इंदुशेखर तत्पुरुष

आधुनिक विश्व को भारतीय परंपरा और तत्त्वज्ञान से परिचित कराने और प्रभावित करने वाले भारतीयों में सर्वाधिक योगदान स्वामी विवेकानंद का है। अपने प्रकांड ज्ञान, प्रखर तर्कशक्ति, निष्कलंक चरित्र, अटूट आत्मविश्वास और अथक परिश्रम से उन्होंने ऐसा चमत्कार कर दिखाया, जो पिछली अनेक सदियों में नहीं हो सका। विवेकानंद के विचारों की एक विलक्षण बानगी है उनकी कला-दृष्टि और उनके भाषापरक विचार, जो उनके व्याख्यानों, पत्रों और वार्तालापों में यत्र-तत्र बिखरे पड़े है। सन 1901 में बेलूर मठ में कलकत्ता जुबली आर्ट अकादमी के संस्थापक और अध्यापक रणदाप्रसाद दासगुप्त से हुई उनकी लंबी बातचीत इस दृष्टि से एक उल्लेखनीय प्रसंग है।

हमारे ऐंद्रिक संवेदनों को प्रभावित करने वाले साधनों, उपकरणों द्वारा कला पर पड़ने वाले प्रभावों को भी विवेकानंद एक कलामर्मज्ञ की तरह अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने देते। यह वह काल था, जब फोटोग्राफी व्यापक रूप से जनजीवन का हिस्सा बन रही थी। ऐसी स्थिति में चित्र शैली पर पड़ने वाले प्रभाव को रेखांकित करते हुए वे टिप्पणी करते हैं कि, ‘पूर्व काल के शिल्पकार अपने-अपने मस्तिष्क के नए-नए भाव निकालने तथा उन्हीं भावों को चित्रों द्वारा व्यक्त करने का प्रयत्न किया करते थे। आजकल फोटो जैसे चित्र होने के कारण मस्तिष्क के प्रयोग की शक्ति और प्रयत्न लुप्त होते जा रहे हैं। पर प्रत्येक जाति की एक विशेषता है। आचरण, व्यवहार, आहार, विहार, चित्र, शिल्प में उस विशेष भाव का विकास देखा जाता है।’
पश्चिमी और भारतीय कला दृष्टि के अंतर को बताते हुए विवेकानंद कहते हैं कि ‘जो जातियां बहुत जड़वादी और इहकाल को ही सब कुछ मानती हैं, वे प्रकृति के नाम-रूप को ही अपना परम उद्देश्य मान लेती हैं और शिल्प में भी उसी के अनुसार भाव प्रकट करने की चेष्टा करती हैं, पर जो जाति प्रकृति के परे किसी भाव की प्राप्ति को ही जीवन का परम उद्देश्य मानती है, वह उसी भाव को प्रकृतिगत शक्ति की सहायता से शिल्प में प्रकट करने की चेष्टा करती है।… उन सब (पश्चिमी) देशों का एक-एक चित्र देख कर आपको वास्तविक प्राकृतिक दृश्य का भ्रम होगा। इसी प्रकार इस देश में भी प्राचीनकाल में स्थापत्य-विद्या का जिस समय बहुत विकास हुआ था, उस समय की एक-एक मूर्ति देखने से ऐसा प्रतीत होता है, मानो वह आपको इस जड़ प्राकृतिक राज्य से उठा कर एक नवीन भावलोक में ले जाएगी।’

‘यूनानी कला का रहस्य है प्रकृति के सूक्ष्मतम ब्योरों तक का अनुकरण करना, पर भारतीय कला का रहस्य है आदर्श की अभिव्यक्ति करना।’ प्रसंगत: यहां सुविख्यात भारतीय कलाचिंतक आनंद कुमारस्वामी का स्मरण होता है, जहां वे भारतीय दृष्टि का विवेचन करते हुए ‘सुसदृश्य’ होने को कला का दोष मानते हैं। उनके अनुसार कला का कमल इतना कमल जैसा बन जाए कि भौंरे को कमल का भ्रम हो जाए तो वह कला की श्रेष्ठता नहीं, वरन कला का दोष है। चित्रकार द्वारा कमल बनाते समय इतना सादृश्य रखना ही पर्याप्त है कि वह कमल का चित्र लगे, गुड़हल या गुलाब का नहीं।

इस वार्तालाप-प्रसंग में स्वामी जी तत्कालीन प्रचलित चित्रों को देख कर उनके न्यूनातिरेक पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं, ‘मां काली के चित्र को ही लीजिए, इसमें एक साथ ही कल्याणकारी तथा भयावह भावों का समावेश है, पर प्रचलित चित्रों में इन दोनों भावों के यथार्थ विकास को भी नहीं देखा जाता। इतना ही नहीं, भावों में से किसी एक को भी चित्रित करने का कोई प्रयत्न नहीं कर रहा है।’

विवेकानंद नाट्य विद्या पर एक बोधप्रद टिप्पणी करते हुए उसे कलाओं में कठिनतम इसलिए बताते हैं कि यह एक साथ दो ऐंद्रिक संवेदनों को प्रभावित करती है। वे लिखते हैं- ‘नाटक सब कलाओं में कठिनतम है। उसमें दो चीजों को संतुष्ट करना पड़ता है- पहले कान, दूसरे आंखें। दृश्य का चित्रण करने में अगर एक ही चीज का अंकन हो जाए, तो काफी है, पर अनेक विषयों का चित्रांकन करके भी केंद्रीय रस अक्षुण्ण रख पाना बहुत कठिन है। दूसरी मुश्किल चीज है मंच-व्यवस्था, यानी विविध वस्तुओं को इस तरह विन्यस्त करना कि केंद्रीय रस अक्षुण्ण बना रहे।’

इसी तरह विवेकानंद कविता के मर्म को पकड़ना जानते हैं। अनेक भाषाओं के ज्ञाता और स्वयं कवि होने के कारण ही वे यह कविजनोचित बात कहते हैं कि, ‘अनुवाद करने से कविता का अधिकांश सौंदर्य नष्ट हो जाता है।’

नासदीय सूक्त में आए ‘तम आसीत तमसा गूढ़मग्रे’ की विलक्षण अर्थच्छटा को समझाते हुए वे कहते हैं कि, ‘इस दृश्य के वर्णन का प्रयत्न तीन कवियों ने जिस प्रकार किया है, वह मुझे याद आता है। मिल्टन कहते हैं- प्रकाश नहीं था, अंधकार ही दिखाई देता था। कालिदास कहते हैं- ऐसा अंधकार जिसका सूई से भेदन किया जा सकता है। पर ‘अंधकार में छिपा हुआ अंधकार’- इस वैदिक वर्णन को कोई नहीं पाता।’

यह विवेकानंद की गहन भाषावैज्ञानिक सोच का परिचायक है कि वे बांग्ला भाषा को संस्कृत की अपेक्षा पालि भाषा के निकट ले जाने का प्रस्ताव करते हैं, किंतु समृद्धि की दृष्टि से संस्कृत निर्भरता को पर्याप्त महत्त्व देते हैं, ‘बांगला भाषा का आदर्श संस्कृत न होकर पालि भाषा होना चाहिए, क्योंकि पालि बांग्ला से बहुत कुछ मिलती-जुलती है। पर बांग्ला में पारिभाषिक शब्दों को बनाने या उनका अनुवाद करने में संस्कृत शब्दों का व्यवहार उचित है। नए शब्दों को गढ़ने का भी प्रयत्न होना चाहिए। इसके लिए अगर संस्कृत के कोश से पारिभाषिक शब्दों का संग्रह किया जाए, तो उससे बांग्ला भाषा के निर्माण में बड़ी सफलता मिलेगी।’

वस्तुत: विवेकानंद भाषा प्रयोग के मुद्दे पर शास्त्रीयता की अपेक्षा लोकानुकूलता को वरीयता देते हैं और उनका लोकधर्मी स्वरूप ही है कि स्वयं शास्त्रों के प्रकांड पंडित और ज्ञान के चलते-फिरते शब्दकोश होने के बावजूद वे लोक के मन के निकटतम भाषा के पक्षधर हैं। श्रीरामकृष्ण मठ द्वारा संचालित ‘उद्बोधन’ पत्र के संपादक को स्वामी जी ने 20 फरवरी, 1900 में तत्कालीन बांग्ला भाषा की स्थिति पर विचार रखते हुए एक पत्र लिखा- ‘पांडित्य अवश्य उत्तम है, पर क्या पांडित्य का प्रदर्शन जटिल, अप्राकृतिक तथा कल्पित भाषा को छोड़ और किसी भाषा में नहीं हो सकता? बोलचाल की भाषा में क्या कलात्मक निपुणता नहीं प्रदर्शित की जा सकती है? स्वाभाविक भाषा को छोड़ कर एक अस्वाभाविक भाषा को तैयार करने में क्या लाभ? घर में जिस भाषा में हम बातचीत करते हैं, उसी में मन ही मन समस्त पांडित्य की गवेषणा भी करते हैं, तो फिर लिखने के समय ही हम जटिल भाषा का प्रयोग क्यों करने लगते हैं?… भाषा को ऐसी बनाना होगा- मानो शुद्ध इस्पात, जैसा चाहो मरोड़ लो, पर फिर से जैसे का तैसा, कहो तो एक चोट में ही पत्थर काट दे, लेकिन दांत न टूटे। हमारी भाषा संस्कृत के समान बड़े-बड़े निरर्थक शब्दों का प्रयोग करते-करते तथा उसके आडंबर और केवल उसके इसी एक पहलू की नकल करते-करते अस्वाभाविक होती जा रही है। भाषा ही तो जाति की उन्नति का प्रधान लक्षण और उपाय हैं।’

‘उद्बोधन’ के ही एक अन्य प्रसंग में वे लिखते हैं कि, ‘क्रियापदों का अत्यधिक प्रयोग लेखन को कमजोर बनाता है। क्योंकि इससे भाव ठहर से जाते हैं।’ लेखकों को परामर्श देते हुए वे लिखते हैं, ‘आजकल के लेखक जब लिखने बैठते हैं तब क्रियापद का बहुत प्रयोग करते हैं। इससे भाषा में शक्ति नहीं आती। विशेषण द्वारा क्रियापदों का भाव प्रकट करने से भाषा में ओज अधिक बढ़ता है। आगे तुम इस प्रकार लिखने की चेष्टा करो तो ‘उद्बोधन’ में ऐसी ही भाषा में लेख लिखने का प्रयत्न करना। भाषा में क्रियापद प्रयोग करने का क्या तात्पर्य है, जानते हो? इस प्रकार भावों को विराम मिलता है। इसलिए अधिक क्रियापदों का प्रयोग करना, जल्दी-जल्दी श्वास लेने के समान दुर्बलता का चिह्न मात्र है। स्वामी विवेकानंद की कला तथा साहित्यपरक दृष्टि और अंत में, इस आधुनिक राष्ट्रगुरु की एक विलक्षण उक्ति, जिसे पढ़ कर सहसा विश्वास नहीं होता कि धर्म और अध्यात्म के पथ का पुरोधा एक संन्यासी यह बात कह रहा है, अवलोकनीय है: ‘नाटक और संगीत स्वयं धर्म है, कोई भी गीत क्यों न हो, प्रेम गीत हो या कोई अन्य गीत कोई चिंता नहीं। अगर उस गान में कोई व्यक्ति अपनी पूरी आत्मा उड़ेल दे तो बस उसी से उसको मुक्ति मिल जाती है।’