सुषमा सिंह
बच्चों का पालन-पोषण बड़े धैर्य का काम है। मगर शहरी जीवन में बढ़ती भाग-दौड़ में बहुत सारे माता-पिता अपेक्षा करते हैं कि बच्चे रिमोट से चलने वाले यंत्र की तरह उनके मन के मुताबिक चलते रहें। वे हर चीज में अव्वल आएं। सबसे अधिक नंबर लाएं। इस चक्कर में तरह-तरह की ट्यूशन कक्षाएं, तरह-तरह के कौशल विकसित करने वाली कक्षाएं लगवा देते हैं। स्कूल का दबाव तो रहता ही है, घर में भी पढ़ाई-लिखाई के लिए दबाव बनने से बच्चों का आत्मविश्वास डोलने लगता है। कई बच्चे इस बात को लेकर आशंकित रहने लगते हैं कि पता नहीं वे अपने माता-पिता की अपेक्षाओं पर कितना खरा उतर पाएंगे। इसलिए वे पढ़ने पर कुछ अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं, पर नतीजा यह देखा जाता है कि वे पाठ्यक्रमों में उलझ कर रह जाते हैं। सामान्य-सी बातें भी उन्हें समझने में जोर लगाना पड़ता है।
दरअसल, परीक्षा का एक मनोवैज्ञानिक असर होता है। खासकर जो बच्चे पहली बार बोर्ड की परीक्षा में बैठने वाले होते हैं, उन पर कुछ अधिक होता है। इस मनोवैज्ञानिक दबाव से बाहर निकाल कर उन्हें सहज ढंग से पढ़ाई-लिखाई का वातावरण देना माता-पिता की जिम्मेदारी होती है। बच्चे जितना उन्मुक्त मन से पढ़े-लिखेंगे, उतना ही बेहतर प्रदर्शन करेंगे। इसलिए माता-पिता को कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है।
दबाव न बनाएं
बच्चे पर बार-बार बोर्ड परीक्षा में अव्वल आने अधिक नंबर लाने का दबाव न बनाएं। उन्हें प्रेरित करते रहें कि वे हर पाठ को ठीक से समझें और उन पाठों पर आधारित सभी संभावित प्रश्नों के उत्तर दे सकें। दबाव बनाने से बच्चे जिद्दी हो जाते हैं और फिर जानबूझ कर पढ़ने से दूर भागना शुरू कर देते हैं। वे पढ़ाई-लिखाई में कमजोर बच्चों की संगत करने लगते हैं और तर्क तलाशना शुरू कर देते हैं कि अच्छे नंबर लाना जरूरी नहीं, जीवन में बहुत सारे ऐसे काम हैं, जो बिना पढ़े-लिखे भी किए जा सकते हैं।
इस तरह की मानसिकता और ऐसे विचार प्राय: उन्हीं बच्चों में पैदा होते हैं, जिन पर माता-पिता और अध्यापकों का दबाव अधिक होता है। अगर आपके बच्चे में ऐसी सोच विकसित हो रही है, उसमें पढ़ाई-लिखाई के प्रति अरुचि पैदा हो रही है, तो आपको सावधान हो जाने की जरूरत है। आपको सोचने की जरूरत है कि किस तरह उसका ध्यान किताबों की तरफ मोड़ा जाए। इसके लिए बच्चे पर दबाव बनाना बिल्कुल छोड़ दें। उसे आपके प्रेम और सहानुभूति की जरूरत है, उसमें यह विश्वास पैदा करने की जरूरत है कि अगर उसके अंक कम भी आए, तो आपको बुरा नहीं लगेगा।
नकारात्मक न कहें
कई माता-पिता समझते हैं कि बच्चों की कमियां बताते रहने से ही वे सही रास्ते पर चल पाते हैं। इसलिए वे उनके उठने-बैठने, कपड़े पहनने, पढ़ने-लिखने आदि को लेकर जब-तब नकारात्मक बातें करते रहते हैं। जबकि माता-पिता का ऐसा व्यवहार बच्चे के व्यक्तित्व पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। अपनी आलोचना किसी को पसंद नहीं आती। बच्चे की कुछ नकारात्मक आदतों को नजरअंदाज करना सीखें। रहन-सहन के मामले में बच्चे स्वाभाविक रूप से लापरवाह देखे जाते हैं। किताबों के प्रति अरुचि ज्यादातर बच्चों में होती है। कोई बच्चा पाठ्यपुस्तकों को रस लेकर नहीं पढ़ता। वह बस परीक्षा पास करने के मकसद से पढ़ता है। इसलिए अगर बच्चे को सही तरीका सिखाना है, तो सकारात्मक तरीके से, अपनी आवाज में प्यार लाकर सिखाएं, डांट-डपट कर, उसकी आलोचना या निंदा करके नहीं।
प्रेरित करें
बच्चों के अच्छे कामों के लिए बढ़-चढ़ कर सराहना करनी चाहिए। घर के सभी सदस्यों से उसके अच्छे काम के बारे में बताएं, उसके दोस्तों को उसकी अच्छी आदतों के बारे में बताएं। जब जहां मौका मिले, बच्चे को प्रेरक प्रसंग सुनाएं। महापुरुषों, सफल व्यक्तियों के गुणों से परिचित कराएं। इस तरह बच्चों में कुछ बेहतर करने का सपना जागता है, वे उससे भी बेहतर करने का प्रयास करने लगते हैं, अपने भीतर बदलाव लाना शुरू करते हैं। अपना मूल्यांकन वे खुद करना सीखते हैं। बच्चे जब अपना मूल्यांकन खुद करना सीख जाएं, तो वे अपनी कमियों को खुद ही दूर करने लगते हैं। इस तरह उन्हें पढ़ाई-लिखाई में भी बेहतर करने की लालसा जागती है, बेहतर प्रदर्शन करने की होड़ में लग जाते हैं।
धीरे-धीरे प्रयास करें
परीक्षाएं नजदीक आ रही हैं, मगर स्कूल में होने वाली नियमित परीक्षाओं में अगर बच्चे का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं है, तो उसे बोर्ड परीक्षा का भय दिखा कर बार-बार डराएं नहीं। उसके अध्यापकों से उसकी कमियों के बारे में जानने का प्रयास करें। उसके दोस्तों से जानने का प्रयास करें कि आखिर उसका ध्यान क्यों भटक रहा है। अभी छह महीने का समय है, इसलिए बहुत चिंतित होकर बच्चे पर एकदम से दबाव बनाना शुरू न करें। ऐसा बिल्कुल न करें कि उसका खेलने के लिए बाहर जाना बंद कर दें। टीवी देखना बंद कर दें। स्कूल से आते ही खा-पीकर पढ़ने न बिठा दें। धीरे-धीरे प्रयास करें। पहले बच्चे से कहें कि वह अपनी सुविधा को ध्यान में रखते हुए टाईम-टेबल बनाए कि उसे कब और कितनी देर पढ़ना है, कब खेलने जाना है। कैसे खेलने-कूदने का समय कम करके पढ़ाई के लिए समय देना है। फिर आप उसके टाईम-टेबल पर बातचीत करें और समय का बंटवारा ठीक करें। उसके बाद रोज ध्यान रखें कि वह अपने बनाए टाईम-टेबल का पालन कर रहा है कि नहीं।
दिनचर्या का रखें ध्यान
कई बच्चे स्कूल से आने के बाद थके होते हैं, उनमें ऊर्जा नहीं होती कि वे दूसरा काम कर सकें। इसलिए उन्हें कपड़े बदलने के बाद खाने और टीवी देखने दें। कुछ देर आराम करने के बाद उन्हें पढ़ने बिठाएं। फिर खेलने भेज दें। लौट कर आएं, तो भोजन के बाद फिर पढ़ने बिठाएं। इस तरह धीरे-धीरे आदत बनेगी, तो बच्चे अपने आप पढ़ने में ध्यान लगाएंगे।
इस दौरान बच्चों के खानपान पर विशेष ध्यान दें। सुबह का नाश्ता ठीक से कराएं। दोपहर को हल्का पर पोषणयुक्त भोजन दें। रात को भारी भोजन जैसे राजमा, उड़द दाल, परांठे वगैरह न दें। सोने से पहले उन्हें गरम दूध जरूर पीने को दें। कभी बासी भोजन न खाने को दें। धीरे-धीरे प्रयास करें कि फ्रिज में रखा, डिब्बाबंद, बाजार का भोजन, ब्रेड वगैरह खाने की आदत छूट जाए। नूडल्स वगैरह छोड़ दें। इस तरह उनका पेट साफ रहेगा, तो मन भी प्रसन्न रहेगा।
तुलना न करें
हर बच्चा दूसरे बच्चे से अलग होता है। इसलिए कभी किसी बच्चे से अपने बच्चे की तुलना न करें। कभी किसी बच्चे का उदाहरण देते हुए यह न कहें कि देखो, फलां बच्चा कितना अनुशासित रहता है, किस तरह अपने माता-पिता की बातें मानता है, किस तरह सारा काम छोड़ कर सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दे रहा है। इस तरह की बातों से बच्चे चिढ़ते हैं। खासकर अपने दोस्तों से अपनी तुलना उन्हें कतई पसंद नहीं आती। इसलिए अगर बच्चों को प्रोत्साहित करना है, तो उसके दोस्तों का उदाहरण देकर न करें। कभी उसके दोस्तों से उसकी कमियों को जानने का प्रयास न करें। महापुरुषों, सफल व्यक्तियों का उदाहरण देकर बेशक उन्हें प्रोत्साहित करते रहें। पर हमेशा बच्चे से बात करते समय अपने चेहरे पर प्रसन्नता, मुस्कान और आवाज में नरमी रखें। क्योंकि तीखे स्वर में कही गई अच्छी बातें भी मन पर बुरा असर डालती हैं।
