मिथिलेश श्रीवास्तव
कविता में छंद से मुक्ति मनुष्य की मुक्ति का रास्ता खोजने में सहायक हो सकती है। इंसान आज भी आदिम प्रवृत्तियों का गुलाम बना हुआ है। उसकी प्रवृत्तियों में बदलाव और उनके आधुनिकीकरण के रास्ते में छंद जंजीर की तरह जकड़ा हुआ है। छंदमुक्त कविता का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, लेकिन समकालीन कविता का सर्वमान्य स्वरूप अब छंदमुक्तता ही है, लेकिन इसके बावजूद छंद के पैरोकार और छंद में लिखने वालों की संख्या कम नहीं हो रही है। हैरानी तो तब होती है जब विश्वविद्यालयों के विद्वान भी छंद की वकालत करते सुनाई पड़ते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि छंद का विरोध क्यों किया जाए।
दरअसल, छंदमुक्तता स्वच्छंदता का अहसास दिलाती है और भाषा बरतने की पूरी छूट देती है। समय बदलने के साथ मनुष्य के अहसास भी बदलते हैं और अहसास के साथ भाषा की तमीज भी बदलती है। मनुष्य के दुखों के रंग और रूप भी बदलते हैं। स्वतंत्रचेता और लोकतांत्रिक मनुष्य अपनी तकलीफों को बयान करते समय तुक बैठाने और मात्राओं की गिनती में अपनी ऊर्जा जाया नहीं कर सकता है और करनी भी नहीं चाहिए। छंदमुक्तता इंसान को लोकतांत्रिक मूल्यों की सकारात्मक समझ देती और जड़ विचारों और सोच से मुक्त होने में मदद करती है।
कविता में छंदमुक्तता उसी समय आई, जब उन्नीसवीं सदी में आजादी और लोकतंत्र के स्वर उभर रहे थे। जैसे-जैसे आजादी की मांग बढ़ती गई, छंदमुक्त कविता की स्वीकार्यता बढ़ती गई। इस तथ्य से मुंह फेरा नहीं जा सकता है। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, गजानन माधव मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय और विष्णु खरे समकालीन छंदमुक्त कविता के महत्त्वपूर्ण कवि हैं। रघुवीर सहाय और विष्णु खरे से हम जान पाए कि वे दोनों व्यवहार-विचार में बेहद लोकतांत्रिक और समाज के लिए चिंतित व्यक्ति थे। उनकी लोकतांत्रिकता और इंसानियत और समाजोन्मुखतता का संबंध उनके व्यक्तित्व की छंदमुक्तता से था। उन्होंने अपना समय कविता को तुकांत बनाने और मात्राओं की गिनती में व्यर्थ कभी नहीं किया। रघुवीर सहाय कहते थे- समकालीन कविता के अपने नए छंद हैं, जिनकी पहचान होना बाकी है। उन्होंने अपनी कविता में संगीत और लय होने की बात कही है, लेकिन अगर उनकी कविता कोई लय में पढ़ने लगे तो उसे वे रोक देते और कहते- कविता वैसे पढ़िए जैसे गद्य का पाठ करते हैं।
विष्णु खरे की कविताओं की गद्यात्मकता इस बात का प्रमाण है कि वे कविता को छंद के करीब भी नहीं फटकने देते। ‘सबकी आवाज के पर्दे में’ संग्रह की कविता ‘जो टेम्पो में घर बदलते हैं’ की कुछ पंक्तियां हैं:
‘बेटा बहू एक किशोर होती हुई लड़की अपने छोटे दो भाई बहनों के साथ
बैठे हैं टेम्पोवाले और उसके क्लीनर से सटे हुए
जो किराए को लेकर हुए मोलभाव से ही समझ
गया था
और क्लीनर को सुनाते हुए चोली के पीछे क्या है
गाने लगा था
सिर नीचा किए किशोरी बरजने लगी छोटों को
कि साथ न गाएं ताल न दें
गिरस्तिन देखती है पति को
जो अतिरिक्त गौर से देख रहा है ट्रैफिक को’
कविता न यहां से शुरू होती है, न खत्म होती है। चार पृष्ठों में फैली इस कविता का सर्वाधिक मार्मिक स्थल इन पंक्तियों में वर्णित हो रहा है- ‘चोली के पीछे क्या है’ अश्लील इशारों की अभिव्यक्ति है और इस अश्लील अभिव्यक्ति से शोहदे किस्म के टेम्पो ड्राइवर और क्लीनर एक किशोर होती हुई लड़की का अपमान कर रहे हैं। कवि रीतिकालीन कवियों की तरह किशोर होती लड़की का नख-शिख वर्णन नहीं कर रहा है, बल्कि एक लड़की की उपस्थिति और उस लड़की को लेकर समाज की रुग्ण मानसिकता का ब्योरेवार वर्णन कर रहा है। निम्नवर्ग में विरोध की क्षमता कहां कभी रही है, वह हर अश्लीलता और दमन का चुपचाप सहन करता रहा है। गुस्सा तो है, लेकिन गुस्सा निकल रहा है दो छोटे मासूम बच्चों पर।
इस पूरे प्रसंग में सबसे दयनीय स्थिति में है उनका पिता, जो अतिरिक्त गौर से देख रहा है ट्रैफिक को। निम्नवर्ग और निम्न मध्यवर्ग की दुर्दशा एक जैसा है। उनकी बेटियां और उनकी औरतें इसी तरह के अश्लील इशारों से जलील होती रही हैं। अब देखिए, अपने समाज की इस रुग्ण मानसिकता का बयान कोई कवि छंद और मात्राओं की गिनती करके नहीं कर सकता है। अपने समाज को समझने और कविता में उतारने के लिए आजाद मनोभूमि को आत्मसात करना होगा। औरत की इज्जत करना और उसकी आजादी को समझना होगा। यह समझना होगा कि औरत पूरा मनुष्य होती है। टेम्पोवाला ‘किराए को लेकर हुए मोलभाव से ही समझ गया था।’ क्या समझ गया था टेम्पोवाला? यही कि एक लाचार निम्नवर्गीय परिवार का सामान ले जा रहा है और उस परिवार की औरत के साथ अश्लील व्यवहार कर सकता है। इस सोच पर विष्णु खरे प्रहार करते हैं। विष्णु खरे ने लगभग तय कर दिया है कि आज की कविता के लिए विषय-वस्तु और उसके ब्योरे महत्त्वपूर्ण हैं, न कि छंद वैगरह।
मंगलेश डबराल ने एक साक्षात्कार में कहा था कि ‘आज की ज्यादातर कविता छंद में नहीं है, पर उसे छंदोबद्ध कर दें या तुकांत कर दें तो कविता की जन-अपील बढ़ जाएगी, यह कहना कठिन है। अगर एक छंद नए विचारों का, नई संवेदना का वाहक है तो ठीक है। अगर वह हमारे समय के मनुष्य के बारे में, उसके व्यवहारों के बारे में कोई नई बात नहीं कहता, तो वह घटिया शिल्प है।’
छंद मनुष्य को मुक्ति नहीं देता या यों कहें कि बमुश्किल नए विचारों का वाहक बनता है। छंद के पक्ष में बोलने वाले यह कहते हैं कि समकालीन कवियों को अपनी कविता याद नहीं रहती, क्योंकि वह छंद में नहीं होती। कविता का लिखा हुआ या छपा हुआ रूप देख कर वे कविता पढ़ते हैं। केदारनाथ सिंह ने कहा था, ‘प्रेस के आने के बाद लिखित परंपरा की शुरुआत हुई और वाचिक परंपरा का क्षय होने लगा। प्रेस का मतलब छपी हुई सामग्री से है और छपी हुई सामग्री से जनता का कितना जुड़ाव है।’ कविता याद न रहने का कारण वाचिक परंपरा के क्षरण में है, न कि कविता के छंदमुक्त होने में।
रघुवीर सहाय ने कहा है कि ‘दुर्भाग्य है कि हिंदी में जो कवि हैं, जो अपने को गायक भी कहते हैं, वे न कवि हैं, न गायक हैं, पर गाते जा रहे हैं।’ पर वे यह भी कहते हैं कि ‘जबसे हमने छंद और संगीत के रिश्ते को छोड़ दिया, तब से हमारे पास केवल भाषा रह गई है, नंगी भाषा।’ इस नंगी भाषा को बरतने की जिम्मेवारी आज के कवि पर है और शायद यह जिम्मेवारी छंदबद्ध कविता के सृजन से काफी जटिल और कठिन है।

