सुरेश सेठ
इतने युग बीत गए, अपना भारत नहीं बदला। वही वर्गभेद जिंदा रहा। एक है उनका भारत और एक हमारा भारत। कभी वे राजमहल, किले, परकोटे, जहां पीढ़ी-दर-पीढ़ी राजा राजमुकुट पहनते थे और अपनी ब्याहता, अपहृत और उधार ली गई रानियों के साथ अलग-अलग राजमहलों में बसते थे। ऐसे निजामे-मुल्क भी थे, जिनकी वर्ष के हर दिन के लिए अलग रानी थी। एक दिन उनकी सेज सजाने के बाद बाकी दिन उनकी देखभाल उनके लौंडे या सोजे करते। किले के परकोटे में उनके अमीर उमरा, धनी सामंत बसते थे, जिनका काम उनके हर उत्सव त्योहार पर तोहफे पेश करना और जीवन भर उनकी विरुदावली गाना था, चाहे गद्य में गाएं, पद्य में गाएं या मौखिक।
इस परकोटे के बाहर गरीब गुरबा की बस्तियां थीं, जहां बसने वाले लोग टूटी खपरैल के नीचे सोते, रात को तारों भरा आसमान देखते थे। राजा की सवारी निकलती तो उसके पीछे गदगद भाव से राजा को देवता का दर्जा देते हुए उसके नाम का जयघोष करते हुए चलते। उसका दरबार सजता था, इजलास जमता तो उस दिन उन्हें वहां जाकर दर्शक बन जाने, तालियां बजाने या फूल बरसाने का मौका मिलता। कुछ नहीं बदला, लेकिन वक्त बीतता गया। संस्कृतनिष्ठ हिंदी में कहूं तो समय की अजस्र धारा बहती रही, और सांस्कृतिक शब्दावली में कहें, इस बीच गंगा में न जाने कितना पानी बह गया। लेकिन इस पानी के बह जाने को क्या करें? समय बदला, समय की तासीर तो नहीं बदली। हां, इस बदलते समय ने देश का बाहरी रूप अवश्य बदल दिया, भीतर की तस्वीर वही रही। देश बहुत दिन तक अठारहवीं सदी के पिछड़े हुए अंधेरों में जीता था। इक्कीसवीं सदी की पुताई उसके चेहरे पर हो गई। यह पुताई दीमक लगे अंधेरों पर डिस्टेंपर की परतों जैसी साबित हुई। आज भी कलेवर बदल कर अठारहवीं सदी जिंदा है।
देश में गंगा ही नहीं, सब नदियों में न जाने कितना पानी बह गया। उनके किनारों पर अमीर उमरा के भीमकाय कल-कारखाने बन गए। इन कारखानों ने आर्थिक विकास की दर बढ़ाने के नाम पर अपने उच्छिष्ट उनमें उड़ेल दिए, अपनी गैसों का कूड़ा उत्सर्जन उनमें बहा दिया, जिसके कारण केवल यहां राम की गंगा ही नहीं, देश की हर सलिला धारा मैली हो गई। इसे पर्यावरण प्रदूषण का मारक तोहफा मिल गया, जिससे जूझते रहे यहां-वहां संत सीचेवाल और उनके कुछ समाज सेवक नहीं, समाज-चिंतित लोग। वे बार-बार हारते रहे, उनकी लेकिन हताशा नहीं हारी। पर हताश तो वे लोग भी नजर नहीं आए, जिन्होंने बदलते समय में समाज सेवक का नामपट्ट अपने घरों के बाहर उपाधि के रूप में लिख लिया है। समय बीत गया। अब किले परकोटे ढह गए, राजमहल खंडहर हो गए, उसकी जगह पर बहुमंजिला इमारतें, उनमें से संचालित बहुराष्ट्रीय कंपनियां आम लोगों का भाग्य नियंत्रित करने लगीं। राजमहल खंडहर हुए, लेकिन उनकी जगह सत्ता की ऊंची-ऊंची वातानुकूलित मीनारें उभर आईं, जिनको लोक प्रतिनिधि का मुकुट सजा चंद करोड़पति, चतुर सुजान भाग्य निर्माता बन कर बैठ गए। राजे-रजवाड़े चले गए। पर लोकतंत्र जो पहले समाज परिवर्तन की इच्छा से उभरा था, धीरे-धीरे एक नए प्रकार के सामंतवाद में तब्दील हो गया, इसे प्रशासन तंत्र की नियामक सत्ता की कुर्सी कहा गया। इस कुर्सी की विशेषता यह थी कि जो इस पर बैठता, वह सदा के लिए इसका होकर रह जाता। फेवीकोल नाम का एक नया द्रव्य भी इन नए दिनों शायद ईजाद हो गया था। इनकी भरपूर मात्रा इन कुर्सियों के आसन पर चिपक गई। जो बैठता इस पर चिपक जाने का स्वर्गिक सुख लेता। आखिरी दम तक कोई इसे छोड़ना नहीं चाहता। उम्र से मजबूर हो जाता, तो अपने भाई-भतीजों के लिए छोड़ जाता। इसलिए इन नए दिनों का मूलमंत्र हो गया है। भाई-भतीजावाद, जो पहले राजा दरबारी थे, उनका नामकरण हुआ नौकरशाह। राज के दरबारी तो वे अपने तीर-तलवार और अस्त्र-शस्त्र से राजा के लिए लड़ते, अब लालफीताशाही और ठंडे बस्तों से शासन प्रक्रिया को जिंदगी बख्सते हैं।
वह उनका भारत था, हवाई मीनारों से नारों और जुमलों के तोहफे बरसाने वाला भारत। नीचे हमारा भारत था। करोड़ों लोगों का भूख, बेकारी, बीमारी और कर्जदारी को अपना भाग्य मान कर जीता भारत। यहां कुछ भी, कहीं भी घट सकता था। नवंबर शुरू में तूफानी बर्फबारी और जून की तपती गरमी में बारिश का सैलाब। कर्म करने का अधिकार मिलने के नाम पर अपने विनयपत्रों पर अफसर के नाम की चिड़िया बिठवाने के लिए अपनी फटी जेब टटोल कर रिश्वत देने की अनिवार्यता। कभी-कभी लोग भ्रष्टाचार की इस निरंतरता से झुंझला उठते, तो उन्हें कह दिया जाता कि शुक्र करो, हमारे राज्य में पिछले राज्य से भ्रष्टाचार कम ही है। उन्होंने तो तुम्हें मैली-कुचैली कमीज दी थी, देखो हमने इसे फक्क सफेद बना दिया। लेकिन यही कमीज पहने रहो। लोग अपनी पहनी कमीज देखना चाहते हैं, लेकिन उनके गले में तो मैले-कुचैले चीथड़े हैं। पिछले राज्य में थे और आज भी वही गले से लिपटे हैं, नागपाश की तरह।
