रामदरश मिश्र

रोज की तरह आज भी अखबार दुनिया भर की बुरी खबरों का कूड़ा मुझ पर उड़ेल गया था। मैंने फरवरी की हलकी हलकी धूप में अपने को डाल दिया था, किंतु विचारों में बुरी खबरों की सीलन जमा हो गई थी। लग रहा था, कोई अपने पिता का वध कर रहा है, कोई पत्नी प्रेमी के साथ मिल कर पति को ठिकाने लगा रही है। कोई दोस्त दोस्त की हत्या कर रहा है। कोई उल्लू का पट्ठा किसी महिला का पर्स छीन कर भाग रहा है। कुछ लंपट किसी नाबालिग लड़की का अपहरण कर उससे बलात्कार कर रहे हैं और फिर पीट-पीट कर किसी सुनसान स्थान पर फेंक दे रहे हैं। कोई बाप अपनी बेटी की, कोई भाई अपनी सगी बहन की इज्जत उतार रहा है। कुछ बच्चे भूख से मरे जा रहे हैं, अस्पतालों में बीमारों की कतार असहाय-सी खड़ी है। देश के बड़े कहे जाने वाले लोगों के चमकते चेहरों के नीचे आम लोगों के प्रति उपेक्षा और शोषण की कालिमा जमी हुई है और न जाने क्या-क्या हो रहा है, जो मनुष्यता को कलंकित कर रहा है।

अखबार इन कुरूप कृत्यों की खबरों से लदे-फंदे सवेरे-सवेरे दरवाजे पर गिरते हैं। मैं रोज सोचता हूं कि शायद कोई अच्छी खबर पढ़ने को मिल जाएगी। लेकिन नहीं मिलती। ऐसा नहीं है कि अच्छी खबरें हैं ही नहीं, हैं पर अखबारों को उन तक पहुंचने का रास्ता ही नहीं सूझता। तो मैं आज भी अखबार की खबरों के बोझ से लदा खिन्न-सा बैठा था कि कूरियर वाला शादी का एक निमंत्रण कार्ड दे गया। उसे निहारता रहा। खोला तो मालूम पड़ा कि पत्र किसी महेश के यहां से आया है। उनकी बेटी की शादी है। पत्नी सुशीला मेरे पास आई, तो मैंने कहा कि किसी महेश की बेटी की शादी का निमंत्रण कार्ड आया है।

‘किन्ही महेश के यहां से? अरे वही महेश तो नहीं, जो पुत्र प्रशांत का दोस्त है!’
‘हां मां वही महेश।’ पास आता हुआ प्रशांत बोला।
‘लेकिन बेटा, उसे तो कोई बेटी थी ही नहीं! दो बेटे हैं, उनकी शादियां हो गई हैं।’
प्रशांत मुस्कुराया। बोला- ‘तुम ठीक कह रही हो मां। यह बेटी वाली एक अलग कहानी है।’
‘अलग कहानी? कैसी कहानी बेटा?’
‘बताऊंगा मां। मेरा दोस्त मस्तमौला है, वह कुछ अजब-गजब करता ही रहता है।’
‘तो इसमें बताने के लिए कोई मुहूर्त निकालोगे क्या? कुर्सी निकाल कर मेरे पास बैठ जाओ और हो जाओ शुरू।’ मैंने कहा।
प्रशांत मुस्कुराया और बोला, ‘पापा बहुत उत्सुकता हो रही है आपको मेरे दोस्त के अजब-गजब कार्य को सुनने की। लीजिए सुनाता हूं।’
प्रशांत अंदर से दो कुर्सियां उठा लाया। एक पर मां को बैठा कर दूसरे पर बैठ गया।
‘पापा, आपको तो पता है न कि स्कूल में महेश मेरा सहपाठी था और मेरे कुछ अत्यंत प्रिय मित्रों में से है। वह है तो बहुत खेलंदड़ मिजाज का, लेकिन अत्यंत संवेदनशील है। स्वाभिमानी और नवचेतना संपन्न भी।’
‘सो तो है, मगर इस निमंत्रण की कहानी क्या है?’ मैंने हंसते हुए कहा।
‘पापा जी निमंत्रण की कहानी की ही भूमिका बना रहा हूं।’
‘अच्छा बना भाई बना।’ मैंने कहा।
‘आप हर बात में अड़ंगा डाल देते हैं, प्रशांत जो कह रहा है कहने दीजिए न।’ सुशीला जी बोलीं।
‘अच्छा सुशीला जी, मैं नहीं टोकूंगा। वैसे अड़ंगा लगाने की आदत तो आप में भी है।’
‘पापा जी, कहीं ऐसा न हो कि महेश की कहानी छूट जाय और आप दोनों एक-दूसरे की कहानी कहने लगा जाए।ं’
एक ठहाका लगा और महेश की कहानी आगे बढ़ने लगी।
‘तो मैं कह रहा था कि महेश स्वाभिमानी और नवचेतना संपन्न है। वह उस घर का बेटा है, जिसमें गाएं और भैंसें पाली जाती रही हैं और दूध का व्यापार होता रहा है। महेश ने जब अनेक विरोधों के बावजूद बीए कर लिया तब उसके पिता ने कहा कि बहुत पढ़ लिया, अब गाय-भैंसों को संभाल और दूध के कारोबार को आगे बढ़ा।’
‘महेश अपने दबंग पिता के क्रोध को जानते हुए भी कहा- यही सब करना होता तो पढ़ता क्यों? मैं नौकरी करूंगा। वह बाप के ताने और क्रोध की परवाह न करके नौकरी खोजने लगा। आखिर गुड़गांव की एक बड़ी कंपनी में नौकरी लग गई। उसने अपनी पसंद की एक पढ़ी-लिखी लड़की से शादी कर ली। परिवार में लड़की की पढ़ाई पर भी व्यंग्य वाण छूटने लगे और उसकी उपेक्षा होने लगी। महेश यह सब देखता रहा और मन ही मन परेशान होता रहा। आखिर उसने एक दिन अपना फैसला सुना ही दिया कि रोज-रोज नोएडा से गुड़गांव जाना बहुत कष्टकर हो रहा है, मैंने गुड़गांव में ही किराए का एक मकान ले लिया है। वहीं जा रहा हूं। और हां साथ में मेरी पत्नी भी जाएगी।’
‘तो, लग रहा है कि इस घर से सारा नाता तोड़ रहा है। तो सुन मेरी जमीन-जायदाद में से तुझे कुछ नहीं मिलेगा। तेरा बड़ा भाई इस घर का है उसी के नाम सब कुछ लिख दूंगा।’
‘जैसी आपकी मर्जी। मैं तो एक पढ़े-लिखे व्यक्ति की जिंदगी बिताना चाहता हूं। मैं जो कुछ अर्जित करूंगा, उसी में संतोष का अनुभव करता रहूंगा।’
तो महेश मन लगा कर कंपनी में काम करने लगा। वह संवेदनशील तो है ही, सबके सुख-दुख में साथ खड़ा दिखाई पड़ता रहा। अत: कंपनी के सारे लोगों का प्यारा हो गया और अपने काम के प्रति अत्यंत ईमानदार होने के नाते पदोन्नति पाता गया और कुछ वर्षों बाद उप प्रबंधक हो गया। पत्नी साधना प्राइमरी स्कूल में शिक्षिका है। वह बहुत सरल नेक स्वभाव की है इसलिए पारिवारिक माहौल अत्यंत सौहार्दपूर्ण रहा। दोनों बच्चों को भी मां बाप का मानवीय संस्कार प्राप्त है।
तो एक दिन महेश कहीं जा रहा था, देखा कि रास्ते में आठ-नौ साल की एक लड़की फुटपाथ पर पड़ी-पड़ी हो रही है। महेश वहां ठहर गया और लड़की से पूछा- ‘बेटी तुम कौन हो और यहां पड़ी-पड़ी क्यों रो रही हो?’

पहले तो वह कुछ नहीं बोली, बस अहकती रही। जब महेश ने बार-बार सांत्वना के स्वर में पूछा तो बोली- ‘मेरे मां-बाप मर गए हैं। कुछ दिनों तक लोकलाज से चाचा ने अपने घर रखा, फिर एक आदमी के घर में मुझे नौकरानी के रूप में रख दिया। मां-बाप थे तो मैं स्कूल में पढ़ती थी और बाद में पढ़ाई छूट गई। मालिक के घर मैं मन लगा कर काम करती गई। अब मैं कई महीनों से बीमार चल रही हूं। मालिक मेरी बीमारी से ऊब गए तो मुझे सरकारी अस्पताल में छोड़ गए। उसके बाद में कभी अस्पताल में नहीं आए। अस्पताल वालों ने दया करके मुझे भर्ती कर लिया। जब तबीयत संभली तो अस्पताल ने मेरी छुट्टी कर दी। अब मैं सोच रही हूं कि कहां जांऊ। मालिक का तो घर भी नहीं खोज पाऊंगी। और खोज भी लिया तो वे मुझे अपने यहां रहने थोड़े ही देंगे। रहने देना होता, तो मुझे दूर के अस्पताल में पटक कर गायब हो जाते?’
‘तुम्हारा नाम क्या है बेटी?’
‘मेरा नाम बेला है।’
‘तो बेला बेटी, आज से तू मेरे घर रहेगी।’ कह कर महेश ने बेला की बांह पकड़ ली। और उसे उठा कर कहा, ‘चल घर चलते हैं।’
बेला अहकती हुई साथ चल पड़ी।
महेश ने कहा- ‘आंसू पोंछ ले बेटी, अब समझ लो तुम्हारे रोने के दिन गए।’
बेला को लेकर जब महेश घर पहुंचा तो पत्नी ने आश्चर्य से देखा। पूछा- ‘कौन है ये लड़की?’
‘समझ लो तुम्हारी बेटी है। हमारी कोई बेटी नहीं थी न, भगवान ने बेटी दे दी है।’ कह कर महेश ने सारा किस्सा बयान कर दिया। साधना की आंखें भर आर्इं और उठ कर बच्ची को छाती से लगा लिया और उससे बोली- ‘मुझे मां कहो।’
‘मां’ लड़की अहकती हुई बोली। तब तक बच्चे भी आ गए। अचरज से लड़की को देखते रहे। साधना बोली- ‘यह तुम्हारी बहन है बच्चो।’ बच्चे भी सारी कथा सुन कर लड़की की ओर भाई की निगाह से देखने लगे।
‘कितने अच्छे लोग हैं कि एक अनाथ लड़की को पनाह दी।’ सुशीला जी बोलीं।
‘पनाह ही नहीं मां, पारिवारिक प्यार दिया। मैं उस परिवार की रोज-ब-रोज की कथा तो नहीं कह सकता, पर अभिन्न मित्र होने के नाते काफी कुछ जानता हूं।

जानता हूं कि भावावेश में आकर उस परिवार ने उस लड़की को दो दिन का प्यार नहीं दिया, उसे सचमुछ घर की बेटी बना लिया। उसे वे सारी सुविधाएं और प्रसन्नता दी, जो एक संवेदनशील घर में बेटी को मिलती है। स्कूल में उसका नाम लिखा दिया। वह पढ़ाई में धीरे-धीरे आगे बढ़ती गई और बीए पास कर लिया। अब एक अच्छे खानदान में अच्छे लड़के से उसकी शादी कराई जा रही है। आप लोगों को जान कर आश्चर्य होगा कि महेश दहेज में बहुत कुछ दे रहा है। कार भी दे रहा है। अच्छा पापा मुझे अभी उसी के यहां जाना है चलता हूं।’ प्रशांत चला गया और आज के अखबार की कुरूप खबरों के अंधकार से लदे-फंदे मेरे मन को एक अच्छी खबर के उजास से भर दिया। सोचने लगा- अखबारों को पहुंच इन खबरों तक क्यों नहीं होती?