अकबर पदमसी ने यूरोपीय चित्रकला के वैभव के साथ आधुनिक बोध से संपन्न भारतीय मन को अपने चित्रों में उकेरा। प्रयोगधर्मी कलाकार होने के नाते उन्होंने रंग, रेखा और देहाकृति संबंधी प्रतिमा वैज्ञानिक प्रयुक्तियां अपनाई। ‘कपल’ और ‘लवर्स’ जैसे चित्रों में भी शिव-पार्वती की वह पौराणिकता देखा जी सकती है। बावजूद इन सबके अकबर पदमसी ने अपनी निजता नहीं छोड़ी और बहिरागत आधुनिकता को अपनी रचना पर कभी हावी नहीं होने दिया। उनकी कृतियों में तकनीकी खूबियों के साथ बारीकियां भी मौजूद हैं, लेकिन आलंकारिता नहीं है।

अकबर पदमसी के चित्र, विशेषकर उनके भारत लौटने के बाद, गहरे मानवीय सरोकार से जुड़ गए। यह बाद में ईसा मसीह और महात्मा गांधी पर बनाई उनकी चित्र शृंखला में लक्ष्य किया जा सकता है। पदमसी का कहना था कि स्कूली जीवन से ही ईसा ने मानवीय पीड़ा और यंत्रणा को ईश्वर प्रेरित करुणा से सींचा और इसके लिए मृत्यु को भी गले लगा लिया। ईसा को सूली पर चढ़ाया जाना इतिहास की कू्ररतम त्रासदी है। इसी तरह महात्मा गांधी ने भी सत्य को सर्वोपरि मान कर मनुष्य मात्र की सेवा को ही अपने जीवन का संकल्प बताया। ‘मृत्यु मुखौटे’ (मास्क आॅव डेथ) की रंगप्रवण व्याख्या है, जिसमें उनका दार्शनिक पक्ष भी उजागर हुआ। पदमसी ने ईसा और महात्मा गांधी की सादगी को ध्यान में रख कर ही कैनवस पर चारकेल से कई चित्र उकेरे।
कला के क्षेत्र में अपने नवोन्मेषी और आधुनिक पद्धतियों, यहां तक कि ग्राफिक्स में भी प्रयोग करते हुए उन्होंने माध्यम की शुचिता को बनाए रखा। साथ ही, अपनी कला प्रकृति और प्रवृत्ति को उन्होंने अनावश्यक मिश्रण के दूषण से बचाए रखा। उन दिनों बलिदानी महाप्राणों को उकेरते हुए, अकबर पदमसी ने अपनी सृजन कर्म को सार्थकता प्रदान की।

प्रयोगशीलता और रचनात्मक कल्पनाशीलता से समृद्ध अकबर पदमसी की सर्वाधिक चर्चित चित्र शृंखला ‘मेटास्केप्स’ के अधीन कई कृतियां और कला प्रविधियां शामिल हैं। इसी क्रम में उन्होंने संस्कृत के अध्ययन के साथ पेंटिंग में व्याकरण संबंधी कुछ नए उद्यम भी किए थे। वर्ष 1970 से 1983 के दौरान रचित ‘मेटास्केप्स’ शृंखला में संस्कृत श्लोकों के साथ उन्होंने सूर्य, चंद्र और नक्षत्रादि की गतिविधियों को भी समायोजित किया। सूर्य और चंद्र उनके लिए कालचक्र के दो गतिमान पहिए बने रहे। पदमसी ने अपने इन चित्रों में फैंटेसी का खुलकर प्रयोग किया था, जिनमें व्यक्तिगत स्मृतियों को भी संजोया गया। ‘मेटास्केप्स’ में उन्होंने पंचतत्वों (जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि और आकाश) से संबंधित रूपकों, मिथकों और बिंबों का अनोखा संसार सिरजा। इन सभी निर्मितियों में विषय वस्तु की अनन्यता हो या रंग-विन्यास, कलाकार की सौंदर्य भावना के साथ उसकी निजता भी दबे पांव महसूस की जा सकती है। रचनात्मक विकलता के बावजूद बिना कोई अतिरेक और आडंबर रचे वे कैनवास पर पूरी गंभीरता से अपनी विषय वस्तु को रूपाकार प्रदान करते रहे। किसी भी तरह की जल्दबाजी से बचते हुए, कैनवस पर अनायास उनके मूर्त या अमूर्त आकार पूर्णता प्राप्त कर लेते थे। यह ठान कर कि निर्धारित समय में ही किसी कृति को पूरा करना है, उन्होंने कभी जल्दीबाजी नहीं की। इसलिए उनकी कई कृतियों ने आरंभ से अंत तक पूरा होने में काफी समय लिया। ऐसा भी हुआ कि पूरा हो जाने पर उसने कोई दूसरा ही रूप-रंग और तेवर ग्रहण कर लिया। पदमसी इसका श्रेय किसी विशिष्ट भावापन्न क्षण को देते रहे, क्योंकि वे इसमें कोई हस्तक्षेप करना नहीं चाहते थे।

अकबर पदमसी की कृतियों की एक विरल विषय वस्तु बल्कि पृष्ठभूमि में भी कोई अस्पष्ट जाल-सा बुनता है। उनकी रंग रेखाएं भी सौम्य और संतुलित बनी रहीं, विशेषकर मुखाकृतियां आंकते हुए। स्वभाव से गंभीर और दार्शनिक वृत्ति वाले पदमसी की स्त्री-पुरुष केंद्रित मुखाकृतियां करुणा और संवेदना के साथ निश्शब्द और गहन संवाद करती लक्ष्य की जा सकती हैं। इनमें प्रयुक्त रंगों को भी विषय वस्तु के साथ आत्मीय संवाद करते हुए सुना जा सकता है।
अकबर के चित्रित पात्र अपनी चुप्पियां ओढ़े रहने वाले- एक तरह से थके-चुके बुझे और शायद अपनी दुनिया में डूबे रहते हैं। इसलिए दर्शकों के लिए आवश्यक हो जाता है कि वे न केवल उन्हें देखें, बल्कि सुनें कि वे क्या कहना चाहते हैं। इस प्रकार वे अपनी निर्मितियों को केवल अपने तक नहीं, बल्कि दर्शकों तक पहुंचाना चाहते हैं। साथ ही, सड़क पर नारे लगाती भीड़, शहरी लोगों के आक्रोश और अंधाधुंध दौड़ भाग करते लोगों से सर्वथा अलग था, अकबर द्वारा कैनवस पर उकेरे गए ये पात्र अपनी पीड़ा और प्रसन्नता के बावजूद, जीवन और मृत्यु जैसे दार्शनिक प्रश्नों से जूझते दिखाई देते हैं, जो भारतीय चित्रकला में अत्यंत विरल है। लेकिन दूसरी ओर उनके अमूर्त रूपाकार, विशेष कर दिगंबर नारी आकृतियों में एक खास तरह की ऐंद्रिकता देखी जा सकती है।

उनके द्वारा चित्रित भू-दृश्यों का दायरा अत्यंत विस्तृत होता था। प्राकृतिक दृश्यों से वे लोक जीवन में प्रचलित रंगों के माध्यम से जीवन की उष्मा और उत्साह को व्यंजित करते रहते रहे हैं। एक साथ कई मन:स्थितियों का सामना करते हुए और सबको अपना श्रेष्ठ देते हुए रूपायित करते रहे।
हिंदी के सुपरिचित कवि गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ की रचनाओं, विशेषकर चांद का मुंह टेढ़ा है, की कविताओं पर आधृत उनकी चित्र शृंखला को दर्शकों ने बहुत सराहा। ‘मुक्तिबोध’ की रचनाओं के साथ उनके रचनात्मक नैकट्य और बिंबधर्मी संवाद ने उनकी चित्र विधा को निश्चित तौर पर अनुप्राणित किया। इसी क्रम में ‘मृत्यु मुखौटे’ शृंखला के अंतर्गत उनके कई चित्रों में एक अलग अकबर पदमसी नजर आते हैं। भावुक और संवेदनशील कलाकार होने के साथ एक चिंतक और दार्शनिक भी।

बाद के वर्षों में विशेषकर 1992-94 के दौरान अकबर पदमसी ने अपनी आकार मूलक चित्र-प्रवृत्ति को बरकरार रखते हुए, रेखाओं को दानेदार या खुरदुरा बना कर प्रस्तुत किया। रेखाओं के तीव्र, त्वरित और तिर्यक प्रयोग से उन्होंने कई आत्मचित्र और व्यक्ति चित्र बनाए।
रंगों के प्रति अत्यंत सजग रहने वाले और उनका सटीक उपयोग करने वाले पदमसी ने कहीं भी उनका अतिरेकपूर्ण प्रयोग नहीं किया। उन्होंने इस बात का विशेष खयाल रखा कि अपनी विषय-वस्तु के साथ वे किस प्रविधि और किन रंगों का प्रयोग करेंगे। उन्होंने जलरंगों का प्रयोग भी अत्यंत कुशलता के साथ किया। परंपरागत विधियों के साथ आधुनिक प्रविधियों के प्रति भी उनकी रचनात्मक जुगलबंदी देखी जा सकती है। अपनी विषय वस्तु को कंप्यूटर ग्राफिक की सहायता से उसे नई रूपाकृति प्रदान की। उनकी ये छायाभासी कृतियां इतनी मृदु और कोमल प्रतीत होती हैं, मानो पटल पर हल्की-सी भी धूप या रोशनी पड़ी तो देखते-देखते ओझल हो जाएगी। इस प्रकार के अनूठे प्रयोगों से अकबर पदमसी की रचना यात्रा अत्यंत समृद्ध रही। संवेदना और संरचना का अनोखा तालमेल ही उनकी कलात्मक अनन्यता की पहचान है।

1984 से आरंभ कर कुछ समय के लिए पेंटिंग से हट कर अकबर ने प्लास्टर (माध्यम) में छोटे-बड़े कोई दो सौ सिर गढ़े और इनमें से कुछ कांसे (ब्रांज) में भी ढाल गए। इसी के साथ चीनी पद्धति से कागज पर मोटी-पतली तूलिकाओं के तरल रंगों में डुबो कर कई चित्र उकेरे। इन रंगों के सूख जाने पर एक अनूठा प्रभाव उत्पन्न हो जाता था। ऐसे प्रयोगों से स्पष्ट है कि अकबर समय-समय पर अपनी विषय वस्तु, माध्यम और साधन (कैनवस, कागज, चित्र पटल) में इच्छित बदलाव करते रहे।

1994 में अपने ‘दर्पण-बिंब’ (मिरर इमेजेज) के अंतर्गत उकेरी गई चित्र शृंखला के लिए भी वे काफी चर्चित रहे। इन चित्रों में दार्शनिक तत्वों- विशेषकर द्वंद्वात्मक चिंतन पद्धति के प्रति उनकी अभिरुचि को अभिव्यक्ति मिली थी। इस बारे में उनका कहना था- ‘मैं जब दर्पण बिंब आंकता हूं तो वस्तु और बिंब के दो होने पर भी अपने संयोजन (फ्यूजन) के कारण चाक्षुष अनुभव में, आरंभिक बिंदु की तरह वे एक हो जाते हैं।’
अकबर पदमसी ने पिछले साठ वर्षों में कई कला आंदोलनों का उतार-चढ़ाव देखा और कई कला पद्धतियों को अपनाया। मगर प्रयोगधर्मिता को वे कलाकार की ऊर्जा से जोड़ कर देखने के आग्रही रहे, न कि समसामयिक परिवर्तन एवं प्रतिक्रियाओं से, क्योंकि उनकी आतंरिक कला चेतना उनके एकांत प्रिय स्वभाव को सदैव कुछ नया करने को प्रेरित करती रही।

रणजीत साहा