अत्यधिक हानि पहुंचाता है। आजकल यूज एंड थ्रो की सोच प्रत्येक स्तर पर पर्यावरण की समस्या को और अधिक बढ़ावा दे रही है। कागज, प्लास्टिक तथा थर्माकोल के बर्तनों का उपयोग करना और तुरंत फेंक देना। यही सोच और क्रिया कपड़ों तथा घर के सामान को लेकर भी है। जल्दी-जल्दी कपड़े खरीदना तथा कुछ ही समय में फेंक देना यह मानसिकता त्याग कर महात्मा बुद्ध तथा भगवान महावीर के विचार को पकड़ना चाहिए। ‘त्याग भाव’ के साथ प्रत्येक वस्तु का उपभोग ऐसी भावना होने से मनुष्य कम भौतिक पदार्थों का सेवन करेगा, जिससे कि प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग होने से बचेगा और पर्यावरण संतुलित होकर प्रत्येक जीवन को सुख प्राप्त होगा। सभी प्रकार के जीव-जंतु पर्यावरण को बनाने में सहयोग करते हैं। लेकिन मनुष्य ही है जिसके कारण यह समस्या अपने चरम पर पहुंच गई है। इसलिए मनुष्य को ही इस समस्या का समाधान योग के माध्यम से रखना चाहिए। अष्टांग योग के प्रथम भाग का पांचवा अंग अपरिग्रह को जीवन में अपना कर पर्यावरण को संतुलित बनाना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए अन्यथा पर्यावरण असंतुलित तथा मनुष्य का शरीर उतना ही रोगी होगा। मनुष्य प्रकृति का अंग है, जो कि पांच तत्त्वों से बनी है। मनुष्य जितना प्रकृति के निकट रहेगा उतना सुखी रहेगा तथा जितना प्रकृति से दूर रहेगा उतना ही दुखी रहेगा। कृत्रिम जीवन जीने से शरीर, मन, प्राण रोगी और दुखी रहेगा। इसलिए मनुष्य अधिक से अधिक प्रकृति की गोद में रहने का प्रयास करें। वही उसके सुख का मूल आधार है।

