रेनू सैनी
मसी, कहां जा रही हो? यहां आओ। अरे ढोलू, तुम भी यहां आओ। क्या हो गया है तुमको? हम यहां पर घूमने आए हैं और तुम दोनों हर खिलौने की दुकान पर जाकर खड़े हो जाते हो।’ प्रभा ने दोनों बच्चों को डांटते हुए कहा।
‘अरे अब ये पिताजी कहां चले गए?’ प्रणव अजयसिंह को अपने सामने न पाकर खीझ कर बोला।
‘अभी तो यहीं थे, बच्चों के साथ।’
टिमसी और ढोलू भी दादा को ढूंढ़ने में लग गए।
दस मिनट बाद प्रभा और प्रणव ने देखा कि अजयसिंह अपने हाथों में ढेर सारे खिलौने लेकर मुस्कराते हुए आ रहे थे। उन्होंने टिमसी को पानी में चलने वाली रेलगाड़ी का खिलौना पकड़ाया आौर ढोलू को तेजी से चलने वाली कार। दोनों इन्हीं खिलौनों की जिद कर रहे थे। इसके अलावा भी ढेर सारे खिलौने उनके हाथों से भरे हुए थे। प्रभा अजयसिंह की ओर देख कर बोली, ‘ये क्या पिताजी? आपने फिर से इतने खिलौने खरीद लिए। आखिर आप इतने खिलौने क्यों खरीदते हैं? ये कोई आपकी खिलौनों से खेलने की उम्र है!
‘बहू, तुम मुझे खिलौनों के लिए बार-बार मत टोका करो। मेरी खुद की पेंशन आती है। मैं उनसे खिलौने खरीदता हूं, तुम्हारे रुपयों से नहीं।
घर लौट कर टिमसी और ढोलू अपने-अपने खेल में लग गए। अजयसिंह ने अपना पूरा कमरा खिलौनों से भरा हुआ था। उन्होंने अपने नए खिलौनों को भी वहां रख दिया। प्रभा अपने ससुर की इस अजीब-सी हरकत से बहुत परेशान थी। वह अक्सर प्रणव से कहती थी कि पिताजी इस उम्र में पागल हो गए हैं। भला खिलौने भी कोई बूढ़े लोगों के खेलने की चीज होती है। प्रणव भी पिता की इस आदत से परेशान था। आस-पड़ोस के लोगों को भी अजयसिंह की खिलौने एकत्रित करने की इस अजीबोगरीब आदत के बारे में पता था। प्रणव ने कई बार अजयसिंह को समझाने का प्रयास किया, लेकिन अजयसिंह हर बार रूखा-सा जवाब देते और नए-नए खिलौने खरीदना न भूलते।
अजयसिंह को केवल खिलौने एकत्र करते, बल्कि बच्चों को समय-समय पर वे खिलौने बांट भी दिया करते थे। कई बच्चे उनसे खिलौने मांग कर भी ले जाया करते थे। इनमें से अधिकतर बच्चे निर्धन वर्ग के और सड़क पर घूमने वाले होते थे।
एक दिन अजयसिंह सैर करने गए। जब वे वापस आए तो ढेर सारे मैले-कुचैले बच्चे उनके साथ थे। अजयसिंह उन बच्चों को अपने खिलौने वाले कमरे में ले गए और उन्हें मनपसंद खिलौने ले जाने को कहा। बच्चे तेजी से अपनी-अपनी पसंद के खिलौने छांटने लगे। खिलौने लेने के बाद वे हंस-हंस कर अजयसिंह के साथ खेलने लगे। बच्चों के साथ अजयसिंह को मस्ती करते देख कर प्रभा खीझ उठी। वह दिन में आराम करना चाहती थी, लेकिन शोरगुल में उसका आराम करना तो क्या, बैठना भी दूभर हो गया था। शाम को जब प्रणव घर लौटा तो प्रभा गुस्से से फट पड़ी, ‘मुझसे अब पिताजी के साथ नहीं रहा जाता। यहां दो घड़ी भी चैन नहीं मिलता। पिताजी को मनोचिकित्सक को दिखाइए। ऐसे तो हम सब पागल हो जाएंगे।’
प्रणव अजयसिंह को बहला-फुसला कर मनोचिकित्सक के पास ले गए। मनोचिकित्सक अजयसिंह से बातें करते रहे। करीब एक घंटे बाद मनोचिकित्सक मुस्करा बोले, ‘आपके पिताजी तो बहुत होशियार और काबिल व्यक्ति हैं। आपको कैसे लगता है कि वे मानसिक रोगी हैं!’ मनोचिकित्सक की बात सुन कर प्रणव को राहत मिली।
रविवार के दिन अजीतसिंह अपने साथ ढेर सारे बच्चों को लेकर आए। बच्चों ने उनका कुरता पकड़ा हुआ था और वे सभी रेलगाड़ी खेल रहे थे। चिल्लाते हुए बच्चे अजीतसिंह के खिलौनों के कमरे में घुस गए और धमा-चौकड़ी मचाने लगे। शोरगुल में प्रभा परेशान हो गई और बच्चों पर बिफर पड़ी। बच्चे घबरा कर वहां से चले गए। इसके बाद वह प्रणव से बोली, ‘पिताजी असामान्य हो गए हैं। पता नहीं उन्हें खिलौनों से इतना प्रेम क्यों है?’ वह कुछ और बोल पाती तभी उसने अजयसिंह को अपने सामने पाया। अजयसिंह को सामने देख कर प्रभा ने नजरें नीची कर ली। वे प्रभा के पास आकर बोले, ‘बेटी, मैं असमान्य नहीं हंू। तुम जानना चाहती हो कि मैं क्यों खिलौने खरीदता हूं और फिर उन्हें बच्चों में बांट देता हूं? इसलिए कि मेरा बचपन खिलौनों के अभाव में बीता है। मैं बहुत छोटा था। एक दिन मां के साथ बाजार जा रहा था। मुझे एक सैनिक का खिलौना बहुत पसंद आया। मैंने मां से खिलौने के लिए ज्यादा जिद की तो उसने मुझे कस कर एक तमाचा मारा और घर आकर रोने लगी। उस दिन घर में राशन नहीं आ पाया था। पिताजी का देहांत हो चुका था और मां अकेली कमाने वाली थी। वह घरों में काम करती थी। बीमारी के कारण मां के सारे काम छूट गए थे। उस रात भूख से बिलख कर मुझे पता चला कि जिसको दो वक्त की रोटी भी नसीब न होती हो, उसके लिए खिलौनों से खेलना तो बहुत दूर की बात है।
मैंने उसी समय प्रण कर लिया था कि मैं खूब पढ़ूंगा और एक दिन ऐसे पद पर पहुंचूंगा, जहां मुझे किसी चीज की कमी नहीं होगी। मैं पढ़-लिख कर उच्च पद पर पहुंच गया, पर अब खिलौनों से खेलने की उम्र निकल चुकी थी। मुझे पता था कि खिलौनों का अभाव क्या होता है? इसलिए सक्षम होने के बाद मैंने निर्णय किया कि मैं हर अभावग्रस्त बच्चे को खिलौने बांटूंगा, ताकि उन्हें कभी खिलौनों का अभाव न महसूस हो। बस तबसे मैं यही कर रहा हूं।’ कह कर वे अपने कमरे में चले गए। अजीतसिंह की बात सुन कर प्रणव, प्रभा, टिम्सी और ढोलू की आंखों में आंसू थे। अब उनको अजीतसिंह पर गर्व हो रहा था।
