यामिनी नयन गुप्ता

रक्तिम आभा लिए सेमल
रोज सुबह प्रस्तुत हो जाता है
मेरे आंगन में
करने मुझसे संवाद,
सेमल फल दरीचे पर गिरते ही
टप की आहट से ही लहलहा उठता है
बंजर उदासीनता का;
लुभाता है मुझे उसके बुलाने का अंदाज .

अच्छा सुनो!
मुझे जो कभी मिली फुर्सत
अपने प्रियतम के खयालों से
एक दिन आकर देखूंगी मैं
तुम्हारी दग्धता विरह का संसार
पर तुम्हारा साथ तो है फाग तक
मेरी तरह कब तक जोहोगे
मिलन की आस

अच्छा सुनो ना!
हंसी का नृत्य,
मिलन का गायन
कब होंगे तुम-हम साथ
दहकती सांझ में
मुट्ठी में समेटे मधुमास
फकत
एक मुट्ठी मधुमास ही तो।

आहट बसंत की

सुनो न!
घंटों तक तुमसे बात करना
मुझे लबालब भर देता है प्रेम से
सच कहूं तो सकारात्मकता से ,
मैं भूलने-सी लगती हूं
मां के चले जाने का दर्द
मां की रसोई में रखे ठंडे चूल्हे का इंतजार
अलमारी में रखी बिंदिया, सिंदूर और हार
रीतापन बाबुल की आंखों का
और मायके के आंगन में कुम्हलाया-सा हरसिंगार।

संवाद से बढ़ कर
कुछ और पाने की मेरी आस
जितना मुखर होता है मेरा प्रेम
तुम सिमटते जाते हो अपनी ही खोल में,
तुमने शायद पढ़ लिया है कहीं
हमारा मिलना ही
शुरुआत होगी राहें अलग होने की
भरसक टालना चाहते हो तुम वह पल
मुझे खो देने का खयाल ही
भर देता है तुम्हें एक शून्य से है न!

तुम्हारे आने की आहट से ही
अंतस के तपते रेगिस्तान में
जाग उठती हैं पानी की हिलोरें,
खलिशें कम चुभती हैं
जद्दोजहद जिंदगी की अब मुझको डराती नहीं,
तुम्हें पाने से ज्यादा जरूरी है
तुम्हारे साथ होने का एहसास,
गहरी आश्वस्ति
हवा के सुखद झोंके-सा है अस्तित्व
जो है तो पर दिखाई नहीं देता।

सुनाई देती है बसंत की आहट
पौधों में हरितिमा की सुगबुगाहट
सुनो न!
तुम भी आ जाओ न!
कुछ गीत बसंत के
जोह रहे हैं तुम्हारी राह
तुम आओ तो भावों को आकार मिले
शब्दों को व्याकरण का उपहार मिले
हां! तुम ही तो हो मेरा बसंत
बासंती रंग मेरे प्रेम का।