रेनू सैनी
उफ्फ यह क्या? अभी टकसाल से निकल कर आया था। मैं कहां आ गिरा? दस रुपए का चमकता हुआ सिक्का बोला।’ ‘चिंता मत करो दस्सू। तुम यहां सुरक्षित हो। मैं तुम्हें सुरक्षित बाहर निकालने का कोई उपाय करती हूं।’ गीली मिट्टी बोली। मिट्टी की ओर देखते हुए दस्सू ने बुरा-सा मुंह बनाया और बोला, ‘अरे, प्लीज दूर हो जाओ मुझसे। तुम्हारा चिपचिपापन और बदबू मुझसे सहन नहीं हो रही।’ मिट्टी ने इधर-उधर देखा और बोली, ‘बदबू…. कहां? बदबू कहां से आ रही है?‘अरे इधर-उधर क्या देख रही हो। तुम्हारे अंदर से बदबू आ रही है।’‘मेरे अंदर से! मेरी महक से तो किसान प्रसन्न हो उठता है, जब बारिश होती है तो सोंधी-सोंधी महक इंसानों तो क्या, पशु-पक्षियों को भी मोहित करती है।’
‘ये अपनी बेवजह की प्रशंसा मत करो। मेरे सामने तुम्हारा कोई मूल्य नहीं है। तुम रास्ते पर बिखरी रहती हो और लोगों के पैरों तले दबाई जाती हो, जबकि मुझे देखो मैं लोगों की अलमारियों की रौनक होता हूं।’
तभी एक छोटा बच्चा टीपू वहां पर आया। उसने चमचमाते दस रुपए के सिक्के को देखा तो उसे निकाल कर अपनी जेब में रख लिया। टीपू की जेब में जाने पर दस्सू ने चैन की सांस ली। टीपू ने दस रुपए के सिक्के से आइसक्रीम खरीद ली।
पांच रुपए का सिक्का दस्सू को देख कर बोला, ‘स्वागत है दोस्त! लगता है तुम तो टकसाल से अभी-अभी निकल कर आए हो।’‘हां कुछ देर पहले निकल कर आया था, लेकिन रास्ते में मैं मिट्टी में धंस गया। मिट्टी में फंसने से मेरी तो जान ही निकल गई थी। उफ्फ कितनी गंदगी थी वहां। मुझसे तो सांस भी नहीं ली जा रही थी।’‘अरे ऐसे क्यों कह रहे हो? आखिर मिट्टी के बिना तो किसी का भी जीवन नहीं।’ दो रुपए का सिक्का बोला। ‘तुम गलत सोच रहे हो। मैं तो मानता हूं कि हमारे सिवा किसी का जीवन नहीं।’
एक रुपए का सिक्का बहुत देर से दस्सू की बातें सुन रहा था। वह बोला, ‘दोस्त तुम अभिमान के नशे में हो। हमारे बिना तो जीवन चल सकता है, लेकिन जिस मिट्टी की तुम इतनी निंदा कर रहे हो, उसके बिना किसी का भी जीवन नहीं चल सकता। मनुष्य से लेकर जीव-जंतु सभी मिट्टी पर निर्भर हैं। उसी के अंदर सब्जी और फल उत्पन्न होते हैं। मिट्टी में ही अनाज उत्पन्न होता है। तब कहीं हमसे इन सामान का लेन-देन किया जाता है। ‘तुम चुप रहो। तुम यह सब इसलिए कह रहे हो क्योंकि तुम्हारा मूल्य बाजार में बहुत कम है।’ दस रुपए के सिक्के ने किसी की नहीं मानी। वह स्वयं पर अभिमान करता रहा और स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और अन्यों को कमतर बताता रहा। कई दिन बीत गए। सभी सिक्के एक लकड़ी की दराज में रखे थे। लाला भौंपूमल के बेटे जिमी को सिक्के एकत्रित करने का बहुत शौक था। इसलिए जब काफी सारे सिक्के इकट्ठे हो जाते तो भौंपूमल उन्हें ले जाकर जिमी को दे देता था। एक दिन ढेर सारे सिक्के इकट्ठे होने पर लाला भौंपूमल ने उन्हें उठाया और जिमी को पकड़ा दिया। जिमी बहुत खुश हुआ। उसने दस रुपए के नए सिक्के को उठाया और बोला, ‘वाह यह तो बहुत चमक रहा है। मैं इन सारे सिक्कों को अपनी गुल्लक में डाल देता हूं। जब गुल्लक भर जाएगी तो मैं इन्हें निकालूंगा।’
उसने जल्दी से अपनी मिट्टी की गुल्लक में सारे सिक्कों को डाल दिया। गुल्लक में जाने के बाद दस रुपए के सिक्के को घुटन सी महसूस हुई। वह बोला, ‘यहां तो अंधकार है। ये हम कहां आ गए?’
तभी मिट्टी की गुल्लक बोली, ‘डरो मत दस्सू! तुम यहां भी बिल्कुल सुरक्षित हो। यह आवाज दस रुपए के सिक्के को कुछ जानी-पहचानी-सी लगी। वह बोला, ‘अरे तुम तो वही मिट्टी हो, जो उस दिन मुझे मिली थी। तुम यहां कैसे आ गई?’
मिट्टी की गुल्लक मुस्कराते हुए बोली, ‘मेरे अनेक रूप होते हैं। मुझे अपने अनेक रूप पर गर्व है। जब मैं सड़क का रूप ले लेती हूं तो लोगों को उनके गंतव्य तक पहुंचाती हूं, जब मैं किसानों द्वारा खेतों में प्रयोग की जाती हूं तो मुझ पर फसलें लहलहाती हैं, जब मेरे द्वारा प्रसाधन तैयार किए जाते हैं, तो मैं लोगों के रूप-रंग को चमकाती हूं, जब मेरा प्रयोग करके घर बनाए जाते हैं, तो मैं लोगों की छत बन जाती हूं और जब मैं गुल्लक बन जाती हूं, तो तुम सबको सुरक्षित रखती हूं।’
गुल्लक की बात सुन कर अब दस रुपए के सिक्के का अभिमान कम हो गया था। अब वह अपनी आवाज धीमी कर बोला, ‘मिट्टी, तुम सचमुच महान हो। इतने महान काम करती हो, फिर भी अभिमान जरा नहीं करती। मैं भी अब से ऐसा ही करूंगा। मुझे माफ कर दो।’
दस रुपए के सिक्के की बात सुन कर मिट्टी की गुल्लक मुस्कराती हुई बोली, ‘अभी कुछ दिनों पहले ही तो तुम्हारा जन्म हुआ है। इतनी जल्दी समझदारी की बात भी करने लगे।’
यह सुन कर सभी सिक्के बोले, ‘जहां आपकी छत्रछाया हो वहां समझदार होते देर कहां लगती है भला?’ यह सुन कर गुल्लक मुस्कराने लगी और साथ ही सारे सिक्के गुल्लक के अंदर खनकते हुए मुस्करा रहे थे। इस खनक में दस रुपए के सिक्के की खनक भी शामिल थी, जो अब बिल्कुल बदल चुका था।

