गोविंद शर्मा
था तो सपना, पर मजेदार था। इसलिए सबको बता रहा हूं। सपने में मेरे सारे दोस्त थे, राजू, पृथ्वी, आकाश, समीर, तारक, बादल सब। अचानक हमें एक परी दिखाई दी। सब हैरान हो गए। हम तो यही समझते थे कि परियां सिर्फ कहानियों में होती हैं, कल्पना में होती हैं। यह सचमुच की कहां से आ गई? हमने उससे पूछा- क्या तुम परी हो? वह बोली- हां हां, मैं परी हूं।
‘क्या नाम है तुम्हारा?’
‘मैं परीक्षा परी हूं।’
‘परीक्षा परी? परीक्षा तो हमें जरा भी अच्छी नहीं लगती। बहुत बुरी लगती है। हम तो कभी-कभी गा लेते हैं- परीक्षा डायन मार गई…। तुम इतनी सुंदर हो, तुम्हें यह डरावना नाम किसने दिया?’
‘नहीं-नहीं, यह नाम डरावना नहीं है। परीक्षा बुरी नहीं होती है।’
‘क्यों नहीं होती है? परीक्षा के नाम से हमें सब डराते हैं। खेलने में वक्त खराब मत करो, परीक्षा सिर पर है, टीवी मत देखो, मोबाइल को तो छुओ ही मत। बताओ, यह परीक्षा न होती तो क्या हम पर ये पाबंदियां लगतीं?’
‘देखो, परीक्षा न होती तो यह कैसे पता चलता कि तुम अगली कक्षा में जाने के योग्य हो गए हो? तुम्हारी योग्यता यह है? तुम अध्यापक, अधिकारी या कुछ और बन सकते हो। परीक्षा न होती तो तुम अपनी क्या योग्यता बताते? परीक्षा में पास होने पर तुम कह सकते हो कि तुम हाई स्कूल पास हो, बीए या एमए हो।’
‘बस, बस परीक्षा परी जी हम सब परीक्षा दे चुके हैं। यहां अपने परीक्षा परिणाम के इंतजार में ही खड़े हैं। तुम परीक्षा परी हो, तो हमारी कुछ मदद करो। हमारी उत्तर पुस्तिकाओं में हमारे नंबर बढ़ा दो।’
‘इस तरह जादू से नंबर नहीं लेने चाहिए। फिर भी तुम कहते हो तो बढ़ा दंूगी और सत्तर वाले के अस्सी कर दूंगी। जिसके अस्सी होंगे, उसे एक बड़ा-सा उपहार भी दूंगी।’
इतना कह कर वह गायब हो गई। इधर वह गायब हुई। उधर शोर मच गया कि परिणाम आ गया है। हममें से किसी के साठ थे, तो किसी के सत्तर, बस पृथ्वी और आकाश के अस्सी-अस्सी प्रतिशत थे। दोनों उपहार पाने के लिए परी का इंतजार करने लगे। अचानक परीक्षा परी आ गई। उसके हाथ में था एक बड़ा सा पैकेट। उसने वह पृथ्वी को पकड़ा दिया और जाने के लिए हाथ हिलाया, तो आकाश जोर से चिल्लाया- मेरा उपहार? मेरे भी अस्सी प्रतिशत आए हैं।
‘नहीं, तुम्हारे सिर्फ सत्तर प्रतिशत थे। अस्सी प्रतिशत तो उन्हें मेरे जादू ने बनाया है। पृथ्वी के वास्तव में अस्सी प्रतिशत आए हैं। ये अंक उसने अपनी मेहनत से लिए हैं। असली नंबर तो वहीं होते हैं, जो आप अपनी मेहनत से लेते हैं। सही तरीके के परीक्षा देकर जो योग्यता अर्जित करते हो, वहीं वास्तविक योग्यता होती है।’
इतना कह कर परीक्षा परी गायब हो गई। हमें तो कोई अफसोस नहीं हुआ। क्योंकि हमारा प्रतिशत तो इस परीक्षा में बिना जादू का ही था, पर उपहार की सीमा से काफी कम था।
आंख भी खुल गई। मम्मी ने जोर से आवाज लगाई थी- अब सोया ही रहेगा या कुछ पढ़ेगा भी। परीक्षा सिर पर है।…
हां, परीक्षा परी, हमारी आंख खुल गई। अब परीक्षा से डरना खत्म। अब हम तुमने जो कहा है, वह याद रखेंगे। हमारे लिए तुमसे सपने में मिलना उपहार मानते हैं।
