विजय बहादुर सिंह
कला के पहले क्षण का निदर्शन करते हुए मुक्तिबोध का वाक्यांश है- ‘जीवन का उत्कट तीव्र अनुभव-क्षण।’ आगे चल कर वे इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं- ‘हां, यह ठीक है कि उसमें अनुभव-तत्त्व ही प्रधान है, किंतु, उसमें भी दर्शकत्व का कुछ-न-कुछ अंश जरूर रहता है। लेकिन भोक्तृत्व तिरोहित नहीं हो जाता।’ इसके बाद मुक्तिबोध जो बुनियादी और सबसे महत्त्वपूर्ण बात कहते हैं वह उन्हीं के शब्दों में- ‘कलाकार का वास्तविक अनुभव और अनुभव की संवेदनाओं द्वारा प्रेरित फैंटेसी इन दोनों के बीच कल्पना का एक रोल होता है। वह रोल- वह भूमिका एक सृजनशील भूमिका है। वही कल्पना उसे वास्तविक अनुभव की व्यक्तिबद्ध पीड़ाओं से हटा कर, उस अनुभव को ही दृश्यवत करके, उसी अनुभव को नए रूप में उपस्थित कर देती है। किंतु, यह अनुभव दृश्यवत होते ही मूल अनुभव से पृथक होकर भिन्न हो जाता है।’ ‘जीवन का उत्कट तीव्र अनुभव-क्षण’ साथ ही उससे जन्म लेने वाली संवेदनाओं द्वारा प्रेरित फैंटेसी के बीच जो सबसे बड़ा रोल होता है वह कल्पना का होता है। मुक्तिबोध का ही कथन मानें तो सृजनशीलता का दारोमदार उसी कल्पना पर होता है। इसका मतलब यही है कि कल्पना एक संयोजिका शक्ति है। अगर वह न हो तो सारा शीराजा बिखर जाएगा।
यह कल्पना क्या है? भारतीय काव्य-शास्त्र की पदावली में कल्पना शब्द तो मिलता नहीं। प्रतिभा संबंधी आधुनिक विवेचनों में कुछेक शोधकर्ताओं ने जरूर प्रतिभा शक्ति को सर्जक की कल्पना शक्ति कहा है। आचार्य शुक्ल ने तो अपनी आचार्य-भाषा में बगैर कोई लाग-लपेट लगाए कह दिया कि भावना या कल्पना एक ही बात है। इसलिए काव्य-वृहत्तर अर्थ में साहित्य एक भावयोग है। भावना, उपासना, ध्यान आदि शब्दों की याद दिलाते हुए वे फिर समझाने पर उतर आते हैं- जिस प्रकार भक्ति के लिए उपासना या ध्यान की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार और भावों के प्रवर्तन के लिए भी भावना या कल्पना अपेक्षित होती है। जिनकी भावना या कल्पना शिथिल या अशक्त होती है, किसी कविता या सरस उक्ति को पढ़-सुन कर उनके हृदय में मार्मिकता होते हुए भी वैसी अनुभूति नहीं होती। बात यह है कि उनके अंत:करण में चटपट वह ‘सजीव और स्पष्ट मूर्तिविधान’ नहीं होता, जो भावों को परिचालित कर देता है। इसका मतलब यही कि कल्पना की एक और शक्ति भावों का परिचालन भी है। निष्कर्ष रूप में संयोजन और परिचालन। इस संयोजन व्यापार की व्याख्या करते हुए मुक्तिबोध कहते हैं- ‘वही कल्पना उसे वास्तविक अनुभव की व्यक्तिबद्ध पीड़ाओं से हटा कर, उस अनुभव ही को दृश्यवत करके, उसी अनुभव को नए रूप में उपस्थित कर देती है। किंतु यह अनुभव दृश्यवत होते ही मूल अनुभव से पृथक होकर भिन्न हो जाता है। इस दृश्यवत उपस्थित और विस्तृत अनुभव या फैंटेसी में, (जो कला का दूसरा क्षण है) अनुभविता अर्थात फैंटेसी का जनक-दर्शक, जीवन के नए-नए अर्थ ढूंढ़ने लगता है, अनुभव-प्रसूत फैंटेसी में जीवन के अर्थ खोजने और उसमें आनंद लेने की इस प्रक्रिया में ही जो प्रसन्न भावना पैदा होती है, वही एस्थेटिक एक्सपीरिएंस का मर्म है।’ आगे की बातों में उनके कहने का सार यह है कि यह सारा जिम्मा कल्पना अपने कंधों पर स्वाभाविक ढंग से उठा लेती है। तभी तो पाठक को नए-नए अर्थ-महत्त्व और अर्थ-संकेत प्राप्त होते जाते हैं। यही उसकी कलानुभूति है।
प्रसंगवश, यहां यह विचारणीय है कि मुक्तिबोध काव्य-प्रक्रिया के अपने विवेचन-व्यापार में जिन पारिभाषिक पदों का व्यवहार कर रहे हैं वे क्या सर्वथा मौलिक हैं अथवा पश्चिम की काव्यशास्त्रीय पदावली से लिए गए हैं? प्रश्न यह भी है कि क्या भारतीय काव्यशास्त्र में इन बातों को व्यक्त करने के लिए शब्दों का अभाव है? तब भी जिसे वे ‘ऐस्थेटिक एक्सपीरिएंस’ कह उसे ‘आनंद लेने की प्रक्रिया’ कह रहे हैं, वह क्या वही नहीं है जो रस-व्याख्याकार भट्टनायक भोक्तृत्व व्यापार या अभिनवगुप्त साधारणीकरण व्यापार कह रहे हैं और जो आनंद-व्यापार ही है? कल्पना तत्त्व को तो शुक्ल जी भावना-व्यापार कह ही रहे हैं। भारतीय काव्य-शास्त्र की आचार्य परंपरा के लेखक डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी भी क्या इसी को भावकत्व व्यापार नहीं कह रहे? तब मुक्तिबोध को इनसे परे जाकर पारिभाषिक पदों की जरूरत क्यों महसूस हुई? जो भी हो, व्याख्याएं तो उनकी अपनी हैं और वे हम रचनाकारों की मदद भी करती हैं। इससे भी कहीं अधिक वे खुद कवि मुक्तिबोध के काव्य-व्यापार को समझने में हमारी मदद करती हैं। यह परखने में भी कि अति प्रचलित फैशनग्रस्त कविताओं वाले कवियों की भारी भीड़ और आवाजाही से हिंदी कविता का कितना उपकार हो रहा है? क्या वे सचमुच जीवन के तीव्र उत्कट क्षण की अनुभूतियों की उपज हैं? क्या उन्हें उस संयोजिका कल्पना शक्ति का सहारा मिल पाया है जिससे रचना सामूहिक सौंदर्य-व्यापार की परिणति तक पहुंच पाई है?
इधर कई बार ‘स्त्री की आवाज’ और ‘अति प्रतिष्ठित कवियों का पाठ’ जैसे आयोजनों में बहैसियत श्रोता के रूप में शामिल होकर बार-बार इसी निराशापूर्ण मनोदशा में जाना पड़ा कि समकालीन काव्य-पाठ के आयोजनों में कितने भोथरे और निष्प्राण काव्य-बोध और मर्मज्ञता की जरूरत है। कैसी निरीह सामाजिकता की जैसे कि जरूरत न होने पर भी सामाजिक मजबूरी के चलते किसी की शव-यात्रा में जाना पड़े। इन दिनों केवल नेता होना नहीं, कवि होना भी काफी आसान हो गया है। पर नेता का कारोबार तो कुछेक दिनों के लिए चल भी जाता है, कवि का तो बिल्कुल नहीं चलता। मैं ऐसे अनेक कवियों को जानता हूं, जो कविता को भी एक व्यापार बनाए जगह-जगह घूम रहे हैं। कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि बच्चन, बलवीर सिंह ‘रंग’ और नीरज को तो जनता बुलाती और सुनती रहती थी, पर साहित्यिक संस्थाएं अब जिन कवियों/ कवयित्रियों को बुला कर, सुप्रतिष्ठित आसन पर केवल बिठाती ही नहीं, खूब आवभगत भी करती हैं, वे क्या उस सहृदय समाज के योग्य हैं, जिसका काव्य-बोध अत्यंत प्रखर और ग्रहणशील हैं? कहीं वे अपने इन आयोजनों के मार्फत ऐसे कवियों और कविताओं के प्रति वितृष्णा का माहौल तो नहीं पैदा करना चाहतीं और चाहती हैं कि कविता को लेकर एक सामाजिक अरुचि पैदा हो जाए? निश्चय ही उनकी ऐसी मंशा तो कदापि न होगी। तब क्या वे ऐसे सच्चे और खरे कवियों को आमंत्रित क्यों नहीं कर पातीं, जिनसे हिंदी कविता की सचमुच पहचान और रक्षा हो सके। इतना ही क्यों, वह विदग्ध और सहृदय समाज भी जिंदा रह पाने की सुविधा पा सके, जो उसका स्वाभाविक हक है। प्रश्न यह भी कि कविता क्या कोरा विचार-व्यापार है? या प्रथमत: एक बेहद जरूरी सांस्कृतिक-व्यापार जो लोक-जीवन में हमारे सामाजिक संवेदनों की रक्षा ही नहीं, पोषण भी करता है। कविता और साहित्य की जरूरत इसीलिए बराबर बनी रहती है। फिर भी, इस तरह तो नहीं।
