मीना गुप्ता
किसने रखा था उस नींव का वह पत्थर जिस पर गुप्ता परिवार का हर सदस्य खुश नजर आ रहा था। सारी बेटियां आ चुकी थी। सुषमा भाभी घर में चारो तरफ दौड़-दौड़कर अपनी खुशी जाहिर कर रही थी।
‘देखो दीदी, किचेन अच्छा बना है न… माड्यूलर किचेन है। मैंने तो मना किया था इनको कि अभी इतना मत खर्च करो, लेकिन इन्होंने नहीं सुना। कहने लगे, दीदी ने कहा है, जब बना रहे हो तो अच्छा ही बनवाओ। बार-बार तो घर नहीं बनते। फिर इन्होंने ठान लिया कि अब बनेगा तो ऐसा ही किचेन। मैंने यह भी कहा कि अभी अपने दो बच्चे भी हैं, धीरे-धीरे उनकी पढ़ाई-लिखाई का खर्च बढ़ता जाएगा… कुछ बचा कर रखो। कहने लगे- अभी मेरे हाथ-पैर भी सलामत हैं। फिर मैं क्या करती! इनके मन में जो आ गया, तो आ गया। अच्छा बना है न दीदी।’ कह कर सुषमा दीदी को टकटकी लगाए उत्तर की प्रतीक्षा करने लगी।
दीदी ने अपनी खुशी जाहिर कर ही दी- ‘हां रे सुषमा! तू बड़ी किस्मत वाली है। बहुत अच्छा है। अब तुझे मजा आएगा।’
‘सही कही आपने, छोटे से कमरे में रहते-रहते ऊब गई थी… तिस पर दो फुट के किचेन में खड़े-खड़े तो पैर दर्द होने लगते थे। दूसरा अंदर आना भी चाहे तो नहीं आ सकता था। कभी-कभी अम्मा आना चाहती थीं, मगर मैं मना कर देती थी। किसी को घर बुलाने में भी संकोच होता था।’
बहुत देर तक सुषमा घर की सारी चीजों को दौड़-दौड़ कर इस तरह दिखाती रही, जैसे वह खुद भी पहली बार देख रही हो। छू-छू कर देखती फिर कहती- ‘देखो दीदी पत्थर कितना चिकना है!’
शायद वह अपने इस घर को कई बार देख चुकी होगी, लेकिन आज मौका था किसी और की निगाहों से अपने घर को देखने का। तारीफ सुनने का। तारीफ करने वाले भी आ चुके थे और वह बारी-बारी सबकी जुबान से तारीफ सुन रही थी। फिर भी कम ही लग रही थी। वह बोलती जा रही थी और दीदी खुश हो रही थीं। उनके चेहरे के भावों को देख वह आश्वस्त हो जाती- ‘मैं इनसे कहती थी, देखना दीदी को यह बहुत अच्छा लगेगा।’
इतने में ही भाई आया। ‘लो दीदी आ गए।’ कह कर वह दूसरे मेहमानों में व्यस्त हो गई।
‘क्यों, कैसा बना है घर मेरा?’ भाई ने प्रशंसात्मक निगाहों से घर को निहारते हुए पूछा।
बड़ी दीदी ने कहा- ‘बहुत अच्छा… मन खुश हो गया।’
‘हो गया न?’ जोर से हंसा ‘…तुमने जैसा कहा, मैंने वैसा ही किया।… पैसा तो लग गया, लेकिन मजा आ गया। जो भी देखता है, कहता है- शिव, तुमने घर एकदम सोच-समझ कर बनवाया है! कोई जगह बेमतलब नहीं गई। किचेन तो पूछो मत।… अभी कस्बे में किसी के घर ऐसा किचेन नहीं बना।’
‘बहुत खुश है तुम्हारी घरवाली।’ दीदी ने उसकी बात को पूरा करते हुए कहा।
‘हां क्यों न होगी, उसके काम की जगह है।… और आगे आओ दिखाता हूं… देखो, यह कन्हैया और मिस्टी का कमरा है। एक कोना मिस्टी का, एक कोना कान्हा का।’
‘ऐसा?’
‘हां… ये देखो, इस कमरे की डिजाइन मैंने नेट से सर्च की थी। बहुत सुंदर-सुंदर डिजाइन थी, मगर एस्टीमेट से ज्यादा हो रहा था।’
‘चलो कोई बात नहीं, यह भी बहुत अच्छा है।’
‘हां फिर आगे भी तो देखना है। दोनों बच्चों की पढ़ाई-लिखाई अभी बाकी है। चलो अब तुम्हें अपना बेडरूम दिखाता हूं।’
‘अरे, दीदी अभी-अभी तो आई हैं थोडा आराम कर लेने दो।’ अपनी खुशी को संभालते हुए सुषमा ने कहा। ‘दीदी चलिए चाय बन गई है।’
‘चलो आती हूं।’
‘मैंने सारे कमरों में लकड़ी का जो काम कराया है, उसमें ही पांच लाख लग गए… दरवाजे पूरे सागौन के हैं… बेड भी सागौन का है… अटैच बाथरूम है।’ बिना रुके वह बोलता रहा- ‘है न बढ़िया!’
दीदी ने खुश होते कहा- ‘हां अच्छा है… सब अच्छा है।’
‘अभी तो पूजा का कमरा बाकी है। चलो बाद में दिखाता हूं। पहले चाय लेलो।’
चाय पीते-पीते बोला- ‘तुम अपना घर कब बनाओगी?’
दीदी ने लंबी चुस्की ली और बोली- ‘हम बंजारों की बात न पूछो।’
‘क्यों?’
‘कहां घर बनवाएं… और किसके लिए बनवाएं, जब रहना नहीं टिक कर एक जगह…। पता नहीं कब ट्रांसफर आ जाए और माया-जाल छोड़ जाना पड़े। जब रिटायरमेंट होगा, तब कोई दो कमरे का फ्लैट ले लेंगे।’
चाय खत्म हो चुकी थी। वह और बेताब हो रहा था अपना घर दिखाने के लिए।
नीचे तीन-चार सीढ़ियां उतर कर तहखाने-सा एक कमरा था। अंधेरा था, रोशनी एक ही स्विच में भर गई। सारी बिजलियां चमक उठीं।
‘अरे वाह! क्या बात है… मगर इस कमरे का उद्देश्य… नहीं समझी।’ दीदी ने आंखें सिकोड़ते हुए कहा।
‘यहां हम लोग पार्टी किया करेंगे। देखो, चारों तरफ म्यूजिक सिस्टम्स हैं।’ दीवार से सटे हुए से सोफे एक-दूसरे से बातें करते से नजर आ रहे थे। एक बटन दबाई, धुन बज उठी। वह खुशी में झूम उठा। वह बहुत देर तक खुशी में झूमता रहा। अक्सर जब वह खुश होता है, नाच उठता है। दीदी उसे देखती रही। फिर बोली- ‘चलो शिव, अब मैं नहा लेती हूं।’
‘अरे अभी कैसे? अभी तो पूजा वाला कमरा दिखाना बाकी है।… देखो, यहां शंकर जी बैठेंगे… बप्पा के देवता।…’
‘…और उनके रक्षक कहां गए?’
‘वह अभी भी रहते हैं… बगीचे के कोने में उनका घर है। लोगों ने कहा, बिल ढकवा दो, उसका आना-जाना बंद हो जाएगा। मगर मैंने नहीं किया। बप्पा ने भी तो मना कर दिया था, जब लोगों ने कहा था कि सेठ जी, मंदिर में कई बार नाग आता है… मरवा दीजिए। मगर बाप्पा का आदेश था कि कोई उन्हें हाथ भी नहीं लगाएगा।’
‘हां, वह तो ठीक है। पर वैसे भी आस्था और भक्ति के जमाने नहीं रहे। यह कलियुग है। किसी को किसी पर विश्वास नहीं है… संभल कर रहना।’ कह कर दीदी नहाने चली गई।
नहा कर निकली ही थी कि ‘जानती हो मेन्यू क्या-क्या है?’ शिव बोला।
‘मेन्यू बाद में बाताना, पहले यह बताओ कि हलवाई कहां का है?’ दीदी ने पूछा।
‘कानपुर का है… एक नंबर खाना बनाता है। सामने वालों ने अपने बेटे की शादी में उसी को बुलाया था। तभी उससे बात कर ली थी।’
‘क्या रखा है मेन्यू में?’
‘मेनू में क्या नहीं है, यह पूछो।’
‘अच्छा!’
‘पनीर-चिल्ली तो पुरानी हो गई, अब पनीर की नई डिश मिलेगी… चारों तरह की रोटियां हैं… चाट का अलग स्टाल लगेगा, चाय-कॉफी का अलग…। और हां, उसी दिन कान्हा का जन्मदिन है, तो बच्चों का एक अलग कॉर्नर रहेगा। शाम को ही केक काट लेंगे। नहीं तो भीड़ हो जाएगी… और हां, एकदम गरम दूध है मलाई मार के। राजस्थान से बुलवाया है। देखना, कितनी स्टाइल में दूध फेंटते हैं।’
‘तो क्या तुम बेटी की शादी करने जा रहे हो?’ दीदी ने हंसते हुए कहा।
‘हां यह घर मेरी मेरी मेहनत की कमाई का है। बड़े-बड़े सपने देखे थे इसे लेकर मैंने। और आज मुझे अपनी बेटी की तरह प्यारा है। इसकी एक-एक र्इंट से प्यार है। हर कोने से यह घर जब देखता हूं तो सोचता हूं, यह वही घर है जिसके मैं सपने देखता था! विश्वास नहीं होता। किचेन तो तीन बार टूटा है। हर बार कोई न कोई कमी रह ही जाती थी।’ कह कर देर तक हंसता रहा और बोला- ‘जानती हो सब हंसते थे, जब किचेन टूटता था।’
सुषमा किचेन से ही चिढ़ाते हुए बोली- ‘दीदी, मोहल्ले वाले कहते थे पागल है… पैसा बर्बाद कर रहा है।’
वह बोला- ‘वे क्या जानें घर कैसे बनता है? मुझसे पूछो कि कैसे बनवाया है इसे मैंने!’
‘मुझे मालूम है, तुम मेहनती हो और शौकीन भी।…’ दीदी ने उसकी तारीफ करते हुए उसकी बात का समर्थन किया।
‘यह घर मेरी संतान से कम नहीं।… जानती हो, इसका एक-एक पत्थर मुझे कितना प्यारा है। इसकी दीवारों पर लगे पत्थरों की डिजाइन को उभारने के लिए मैं घंटों इन्हें घिसता था। पत्थरों में छोटे-छोटे जो फूल उभर आए हैं, यों ही नहीं… इनको उभारने में मैं मजदूरों की मदद करता था। पत्थरों को तराश कर कर मैंने ये फूल इनमें खिलाए हैं।’
सुषमा ने यहां अपनी गवाही जरूरी समझते हुए कहा- ‘हां दीदी, बड़ी मेहनत की है इन्होंने।’
‘आगे गेट पर जो लकड़ी का वेलकम बना है, जानती हो वह पूरे एक महीने में बना है। जितनी देर काम होता था, मैं वहीं खड़ा रहता था।’ बिस्तर पर ढेर होते हुए बोला- ‘…थक जाता था फिर भी।’
‘तो, तुम्हरा काम-धंधा?…’
‘वह तो चलता रहता है।… फोन है न… काम नहीं रुकता मेरा। सब हो जाता था, सुषमा भी अब संभाल लेती है।’
शिव का दोस्त भी आ गया- ‘रे दीदी! यह बहुत बड़ा पागल था।’
शिव दीवारों पर हाथ फेरते हुए फिर बोला- ‘एक-एक र्इंट से प्यार है… यह मेरा सपना था… मेरी तीसरी संतान है।’
यह बात वह कई बार कह चुका था। अलग-अलग अंदाज में। पर दीदी अभी तक जो सुनना चाह रही थी, नहीं कहा था उसने। वह बोली, ‘… तो इसकी नींव से प्यार नहीं है?’
‘मतलब?’
‘मतलब, इस घर की नींव किसने रखी थी… यानी जमीन… जिस पर तुम्हारा सपना खड़ा हुआ है। वह किसने खरीदी थी? आज से करीब पचास साल पुरानी बात है, किसी ने दादाजी से कहा था, शिव मंदिर की स्थापना करवाइए तो आपको आपके कुल का दीपक मिलेगा। दादा ने यह जमीन खरीदी। इसके एक भाग पर मंदिर बनवाया। उनके मरने के बाद वहीं उनकी समाधि बनी। कह गए थे कि मेरा अंतिम संस्कार मंदिर में ही करना। मंदिर की बची हुई जमीन पर ही तुम्हारा महल बना है। अभी तुम्हरा पचास लाख खर्च हुआ… फिर पच्चीस और लगता।’ थोड़ा रुक कर बोली- ‘इस घर की नींव रखने वाले की जगह कहां है, यानी बप्पा की समाधि कहां है?’
‘वह भी है… आओ दिखाता हूं।’ कह कर दीदी का हाथ पकड़ते हुए पीछे ले गया। देखो, यह है समाधि… मैंने इसे ज्यों का त्यों रखा है…।’ देखा, दादा की समाधि पर दो फूल चढ़े थे। अगरबत्ती की सुगंध जानी-पहचानी थी। बोली- ‘यही खुशबू तो पसंद थी दादा को।’
‘हां, दादा को यही खुशबू पसंद थी… इसलिए यही लगाता हूं…’ कह कर शिव ने झाड़ू उठाई और समाधि के इर्द-गिर्द फैले पत्तों को साफ करते बोला- ‘दीदी तुम क्या सोचती हो, मैं इन्हें भूल जाऊंगा? यही तो हमारी नींव के पत्थर हैं।’ दादा की याद में उसके दो आंसू दीदी के आंसुओं से मिल कर चार हो गए। पास ही दादी की समाधि भी थी। उस पर एक डंडा रखा था।
दीदी ने पूछा- ‘दादी अम्मा की समाधि पर यह डंडा क्यों रखा है?’
डंडे को जोर से घुमाते हुए बोला- ‘दादी अम्मा सबसे रक्षा करेगी… इसी तरह तो वह हमें सबसे बचाती थी।’ और जोर-जोर से हंसेने लगा।
उसकी बात सुन दीदी ने भी हंसना चाहा, मगर भावातिरेक में उसका गला भर आया और बोली- ‘काश! आज नींव का पत्थर बाहर आकर देख सकता कि उस पर खड़ी इमारत कितनी खूबसूरत है!’
