श्याम प्रसाद बाहरी कमरे में बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे थे। तभी दरवाजे की घंटी बज उठी- ‘टिंग टोंग, टिंग टोंग।’ उनकी श्रीमती जी ने जाकर दरवाजा खोला। सामने पोस्टमैन बाबू खड़े थे। उनसे चिट्ठी लेकर श्रीमती जी अंदर आ गईं।
‘कौन था?’ श्याम प्रसाद ने पूछा।
‘पोस्टमैन था। आपके नाम चिट्ठी है।’ श्रीमती जी ने बताया।
‘कोई नहीं, रख दो, बाद में पढ़ूंगा।’ श्याम प्रसाद ने टालते हुए कहा।
‘अरे कितनी सुंदर है यह चिट्ठी! इस पर बनी चित्रकारी तो कमाल की है! श्रीमती जी चिट्ठी पर नजर फिराते हुए बोलीं। उनकी आवाज में चहक थी।
‘किसने भेजी है?’ श्याम प्रसाद ने जानना चाहा।
‘किसी का भी नाम तो नहीं लिखा है इस पर?’ चिट्ठी को उलट-पलट कर देखने के बाद श्रीमती बोलीं।
स्कूल से वापस आकर श्याम प्रसाद फुरसत में बैठे हुए थे। श्रीमती उन्हें चिट्ठी पकड़ा कर घर के दूसरे कामों में व्यस्त हो गई। चिट्ठी हाथ में लेते ही उनका चेहरा खुशी से दमक उठा। लिफाफे पर स्कूल का खूबसूरत फाटक बना था। स्कूल का नाम भी सुंदर-सुंदर अक्षरों में लिखा था। चारों कोनों पर नन्हे-नन्हे गमले और उनमे रंग बिरंगे फूल लिफाफे की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे। अब तो वे चिट्ठी पढ़ने के लिए उतावले हो उठे।
चिट्ठी के पीछे ‘प्रिंसिपल सर के लिए चिट्ठी’ कई तरह के रंगों से लिखा हुआ था, जो दिखने में बहुत आकर्षक लग रहा था। चिट्ठी को जहां से खोलना था, वहां एक सुंदर स्माइली चिपकी थी। मुस्कुराते हुए उन्होंने लिफाफा खोला। उसमें एक कागज निकला। थोड़े समय के लिए तो वे अवाक रह गए, क्योंकि कागज में तो कुछ भी नहीं लिखा था। एक पन्ने पर सिर्फ चित्रकारी थी। और चित्रकारी ऐसी कि जैसे उसमें किसी ने जान डाल दी हो।
उन्हें चिट्ठी बहुत पसंद आई। वे गौर से उसे देख कर बुदबुदाने लगे- ‘अरे वाह! क्लास रूम कितना खूबसूरत बनाया है, सच्ची तारीफ के काबिल है। मगर ये क्या, क्लास रूम में कुछ सीटें टूटी हैं?
तभी उनकी नजर दूसरी ओर गई। स्कूल का मैदान तो ऐसा बनाया है जैसे मैं वहीं बैठा हूं। बहुत उम्दा! यकीनन यह तो सचमुच कोई कलाकार का काम लगता है। लेकिन मैदान के किनारे-किनारे जो पौधे लगे हैं, वे सूखे सूखे मुरझाए से क्यों?
थोड़ा सोचने के बाद फिर से वे चिट्ठी देखने लगे-
‘खूबसूरत मैदान के बीच-बीच में गड्ढे कितने बुरे लग रहे हैं।’
अंत में उनकी नजर चिट्ठी के एक हिस्से पर पड़ी, जहां एक प्रधानाचार्य कक्ष बना था। उसमें प्रिंसिपल साहब बैठे थे। उनकी भौहें गुस्से से ऊपर चढ़ी हुई थीं और उनके हाथ में एक मोटा डंडा था। चिट्ठी पर श्याम प्रसाद की नजरें जमी हुई थीं। भेजने वाले का नाम भी नहीं लिखा था, लेकिन उन्होंने इसका अंदाजा लगा लिया कि यह जरूर उनके स्कूल के किसी छात्र ने ही भेजी है। वह उन चित्रों में अभी कुछ और ढूंढ़ने की कोशिश कर रहे थे, तभी उधर से गुजरती हुई श्रीमती पूछ पड़ीं- ‘किसकी चिट्ठी है?’ ‘एक खास दोस्त ने भेजी है।’ श्याम प्रसाद बोल कर फिर से चिट्ठी में बने चित्रों में खो गए।

