हॉकी के भारतीय जांबाजों ने लंदन में सम्पन्न चैंपियंस ट्राफी स्पर्धा में रजत पदक जीतकर इतिहास रचा है। आलमी हॉकी में एक जमाना वह भी था, जब दुनिया में चहुंओर हमारी हॉकी की तूती बोलती थी। ओलंपिक खेलों में आज भी सर्वाधिक आठ स्वर्ण पदक जीतने का अजेय कीर्तिमान भारत के पास है। कनाडा में 1976 के मांट्रियल ओलंपिक खेलों से हॉकी के खेल को घास के मैदानों से कृत्रिम मैदानों (एस्ट्रोटर्फ) पर खेले जाने की शुरुआत के बाद से भारतीय हॉकी की ये यशगाथाएं धूल धूसरित सी होने लगीं। रियो की चुनौती सामने है। इस दरम्यान ओलंपिक, विश्वकप और चैंपियंस ट्राफी जैसे आलमी हॉकी के अनेकानेक उच्च स्तरीय आयोजन हुए हैं, मगर भारतीय हॉकी लाख चाहकर भी कभी शीर्ष पर खिताबी दस्तक देने में कामयाब नहीं हो सकी।
सुनहरे दिनों की वापसी के प्रयासों में भारतीय हॉकी की कई पीढ़ियां खप गर्इं, मगर ओलंपिक, विश्वकप या चैंपियंस ट्राफी के स्तर के टूर्नामेंट में खिताब जीत का सपना अभी भी दूर की कौड़ी बना हुआ है। मगर लंदन में चैंपियंस ट्राफी के फाइनल में पहली बार प्रवेश और रजत पदक जीतने के बाद यह लगने लगा है कि सुरजीत सिंह, सुरिंदर पाल सिंह सोढी, जफर इकबाल, मोहम्मद शाहिद, सौमैया और परगट सिंह से होते हुए धनराज पिल्लै और सरदार सिंह के नेतृत्व वाले इस काल तक हॉकी के इकबाल को फिर बुलंद करने के लिए किए गए जी-तोड़ प्रयास अब फलीभूत होने जा रहे है। इन सूरमाओं के दम पर भारतीय हॉकी ने बुलंदियों की ओर कूच करने की लंबी लड़ाई लड़ी है। गोया चैंपियंस ट्राफी में ऐतिहासिक प्रदर्शन के पार्श्व में भारतीय हॉकी सितारों के मुख से समवेत स्वरों में तराना गूंज रहा है कि ‘हम लाएंगे तूफानों से किश्ती निकाल के।’ तो क्या देश की हॉकी को फिर खोए हुए गौरव को लौटाने के इंतजार में बीत गए छत्तीस साल ने इस जंग को क्या हॉकी के लिहाज से आजादी की एक जंग जितना महत्वपूर्ण बना दिया है?
मास्को ओलंपिक में हॉकी के आखिरी स्वर्ण पदक के ठीक तीन साल बाद इंग्लैंड में तीसरे विश्व कप क्रिकेट में कपिलदेव के नेतृत्व में जब भारत ने अप्रत्याशित तौर पर सबको चकित करते हुए सिरमौर बनने का एजाज हासिल किया तो देश में क्रिकेट की तूती बोलने लगी। तब से लेकर क्रिकेट के प्रति देश में जुनून की हद तक दीवानगी निरंतर परवान चढ़ती ही गई है। अब हालात यह है कि देश के जनमानस में खेलों के प्रति उमड़ने वाली भावनाएं, शोहरत, चकाचौंध और पैसे को अकेला क्रिकेट डकार जाता है। क्रिकेट के बाजारीकरण ने गली और मुहल्लों तक इसे पहुंचा दिया है
ऐसे घोर निराशा के आलम और विपरीत स्थितियों के बावजूद हॉकी को करिअॅर के रूप में अपनाने वालों की कमी नहीं है। रियो ओलंपिक से ठीक पहले चैंपियंस ट्राफी जैसी प्रतिष्ठित स्पर्धा का जो परिणाम सामने आया है, इसका श्रेय उन अनगिनत खिलाड़ियों को जाता है, जिन्होंने हॉकी को सही मायनों में जीवंत बनाए रखा है। चैंपियंस ट्राफी में भारतीय टीम के खेल ने अपने स्वर्णिम युग की यादें फिर से ताजा कर दी हंै। जब भी खेलों के महाकुंभ ओलंपिक का अवसर आता है तो देश के खेलप्रेमी स्वर्णिम युग के लौटने की बाट जोहने लगते है। लंदन में चैंपियंस ट्राफी में भारतीय हॉकी टीम के पुरानी दिनों की वापसी के पदचाप को सुना जा सकता है।
चैंपियंस ट्राफी में मैच दर मैच भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन में आए निखार ने इन संभावनाओं को प्रबल बनाया है। जिन कमजोरियों के कारण हमारी टीम कई वर्षों से ओलंपिक, विश्व कप और चैंपियंय ट्राफी जैसे प्रतिष्ठित मुकाबलों में दुनिया की नामी टीमों के मुकाबले फिसड्डी साबित होती रही थी, वे अब नदारद हो चुकी हैं। खिलाड़ियों में आत्मविश्वास, जीवट और अंतिम दम तक किसी भी कीमत पर हार न मानने का जज्बा देखते ही बनता है।
चैंपियंस ट्राफी में भारतीय टीम ने कुशलता, गति और दमखम की कसौटी पर खरा प्रदर्शन किया है। अब वे दिन लद चुके हैं जब भारतीय टीम आॅस्टेÑलिया, हालैंड, जर्मनी, स्पेन और ब्रिटेन जैसी टीमों के आगे घुटने टेक देती थी। इस बार चैंपियंस ट्राफी से ये सूरत-ए-हाल पूरी तरह बदली हुई नजर आती है। भारत का प्रदर्शन कुछ अलग ही कहानी बयान कर रहा है। प्रतिद्वंद्वी टीमों की प्रतिष्ठा और श्रेष्ठता के समक्ष खुद को हल्का समझकर सहज ही दबाव में आ जाया करने वाली टीम अब हर मोर्चे पर खम ठोंक रही है। भारत ने चैंपियंस ट्राफी के पहले ही मुकाबले में जर्मनी की ताकतवर टीम को बुरी तरह छकाया। जर्मनी की टीम भारत की बढ़त को खत्म कर बमुश्किल इस मुकाबले को ड्रा करा सकी। अगले मुकाबले में मेजबान ब्रिटेन को परास्त किया।
बेल्जियम ने भारत के बढ़ते कदमों पर एक अप्रत्याशित जीत से लगाम लगाने की कोशिश की, मगर हर हाल में निर्भय होकर बिना दबाव के नैसर्गिक और स्वछंद खेल के दम पर भारतीय टीम कोरिया पर जीत और आस्ट्रेलिया से हार के बाद भी पहली बार फाइनल में दस्तक दे दी। आखिरी लीग मैच में आॅस्ट्रेलिया ने भारत को 2-4 से हराया जरूर मगर इस मैच के आखिरी क्वार्टर में जिस अंदाज में ताबड़तोड़ हमले कर भारत ने मैच में वापसी की कोशिश की वह कंगारुओं को हतप्रभ और भारतीयों को गौरवान्वित करने वाला प्रदर्शन था।
रतीय टीम ने फाइनल में आॅस्ट्रेलियाई श्रेष्ठता के अभेद्य किले को भेदने की पुरजोर कोशिश की। निर्धारित समय तक बराबरी पर रहे मुकाबले में भारतीय टीम कंगारुओं पर ज्यादातर हावी रही। फाइनल मुकाबले की हकीकत को देखा जाए तो भारतीय खिलाड़ियों ने एक के बाद एक अनवरत हमले कर कंगारुओं को पीछे धकेल दिया। चौथे र्क्वाटर में गेंद पर भारतीयों का नियंत्रण ऐसा था कि आॅस्टेÑलिया जैसी विश्व की सबसे तेज तर्रार टीम के खिलाड़ी बमुश्किल हॉफ लाइन क्रास कर पा रहे थे।
भारतीय खिलाड़ियों के अनवरत हमलों, आखिरी दम तक गजब की तेजी और दमखम के आगे आॅस्टेÑलियाई हतप्रभ और रक्षात्मक मुद्रा में थे। कमोबेश पूरे टूर्नामेंट के दौरान भारत हॉकी का यह नया अवतार विश्व हॉकी के शीर्ष पर छाया रहा। भारतीय टीम का यह बदला हुआ अंदाज वाकई लाजवाब था। चैंपियंस ट्राफी में मात्र रजत पदक जीतकर इतिहास रचने के कारण ही नहीं, बल्कि खेल के हर मोर्चे पर अपने प्रदर्शन की अमिट छाप छोड़ने के कारण भी रियो ओलंपिक को लेकर भारतीय हॉकी प्रेमियों की उम्मीदें यकायक सातवें आसमान पर हैं।
(मनमोहन हर्ष)

