प्रेम एक शाश्वत वृत्ति है। युवा मन में प्रेम की विविध छवियां बनती, आकार लेती हैं। प्रेम उनमें सपने, उमंग, उम्मीद, उछाह, विद्रोह रोपता, विकसित करता है। भारतीय साहित्य में प्रेम की महिमा सबने गाई है। प्रेम का एक रूप शरीर में भी कुसुमित, प्रस्फुटित होता है, सो वह भी साहित्य में खूब है। मध्यकाल में प्रेम ऐंद्रीय और मांसल रूप में ज्यादा दिखाई देता है। पर आधुनिकता के प्रभाव में प्रेम में जो खुलापन आया, वह प्रेमोत्सव के रूप में आज किस तरह उपस्थित है, बता रहे हैं राजकुमार।
‘बाहें ये गले हमारे डाल, सखी
मेरे कंधों पर आ जाएं ये बिखरे बाल, सखी
ओठों पर ओठ दहकते हों
आंखों पर आंखें मुंद जाएं
भुजबंधन कसता जाए-
यह आतुर तन उस तन में धंसता जाए
थक जाएं
थक जाएं तेरे कुच मेरे सीने पर धक्धक् कर के
फड़कें
फिर रह जाएं गुंफित जंघाएं
हो जाए वह क्षण जीवन-मरण-विशाल, सखी।’
भला कौन उम्मीद करेगा कि प्रेम की इतनी सघन, सांद्र, विकल, आवेगमयी, कामातुर कविता रघुवीर सहाय ने लिखी होगी! तब जबकि उनकी छवि पाठकों के बीच लोकतंत्र और उसके विघटन और त्रासदी के महावृत्तांत रचने वाले कवि की है। रघुवीर सहाय की राजनीतिक कवि वाली छवि ने उनके ‘प्रेमी कवि’ की छवि का अपहरण कर लिया। यह पाठकों से ज्यादा हिंदी आलोचना की समस्या रही है। हिंदी आलोचना विक्टोरियन नैतिकता की मारी हुई है। वह प्रेम, सेक्स या यौनता विमर्श के नजदीक आते ही छिटकने लगती है। राष्ट्र निर्माण के विमर्श के पास प्रेम, एंद्रिकता और यौनता विमर्श के साहचर्य को फटकने नहीं देती है। उसका स्वर कठोर और दमनकारी हो उठता है। प्रेम और यौनता विमर्श की आलोचनात्मक पद्धति क्यों विकसित नहीं हुई, यह महत्त्वपूर्ण सवाल है। तब जबकि हिंदी पट्टी समाज की रचनाओं में उसकी उपस्थिति पर्याप्त है, लेकिन आलोचना अनुपस्थिति है।
साहित्य में प्रेम
हिंदी में एक से बढ़ कर एक बेहतरीन प्रेम कविताएं पंत, प्रसाद, निराला, बच्चन, अज्ञेय आदि के अलावा अन्य प्रगतिशील और वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध कवियों- नागार्जुन, मुक्तिबोध, शमशेर आदि ने लिखी है। लेकिन सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक-राष्ट्रीय चेतना के निर्माण और प्रतिबद्धता के कारण प्रेम कविताओं को बिसरा दिया गया। युवाओं के दिलों में धड़कते प्रेम, उसकी खुली आकांक्षा और वासनाओं की सतरंगी फिजाओं को स्वर देने वाले धर्मवीर भारती को लगभग दरकिनार ही कर दिया गया। गुनाहों का देवता, कनुप्रिया, ठंडा लोहा जैसी रचनाएं पाठकों के बीच लोकप्रिय हैं, लेकिन आलोचनात्मक विमर्श से गायब। ये गायब हुए नहीं, बल्कि इन्हें कर दिया गया। ‘इन फीरोजी होठों पर बरबाद मेरी जिंदगी…’ और ‘अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे/ अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे/ महज इससे किसी का प्यार मुझको पाप कैसे हो’ लिखने वाले कवि को आलोचकों ने आलोचकीय कर्म में कभी महत्त्व ही नहीं दिया। गिरिजा कुमार माथुर भी देह और गेह के कारण ही कम याद किए जाते हैं। तब जबकि भारतीय साहित्य, संस्कृति और सिनेमा में प्रेम स्थायी भाव रहा है। सुधीश पचौरी ने एक जगह लिखा है कि जहां काव्य में ‘संभोग शृंगार’ होता था वहां आलोचक उसे नैतिकता के मारे ‘संयोग शृंगार’ लिखते हैं।
