ईश्वर चंद्र विद्यासागर को लोग समाज सुधारक, दार्शनिक, शिक्षाशास्त्री, लेखक, अनुवादक, मुद्रक, प्रकाशक आदि रूपों में जानते हैं, लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान महिलाओं को सबल बनाने में रहा है। उन्होंने एक ऐसे दौर में महिलाओं को उनके ‘हक की जमीन’ दिलाई, जब उनका घर की चारदीवारी को लांघना भी वर्जित था। इस बदलाव की शुरुआत उन्होंने अपने घर से ही की। उन्होंने अपने इकलौते बेटे की शादी एक विधवा से कराई।
पारंपरिक ढांचे को तोड़ा: पश्चिम बंगाल में जन्मे ईश्वर चंद्र वंद्योपाध्याय स्त्री शिक्षा के समर्थक थे। महिलाओं को लेकर संकीर्ण सोच रखने वाले समाज में उन्होंने विधवा पुनर्विवाह कानून पारित कराने के लिए लोकमत तैयार किया। उनके अथक प्रयासों के बाद विधवा पुनर्विवाह कानून पारित हो पाया। उन्होंने बहुपत्नी, विधवा पुनर्विवाह जैसी तमाम कुरीतियों को तोड़ा। उन्होंने कलकत्ता और अन्य स्थानों पर बालिका विद्यालयों की स्थापना भी की।
विद्यासागर बनने का सफर: उनका मूल नाम ईश्वर चंद्र वंद्योपाध्याय था। पर उनकी विद्वता को देखते हुए उनके गांव के लोगों ने उन्हें ईश्वर चंद्र विद्यासागर बुलाना शुरू कर दिया। उनकी कई विषयों पर अच्छी पकड़ी थी। इस वजह से समाज उन्हें विद्या का सागर मानता था। इस तरह उनका नाम ईश्वर चंद्र विद्यासागर पड़ गया।
बांग्ला और संस्कृत से प्यार: बंगाल पुनर्जागरण के स्तंभों में से एक माने जाने वाले विद्यासागर ने बांग्ला और संस्कृत भाषा के लिए भी काम किया। कलकत्ता के संस्कृत कॉलेज में वे संस्कृत के प्रोफेसर रहे। उसके बाद उसी कॉलेज में प्रिंसिपल के रूप में अपनी सेवा दी। उन्होंने बांग्ला भाषा के गद्य में सुधार किए। गद्य को सरल और आधुनिक बनाया। उन्होंने बांग्ला लिपि की वर्णमाला में सुधार कर उसे तर्कसम्मत बनाया। बांग्ला से उन्हें इतना प्यार था कि उन्होंने बांग्ला भाषा के लिए कई विद्यालय स्थापित किए। इसके अलावा उन्होंने संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए भी काम किया। उन्होंने संस्कृत कॉलेज में पाश्चात्य चिंतन के अध्ययन की शुरुआत की। संस्कृत व्याकरण के नियमों पर एक पुस्तक लिखी, जो आज भी उपयोगी है। उन्हें अंग्रेजी का भी अच्छा ज्ञान था।
‘दया के सागर’ विद्यासागर: उनकी धर्मार्थ प्रकृति और उदारता के कारण उन्हें ‘दयासागर’ या ‘करुणा सागर’ कहा जाता था। उनका व्यक्तित्व नम्र और प्रेरित करने वाला था। विद्यासागर लोगों की मदद हमेशा करते रहते थे। एक बार उन्होंने अपने कस्बे के एक व्यक्ति के निधन पर अंतिम क्रिया और उस मृत व्यक्ति की पत्नी को घर खर्च चलाने के लिए रुपए दिए।
निचली जातियों को बढ़ावा: शिक्षा को बदलाव का माध्यम मानने वाले विद्यासागर ने समाज में शिक्षा के प्रचार-प्रसार पर अधिक बल दिया। उन्होंने सभी जातियों और धर्मों के सभी पुरुषों और महिलाओं को समान शिक्षा प्रदान करने के लिए महत्त्वपूर्ण काम किए। उन्होंने संस्कृत विश्वविद्यालय में उच्च जाति के लोगों के बजाय तथाकथित निम्न जातियों के लोगों को अनुमति दी थी।
विश्वविद्यालय के लिए मदद मांगी: जब वे कलकत्ता विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए चंदा मांगने अयोध्या के नवाब के पास गए, तो नवाब ने विद्यासागर के थैले में अपना जूता डाल दिया। पर विद्यासागर नवाब को धन्यवाद कह कर वहां से चले आए। अगले दिन विद्यासागर ने नवाब के महल के सामने नवाब के जूते की नीलामी एक हजार रुपए में कर दी। यह सुन कर नवाब खुश हुआ और उतनी ही राशि का दान दे दिया। निधन : ईश्वर चंद्र विद्यासागर का निधन सत्तर साल की उम्र में हो गया था।
