गांधीजी ने चरखे को रोजगार का एक बड़ा औजार माना था। खादी को स्वदेशी मूल्यों का पोषक कहा था। उनके विचारों से प्रभावित होकर देश भर में, गांव-गांव में लाखों लोगों ने चरखा चलाना और खादी अपनाना शुरू किया था। इससे उम्मीद जगी थी कि खादी देश में रोजगार की समस्या को काफी हद तक दूर करने में मददगार साबित होगी। मगर सरकारें बदलती रहीं और खादी को लेकर उनकी नीतियां भी बदलती रहीं। इस तरह इस क्षेत्र में कुछ ऐसे लोग घुसते गए, जिन्होंने खादी को सेवा भाव से नहीं, कारोबार के रूप में अपनाया और सरकार की कमजोर नीतियों का भरपूर लाभ उठाया। अब हालत यह है कि खादी रोगग्रस्त अवस्था में पहुंच गई है। खादी के क्षेत्र में संभावनाओं और उससे जुड़ी चिंताओं का विश्लेषण कर रहे हैं एआर आजाद।
खादी कभी आजादी की वर्दी कही जाती थी, आज उसी वर्दी की हालत पतली है। सरकार का खादी को लेकर अपना मूल्यांकन है और वह हमेशा अपनी ही तरह से उसे चलाना चाहती है, लेकिन खादी के कामों में जो लोग वर्षों से लगे हैं, उनमें अब वह ताब नहींं रह गया कि इस काम में वे अपने बेटों को भी शामिल करें। इसे आने वाली नस्लों को सौंप सकें। दरअसल, इसके पीछे कारण साफ है कि खादी को जिस तरह सरकार चलाना चाहती है, खादी वाले उसे उस तरह से नहीं चलाना चाहते। उनका मानना है कि खादी के लिए गांधीजी ने जो मार्ग तय किया था उससे अलग कोई भी मार्ग खादी को संवार नहीं सकता। ऐसे मार्ग हमें अनभिज्ञता की ओर ले जाएंगे, जहां आगे चल कर खादी चरमरा जाएगी।
दरअसल, गांधीजी ने पहले इसे आजादी का सबसे बड़ा हथियार माना था, लेकिन बाद में उन्होंने इसे रोजगार का सबसे बड़ा हथियार बना दिया। लोगों की रुचि खादी में पैदा होनी शुरू हो गई और देखते-देखते खादी आजादी के बाद अपने मुकाम की ओर बढ़ने लगी। पर यह रफ्तार जब कुछ सरकारी नीतियों के कारण धीमी होनी शुरू हुई, तो फिर कभी रफ्तार ही नहीं पकड़ सकी। पीवी नरसिंह राव के प्रधानमंत्रीत्व काल में खादी को लेकर उच्च अधिकार प्राप्त समिति गठित की गई, लेकिन उससे भी कोई उत्साहजनक नतीजा उस समय भी परिलक्षित नहीं हुआ। वर्तमान सरकार भी खादी के उत्थान को लेकर कई तरह की योजनाएं गिना रही है, लेकिन ये योजनाएं धरातल पर कहीं दिख नहीं रही हैं या इसका कोई धरातल पर अस्तित्व ही नहीं है।
अभी हाल में सरकार ने खादी को लेकर कई बड़े दावे किए हैं। सरकार ने मौजूदा खादी अनुदान एवं ग्रामोद्योग अनुदान को जारी रखने के नाम पर इसका एक नया नामकरण कर दिया है। इस योजना को सरकार ने खादी और ग्रामोद्योग विकास योजना का नाम दे दिया है। इस योजना पर 2017-18 से 2019-20 तक की समय सीमा में लगभग अठाईस सौ करोड़ रुपए की लागत का खाका तैयार किया है। इस योजना के तहत रोजगार युक्त गांवों को जोड़े जाने की बात की गई है। कहा जा रहा है कि इससे रोजगार के नए अवसर बुनकरों के लिए खुलेंगे। सरकार ने सब्सिडी पर केंद्रित मॉडल को बदल कर एंटरप्राइजेज पर आधारित बिजनेस मॉडल की शुरुआत करने की रूपरेखा तय कर दी है।
सरकार की ऐसी ही खादी को लेकर समय-समय पर किए गए प्रयास खादी के संचालकों और उससे जुड़े लोगों के लिए रुकावट का सबब बनता गया है। जो भी सरकार आती है, पहला प्रयोग खादी पर ही करना शुरू कर देती है। पर समय बीत जाता है और खादी न इधर की रहती है और न उधर की। खादी वालों की एक अपनी जीवन शैली है और खादी काम को लेकर अपना एक नजरिया भी है। वे जिस नजरिए से रम कर काम करना चाहते हैं उस नजरिए में बदलाव लाकर सरकार उस सोच को ही खारिज कर देती है, जिस सोच के जरिए खादी बड़ी तेजी के साथ रोजगार का साधन बनती जा रही थी।
सन 1920 से खादी की विधिवत शुरुआत मानी जा सकती है। पर आज लगभग सौ साल पूरे होने के बाद फिर से खादी वहीं पहुंच गई है, जहां से उसका उदय हुआ था। दरअसल, खादी को या तो सरकार समझ नहीं पा रही है या वह इसके कामों को समझना ही नहीं चाहती है। यही वजह है कि खादी न इधर की रही है और न उधर की। इस काम में कुछ ऐसे लोग भी आए, जिन्होंने सांठगांठ की प्रक्रिया अपना कर मिल के कपड़ों को खादी के तारतम्य से जोड़ दिया और रियायत के नाम पर चांदी काटते रहे। नतीजतन, जो खादी कभी गांव-गांव तक थी, वहां आज खोजे कोई चरखा चलाने वाले नहीं मिल रहे हैं। कोई कतीन नहीं, कोई बुनकर नहीं मिल रहा है। फिर भी खादी के नाम पर कौन-सी खादी बिक रही है, ये तो सरकार और शासन के लिए जांच का विषय है।
खादी के उजड़ते केंद्र
खादी की शुरुआत में श्री गांधी आश्रम का एक बड़ा नाम और अमूल्य योगदान रहा है। खादी के भीष्म पितामह सोमभार्ई इसके अध्यक्ष रहे हैं। श्री गांधी आश्रम का देश भर में शाखाएं थीं, लेकिन मेरठ की शाखा मशहूर रही है। ठीक उसी तरह खादी आश्रम पानीपत कभी अपना मुकाम रखता था। लेकिन सोमभाई का संरक्षण हटते ही खादी के प्रति सरकारी उदासीनता के कारण वह अब फीका पड़ता जा रहा है। पानीपत के उस खादी आश्रम में कभी रौनक रहा करती थी, आज सन्नाटा पसरा हुआ है। पानीपत का खादी आश्रम देश की गिनी-चुनी संस्थाओं में चौथे या पांचवे नंबर पर अपना स्थान रखता था। यह संस्था भी आज बस नाम भर की रह गई है।
बात दिल्ली की करें, तो दिल्ली में खादी के उत्पादन और बिक्री की चमक धीमी पड़ती जा रही है। दिल्ली में कई खादी संस्थान वजूद में हैं, लेकिन अब उन संस्थानों में न तो वैसे खादी के कार्यकर्ता रह गए, न कतिन, न बुनकर, न ही बिक्री, न व्यापार। राज्यवार खादी पर नजर डालें तो राजस्थान में उद्योग मंदिर, राजस्थान खादी विकास मंडल, खादी समिति वसी और खादी ग्रामोद्योग प्रतिष्ठान बीकानेर जैसे कुछ संस्थान विषम परिस्थितियों में भी खादी के काम में हाथ बंटा रहे हैं। इसी तरह मध्यप्रदेश में खादी आश्रम टिकागढ़ और आंध्र प्रदेश में कई संस्थान हैं, जो खादी के काम को हर हाल में आगे बढ़ाने के लिए खुद को समर्पित किए हुए हैं।
खादी का काम हर राज्य में अपनी मांग और आपूर्ति के हिसाब से होता है। बंगाल में खादी की साड़ियों और कमीज का उत्पादन तथा बिक्री काफी है। मुर्शीदाबाद सिल्क साड़ी के चाहने वालों की कमी नहीं है। लगभग प्रत्येक संभाग में खादी संस्थाएं स्थापित हैं। उत्तरी संभाग में नई दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान और बीकानेर में खादी संस्थाएं कार्यरत हैं। उसी प्रकार केंद्रीय संभाग में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, मेरठ, वाराणसी, लखनऊ और गोरखपुर शामिल हैं। पूर्वी संभाग में बिहार, ओड़ीशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। पश्चिमी संभाग में गुजरात, महाराष्ट्र और नागपुर तो दक्षिणी संभाग में आंध्र प्रदेश, विशाखापट्टनम, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और मदुरै में खादी संस्थान काम कर रही हैं। पूर्वोत्तर संभाग में नगालैंड, मेघालय, मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश में खादी संस्थान वजूद में हैं।
खादी से जुड़े लोग
खादी से जुड़े लोगों की बात करें, तो सरकारी आंकड़ों के मुताबिक खादी से 14.97 लाख लोग जुड़े हुए हैं। एक आंकड़े के मुताबिक 11.149 करोड़ वर्ग मीटर कुल उत्पादन हो रहा है। और जहां तक इसकी बिक्री का सवाल है, तो इसकी बिक्री लगभग 581.20 करोड़ रुपए की हो रही है।
बहरहाल, सरकारी आंकड़े अपनी जगह पर दुरूस्त हैं लेकिन संस्थानों की स्थितियां कुछ और बयान कर रही हैं। आप देश की किसी भी संस्था में चले जाइए, वहां न तो खादी कार्यकर्ताओं में उत्साह है, न वैसे कपड़े हैं और न ही अब वैसे ग्राहक ही देखने को मिलते हैं। आज जो भी खादी है या बिक रही है वह चमक-दमक में तो आगे हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर खादी नहीं है। इसलिए खादी पर सरकार को अपना ध्यान केंद्रित करना होगा। खादी के लोगों को ही खादी का भविष्य संवारने का मौका देना होगा। उनके साथ बातचीत कर कोई नया रास्ता निकालना होगा। आज भी खादी रोजगार के मामले में एक बड़े क्षेत्र के तौर पर उभर सकती है, बशर्ते सरकार चाहे।
बेरोजगारी का बड़ा कारण
खादी की रीढ़ की हड्डी उसी दिन टूट गई, जिस दिन खादी को अपने अथक प्रयास से एक मुकाम तक पहुंचाने की जिद में अपने आप को झोंक देने वाली एक शख्सियत बीमारी की गिरफ्त में आ गई। काम करते रहने की भावनात्मक जिद और गांधीजी की सोच के अनुसार खादी को जन-जन तक पहुंचाने की हसरत में वह शख्स खुद को ही भूल गया। अपनी सेहत का खयाल रखने का या यों कहें कि अपने बारे में सोचने का उन्हें कोई लम्हा ही नहीं मिला। नतीजतन, हौसला तो बुलंद रहा, लेकिन जिस्म जवाब दे गया। अपनी उपेक्षा तंदुरुस्ती भी बर्दाश्त न कर सकी और उसका बदला उनसे सेहत ने ले ली। वे बीमार पड़ गए और फिर अस्पताल में दाखिल कराना ही पड़ा। पानीपत के अस्पताल से होते हुए दिल्ली के स्कॉउट अस्पताल तक का सफर पूरा हुआ। उम्मीद और कोशिश बचाने की पूरी रही, लेकिन अस्पताल के बेड पर भी खादी के सामने की चुनौती उन्हें नाहक परेशान करती गई। जब आदमी अकेला होता है, तो फिर सोच भी अंगड़ाई लेने लगती है।
उस सोच के दायरे में वे लोग भी आते गए, जिन पर उन्होंने भरोसा किया। उम्मीद की कि ये लोग जुड़ कर खादी को आगे बढ़ाएंगे, लेकिन उनके सामने ही वे लोग कुछ दिनों के बाद खादी और गांधी की सोच के साथ खिलवाड़ करने लगे तो उन्हें चैन कहां मिलता। वे इस दुख को किसी से बांट भी नहीं सकते थे।
कम बोलने वाला वह शख्स हर किसी से खुल कर बात भी कहां कर पाता था। वे मन की बातों को मन में ही दबाए रहे। हां, जिन्होंने धोखा दिया उन्हें खरी-खोटी सुनाई जरूर, लेकिन मोटी चमड़ी के लोग सौम्यता से बात करने वाले की बात को उतनी गहराई से लेते कब हैं? उन्होंने भी नहीं लिया। इस बात का भी उन्हें दुख रहा कि उनसे कितनी बड़ी गलती हो गई है, जिसका खमियाजा खादी को भुगतना पड़ेगा। इस सोच और ऊहापोह के बीच वह शख्स इस दुनिया से बिदा हो गया। खादी के क्षेत्र में एक सन्नाटा पसर गया। कुछ पल के लिए पूरा खादी जगत स्तब्ध रह गया। हम बात कर रहे हैं खादी जगत के भीष्म पितामह सोमभाई की। 17 अप्रैल, 2003 को सोमभाई परलोक सिधार गए।
सोमभाई ऐसे शख्स थे, जिनका कद सही मायने में आसमान को छूता था। रचनात्मक जगत में एक आदर्श के रूप में उन्हें सदा जाना जाता रहा। आज भी जितने पुराने लोग हैं, उनके नाम को बड़े सम्मान के साथ लेते हैं। उन्होंने रचनात्मक जगत में ऐसा काम किया कि वे इस जगत के लिए एक जादुई शख्सियत के तौर पर उभर कर सबके सामने आ गए। ईश्वर ने उन्हें ऐसे-ऐसे गुणों से नवाजा कि हर क्षेत्र और हर काम में बरकत नजर आने लगी। खादी को एक मुकाम मिला। बेरोजगारों को काम मिला। संस्थानों को उत्पादन के रंग और ढंग मिले। बिक्री का एक नया कीर्तिमान स्थापित हुआ।
मगर उनके मरने से दो साल पहले यानी 2001 से खादी कुछ गिरावट की ओर उन्मुख होने लगी। खादी के प्रति सरकारी रवैए में उदासीनता की तभी शुरुआत होने लगी थी, लेकिन सोमभाई ऐसे मुश्किल हालात को बड़ी समझदारी के साथ हल करना चाहते थे। सोमभाई का मानना था कि कोई भी सरकार आए, लेकिन जो नीतियां खादी को लेकर चलती आ रही हैं, उन्हें ही चलते रहना देना चाहिए। सोमभाई का स्पष्ट मानना था कि खादी ही एक ऐसा क्षेत्र है, जहां समाज के सबसे निचले तबके का हित सुरक्षित है। उनके मुताबिक महिलाओं के रोजगार संबंधी हित खादी में सर्वाधिक सुरक्षित हैं।
सोमभाई खुल कर भले न बोल पाते हों, लेकिन उन्हें यह एहसास होने लगा था कि सरकार की नीतियों के कारण ही अब खादी संकट के करीब होती जा रही है। पर वे मानते रहे कि सिर्फ सरकार का इसमें पूरा दोष नहीं है, इसमें कुछ अपनी कमी भी है। यानी खादी संस्थान भी अपनी राह से भटक रहे हैं। उनके पास खादी को समस्या से उबारने के लिए दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ रही है। एक तरफ वे सरकार की नई नीतियों को सही नहीं मानते थे। वे चाहते थे देर-सबेर सरकार अपनी पुरानी नीतियों पर लौट आए और जो संस्थान खादी के मूल स्वरूप और गांधीजी के सिंद्धातों से परे कुछ भी करने लगे हैं, उन्हें भी अपने मूल रूप में सहजता से आ जाना चाहिए, तभी खादी अपने मकसद में कामयाब हो सकती है।
