हेमंत कुमार पारीक
भारती के सामने सुबह का अखबार पड़ा था। उसके मुखपृष्ठ पर नीचे की तरफ टेनिस खिलाड़ी अंजली का एक फोटो छपा था। लिखा था, अंजली पहले राउंड में बाहर।… वह अंदर जा रही थी चाय बनाने। फोटो देखते ही अचानक ठिठक कर रुक गई। अखबार उठा लिया। उसे अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हुआ। बड़बड़ाई, ये नहीं हो सकता!… उसने दूसरा अंग्रेजी वाला अखबार उठाया। उसमें लिखा था अंजली बीटन बाई…। वह ढीली पड़ गई। आगे पढ़ने लगी- ‘अंजली पहले दौर से बाहर…। उसके लंबे करिअर में सबसे बड़ी शिकस्त! आगे लिखा था, बेटी के जन्म के बाद से तो वह अजीब-सी उदासी से जूझ रही है।’ उसने अंग्रेजी अखबार उठा लिया। उसे पूरा पढ़ा। कमोबेश दोनों अखबारों का सार एक ही था। वह सोचने लगी। अंजली और खेल के बीच बेबी कहीं है। उसका सिर चकराने लगा। उसने भी अपना करिअर बनाने के लिए अच्छी खासी सरकारी नौकरी छोड़ कारपोरेट जॉब चुना था। सरकारी नौकरी से इस्तीफा देते समय अपने अफसर श्रीकांत से बोली थी, ‘सर, मैं फॉरेन जाना चाहती हूं। इसलिए यह नौकरी छोड़ रही हूं।…’ श्रीकांत ने उसके भविष्य की मंगलकामना करते हुए उसे विदाई पार्टी दी थी। उसके बाद से अब तक वह तीसरी बार अपने पति को छोड़ अम्मा-बाबूजी के पास वापस चली आई थी। वजह करिअर ही तो था। वह बच्चा नहीं चाहती और पति सुमित हरदम बच्चे के लिए उस पर दबाव बनाए रहता है। जब बात हद से आगे बढ़ने लगती है तो वह निकल पड़ती है। इस बार भी वह निकली, पर सुमित को पता नहीं चला। इस बार के लौटने और पहले वाले लौटने में अंतर था। पहले वह लड़-झगड़ कर आती थी, पर इस बार चुपके से आई थी, वापस नहीं जाने के लिए। सुमित के लिए शक की कोई जगह नहीं छोड़ी थी। आने के पहले गाड़ी सर्विसिंग के लिए डाली थी। सुमित ने पूछा भी था, दो माह पहले सर्विसिंग कराई थी। अभी क्या जरूरत है? वह बोली, गाड़ी की बैलेंसिंग और एलाइनमेंट चैक कराना जरूरी है। कुछ गड़बड़ करती है।’ सुमित कुछ बोला नहीं। कुछ देर खड़ा-खड़ा सुमित उसके चेहरे को जांचता रहा। वह अपनी योजना में कामयाब रही। तभी मोबाइल बज उठा। उसने मोबाइल पर नंबर देखा और उसे बजता ही छोड़ दिया। मगर बच्चे के खयाल में खो गई। सोचने लगी, बच्चा बड़ा या करिअर!… अपने करिअर के लिए उसने सरकारी नौकरी छोड़ी थी। सुमित से शादी कर कस्बे से शहर में आ गई थी। कारपोरेट जॉब में आगे बढ़ने की संभावनाएं थीं।… मोबाइल फिर बजने लगा था।
अंदर से सुधा ने आवाज दी, देख तो सही किसका फोन है?’ उसने वहीं से जवाब दिया, किसका होगा अम्मा?… वही एक तो है तुम्हारा प्यारा जंवाई। यहां भी चैन से नहीं रहने देगा।’ ‘बात तो कर ले बेटा, उसे तेरी चिंता-फिकर होगी।’ ‘जानती हूं कितनी चिंता फिकर है उसे? वही एक राग अलापता है, बच्चा चाहिए…।’ ‘और तू भाग-भाग कर चली आती है यहां। अपनी उमर तो देख?’ ‘क्या देखूं? मैंने तो पहले ही कहा था कि लड़का मुझे पसंद नहीं है, पर तुम लोग तो हाथ धोकर पीछे पड़े थे। लंबा-चौड़ा, गोरा भक्क खानदानी लड़का दिखा और टूट पड़े। पता है, डॉक्टर कहता है कि वह साइकिक है!’ ‘डॉक्टर ने कहा और तूने मान लिया। देखा है कभी अपने आपको?… कितने लड़के देखे थे तेरे लिए। एक बार जो देखने आया, दोबारा पलटा नहीं। कभी आईने में अपनी शक्ल देख लिया कर। चेहरे पर खुशी की एक लाइन भी नहीं दिखती। हरदम चेहरा फूला-फूला उदास-सा लिए घूमती-फिरती है।’ ‘बस, चुप हो जा अम्मा! जैसा पाला-पोसा वही तो हूं।’ ‘मगर हमारी तरफ भी देख ले एक बार… अपने बाबूजी को देखा है, सत्तर के पार हैं। और तेरी उम्र भी कम नहीं है। छत्तीस-सैंतीस की हो रही है। एक-दो साल और ठहर जा, बूढ़ी दिखने लगेगी। अरे, आना ही था तो कम से कम उसे बता कर आती।’ ‘बता देती तो क्या वो आने देता? भगोड़ी तो कहता फिरता है। जासूस लगा देता मेरे पीछे। तुझे पता नहीं, हर पांच मिनट में फोन करता था। पूछता, कहां हो? किसके साथ हो?… अब तू ही बता नौकरी करती हूं। प्राइवेट जॉब है। कस्टमर से तो बात करना ही पड़ती है। उसे तो मेरी पगार से मतलब है। और एक बच्चा चाहता है, ताकि मेरे पैरों में जंजीर डाल सके। क्या उसकी जरखरीद गुलाम बन जाऊं?…
मोबाइल फिर बजा। उसने मोबाइल को तुरंत साइलेंट मोड पर डाल दिया और अखबार वहीं पटक कर गुसलखाने की तरफ चल पड़ी।
गुसलखाने से नहा-धोकर लौटी। आदमकद आईने के सामने आ खड़ी हुई तो उसे अम्मा की बात याद आ गई। आईने में अपने आप को निहारने लगी और खुद बड़बड़ाने लगी, कहीं कुछ तो है नहीं… बस थोड़े से पिंपल हंै। चेचक के कुछ दाग बचे हैं।… पीछे अम्मा खड़ी थीं- ‘नहा लिया बेटा?’ मां की आवाज सुन वह पलटी। ‘हां अम्मा, पर अब बता मेरी शक्ल को क्या हुआ है?’ सुधा मुस्कुरा दी, बेटा, गुस्से में कभी-कभी मुंह से निकल जाता है। ऐसी छोटी-छोटी बातों को दिल पर नहीं लेते। मैं तो तेरे भले के लिए कहती हूं। एक संतान हो जाएगी, तो सब ठीक हो जाएगा। आदमी के मन को तू नहीं समझती। समाज को दिखाना चाहता है कि वह पुरुष है। और इसलिए वह भी चाहता है एक बच्चा। पुरुष होने का सबूत! देखना बच्चा होने के बाद वह तेरे आगे-पीछे मंडराने लगेगा।’
‘अभी क्या कम मंडराता है? दिन भर फोन करता रहता है। जैसे कि मेरे सिवाय इस दुनिया में उसका कोई और नहीं।…’ मां हंस दी। ‘पत्रकार है। खोज-खबर रखना उसका काम है। पेशा है।’ ‘मगर अम्मा, इतनी बड़ी दुनिया पड़ी है। मेरे पीछे ही क्यों पड़ा रहता है? नौकरी क्यों करा रहा है? घर में बिठा लें और दिन भर सामने बैठा रहे।… पर ऐसा कर नहीं सकता। दूध देती गाय हूं न!’ ‘अब तेरे से बहस में कौन जीत सकता है?’ ‘बहस नहीं कर रही हूं, हकीकत बता रही हूं कि ऐसे आदमी के साथ जिंदगी भर कौन रह सकता है, जिसे अपनी पत्न पर ही भरोसा नहीं?… सुधा ने कोई जवाब नहीं दिया। चुपचाप वापस लौट गई।
उसने फिर अखबार की तरफ नजर डाली। वे ज्यों के त्यों पड़े थे। मोबाइल लिए छज्जे पर आ गई। एक नजर मोबाइल पर डाली। मिस कॉल भरे पड़े थे। सभी सुमित के थे। लापरवाही से देखा उसने और बाल सुलझाने लगी। तभी सीढ़ियों पर कदमों की आहट हुई। बाजार से लौट आए थे शिवराम। उसने पलट कर देखा। हांफते से खड़े थे उसके सामने। सब्जी का थैला हाथ में था। ‘थक गए बाबूजी?’ उसने शिवराम की तरफ देखते हुए कहा। ‘हां बेटा, उम्र ही ऐसी है, वरना पहले दौड़ते हुए सीढ़ियां चढ़ जाता था। तुझे पता नहीं एक दफे असीरगढ़ की खड़ी सीढ़ियां भागते-भागते चढ़ गया था।’ शिवराम ने विषय बदलते हुए पूछा, ‘सुमित का फोन आया था क्या?’
उसने मोबाइल की तरफ देखा। बोली, ‘हां बाबूजी।’ ‘तूने बात नहीं की उससे?’ ‘क्या बात करुं? आप तो सब जानते हैं।’ ‘ठीक है पर बात करने में क्या हर्ज है?’ ‘दो दफे तो वापस चली गई थी। मगर उसके व्यवहार में कोई फर्क नहीं पड़ा। यहां रोते-रोते चला आता है। मिन्नतें करके वापस ले जाता है और फिर वही ढाक के तीन पात!’ ‘मगर बेटा, जो हो गया सो हो गया, अब निभाना तो है ही। सब किस्मत के खेल हैं। खानदानी लड़का देखा था।… तू फिकर मत कर, आने दे उसे।’ ‘लेकिन अब मैं वापस नहीं जाने वाली। इस बारे में अब आप कुछ मत कहना। डिवोर्स के सारे पेपर तैयार करवा लिए हैं मैंने।’
शिवराम ने उसकी तरफ देखा। बोलने को कुछ नहीं बचा था। उन्होंने अंदर की तरफ आवाज लगाई, सुधा ये सब्जियां ले जा…।’ सुनते ही अम्मा बाहर आर्इं, थैला उठाया, उसकी तरफ एक नजर देखा और अंदर चली गई। शायद वह नाराज थी, वरना कुछ न कुछ तो कहती। पीछे-पीछे वह भी अंदर की तरफ चल पड़ी। अखबार हाथ में उठा लिया। अंजली और उसकी नवजात को गौर से देखने लगी। सुबह ठंड थी, उजली-उजली धूप में छज्जे पर खड़ी बाल सुखा रही थी कि नीचे कार का हार्न बजा। सुमित की कार के हार्न की आवाज पहचानती है। नीचे झांक कर देखा उसने। स्लेटी रंग की कार खड़ी थी। शादी के पहले उस कार को देख कर वह अंदर भागती थी। अम्मा से कहती थी, वो आ गए हैं।… और अम्मा मुस्कुरा देती थी। कहती, अभी से ये हाल है तो शादी के बाद क्या होगा?… पर अब वह अविचल खड़ी थी। कोई उत्साह नहीं था। बल्कि चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था। मानो कोई आपदा दरवाजे पर खड़ी दस्तक दे रही है। वहां से कहीं भाग जाने का मन कर रहा था। उसका सामना करने की सामर्थ्य नहीं बची थी उसमें। सुमित कार से बाहर आया। ऊपर छज्जे पर नजर डाली। उसे ऊपर खड़ा देख मुस्कुराया, हाथ हिलाया, पर उसने कोई जवाब नहीं दिया। बल्कि अंदर की तरफ चली गई।
उस वक्त सुधा पूजा में बैठी थी और शिवराम खाट पर लेटे-लेटे बासी अखबार पलट रहे थे। अखबार के मुखपृष्ठ पर छपा अंजली का फोटो उल्टा होकर पीछे की तरफ लटक गया था। इनसेट में छपा बच्ची की फोटो मानो उस पर व्यंगपूर्ण मुस्कान फेंक रहा था। ऐसा लगा उसे कि वह अभी फोटो से बाहर आकर मां-मां चिल्लाने लगेगी। उसकी आंखें भर आर्इं। मन डांवाडोल होने लगा। जिस विश्वास से वह वापस लौटी थी उसकी नींव हिलने लगी थी। उसने अपने आप पर काबू किया और बोली, ‘पापा, सुमित आया है।’ शिवराम चांैक कर खाट से उठ खड़े हुए। अखबार वहीं मोड़ कर पटक दिया। बड़बड़ाने लगे, ‘पीछे-पीछे फिर चला आया। तुलसीदास बन रहा है।…’ अम्मा ने भी सुन लिया था। जल्दी-जल्दी पूजा खत्म करने लगी। तेजी से घंटी बजाने लगी थी।
तब तक सुमित दरवाजे पर आ खड़ा हुआ। उसे देखते ही वह चेहरा घुमाकर खड़ी हो गई। क्या कहे? शब्द नहीं निकल रहे थे। सुमित को देखते ही शिवराम ढीले पड़ गए, आइए-आइए, कंवर साहब! आइए, बैठिए।
सुमित खाट पर बैठ गया। अम्मा आरती की थाली लिए खड़ी थी उसके सामने। कुछ देर तक सन्नाटा पसरा रहा। फिर शिवराम बोले, ‘क्यों आए हो?’ उसने भारती की तरफ देखा, ‘आपकी लाड़ली फिर भाग आई है। गजब कर दिया। इस बार तो पूरी प्लानिंग से आई है। मैंने तो पुलिस में रपट भी लिखवा दी है। इस तरह बिना बताए कोई घर छोड़ता है क्या?’ शिवराम का चेहरा तन गया। ‘और इस तरह कोई अपनी बीवी को रखता है क्या? घर है या कैदखाना? बीवी है या जरखरीद गुलाम?’… भारती सांस रोके सुन रही थी। उसने दोबारा उसे देखा और बोला, ‘बाबूजी मेरी ब्याहता है। उसे तो मेरे हिसाब से ही रहना चाहिए।’ शिवराम व्यंग से मुस्कुराए, ‘वो जमाने गए जनाब जब औरतें फुंकनी से चूल्हा फूंका करती थीं। अब गैस है और लाइटर भी। होश में आइए! आप तो पत्रकार हंै। औरत के हक और आजादी की लड़ाई लड़ने वाले।’…. ‘बाबूजी, आपने इसकी हरकतें नहीं देखीं। जापान और जर्मनी जाने की बातें करती है। हकीकत से दूर दिन-रात सपने बुनती रहती है। और मेरी मां एक पोता चाहती है। क्या गलत बात है? पत्नी धर्म क्या होता है, इसे पता नहीं। पागल बना दिया है इसने मुझे। छत्तीस साल की हो रही है और अब भी बचकानी हरकतें? और चार-पांच साल बाद इसे कौन पूछेगा?…’
बात बढ़ने लगी थी। बीच में सुधा आ गई। सुमित की तरफ मुखाबित होकर बोली, ‘पहले आरती ले लो कंवर साहब, फिर लड़ते रहना।’ उसने आरती ली और प्रसाद के लिए हाथ आगे बढ़ा दिया। शिवराम को आरती देते हुए सुमित से बोली, ‘बेटा, ससुर बाप जैसे होते हैं। इस तरह कोई बहसबाजी करता है क्या?’ उसने भारती की तरफ देखा, ‘और तू खड़ी-खड़ी क्या देख रही है? अंदर जा, चाय-नाश्ता बना ला।’ भारती के अंदर जाते ही सुधा दरी बिछा कर सामने बैठ गई। बोली, ‘कंवर साहब, शादी के बाद शुरू-शुरू में झगड़े होते रहते हैं मियां बीवी में, पर बाद में सब ठीक हो जाता है। एकाध बच्चा होगा, तो जिम्मेदारी आ जाएगी। माफ करना, कंवर साहब, अभी बचपना है मेरी बेटी में। पन एक बात याद रखना, कांच और औरत में फर्क नहीं होता। संभाल कर रखना पड़ता है। इस बार तो हम उसे फिर समझा-बुझा कर भेज देंगे, पर आगे उसे रोक नहीं पाएंगे। उसने तो हमें बताए बिना डिवोर्स पेपर तक तैयार कर लिए हैं।…’
सुमित के चेहरे से तनाव के बादल छंटने लगे थे। तभी भारती चाय-नाश्ता ले आई। सामने स्टूल पर रख दिया और हाथ बांधे कोने में जा खड़ी हुई।
सुधा ने उसकी तरफ देखा, तेरी क्या मंशा है?’ उसने अखबार की तरफ देखा। उसे अंजली का चेहरा टेढ़ा लगने लगा। इनसेट में बच्चे की तरफ देख बोली, ‘अब नहीं रहना इनके साथ।’ ‘तो फिर..? कहां जाएगी?’ ‘यहीं रहूंगी तेरे पास।’ ‘ठीक है। तुझे बेटे की तरह पाला है। ये सब तेरा है, पर कब तक? आखिर में पति का घर ही सब कुछ होता है। हम लोग कब तक तेरे साथ रहेंगे? तेरी पूरी जिंदगी पड़ी है। और अब तेरे साथ कौन शादी करेगा?’ ‘कर लूंगी किसी भिखारी या अपंग से…।’ बोलते-बोलते गला भर आया उसका। सुधा सुमित की तरफ मुखातिब होकर बोली, सुन लिया कंवर साहब! आखिरी बार भेज देंगे आपके साथ। अगर फिर लौट कर आई तो…?’ सुमित कुछ बोला नहीं। सिर झुका लिया था।
अपने पुराने आॅफिस में दो महीने बाद लौटी थी। श्रीकांत का इंतजार करने लगी उसके कमरे के सामने। चेहरा बुझा-बुझा था। उसे देखते ही श्रीकांत बोला, ‘बेलकम होम! इस बार काफी लंबा समय हो गया भारती? पहले से मोटी हो गई हो!’ वह बोली, ‘सर मैंने कहा था कि दोबारा नहीं आऊंगी यहां, पर मुझे फिर लौटना पड़ा। ये समाज के ताने-बाने मकड़ी के जाले होते हैं। एक बार फंसने के बाद निकलना बेहद मुश्किल होता है। जाले में जितना छटपटाता है कीड़ा उतना ही उलझता जाता है। सर, आपने मकड़ी के जाले में फंसे कीड़े को देखा है?’
श्रीकांत हल्के से मुस्कुराया। बोला, ‘खैर, छोड़ो ये सब…। देर आयद दुरुस्त आयद! मैं तो चाहता हूं कि तुम्हारा जीवन फूलों से सुगंधित रहे।’ उसने श्रीकांत की ओर व्यंगपूर्ण मुस्कान फेंकी- ‘पर सर, ये सब मन को बहलाने वाली बातें हैं। हकीकत में जिंदगी कांटों का ताज है।’ उसने पर्स से डॉक्टर का पर्चा निकाला और उसे पकड़ाते हुए बोली, ‘जो नहीं चाहा था वही हुआ। देखिए इसमें..। फिर पिस गई औरत! जो वह चाहता था करके रहा। मेरी चाह के कोई मायने नहीं। एक चीज बन कर रह गई हूं।… अपने पेट की तरफ देख कर बोली, ‘जी चाहता है कि इसे निकाल फेंकंू। फिर विचार आता है कि यह अपने हाथों अपने बच्चे की हत्या होगी और मैं हत्यारी! सबसे बड़ी बात है कि मैं एक औरत हूं। अपनी ममता का क्या करुं?… और वह तो एकदम आजाद हो गया है। पुरुष बन कर फूला नहीं समा रहा है।… आखिर उसने इस माध्यम से अपना वर्चस्व कायम कर ही लिया। हार गई मैं। हार गई एक औरत।…’ ०
