जबसे आधुनिकता की बात शुरू हुई, बहुत सारी परंपरागत चीजों को वैज्ञानिक कसौटी पर कस कर देखा जाने लगा। पूजा-पाठ, व्रत-उपवास, यज्ञ-अनुष्ठान आदि संस्कार धार्मिक होने की निशानी माने जाने लगे। इसलिए आधुनिकता और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने वाले लोगों के पास समय होते हुए भी इन सब कार्यों के लिए समय नहीं था। ऐसे लोगों की नजर में पूजा-पाठ पाखंड था। आधुनिकता और भौतिकता का नशा लोगों पर इस कदर सवार था कि लोग ईश्वर का अस्तित्व ही नकारने लगे थे। पाश्चात्य संस्कृति की गूंज लोगों के कानों में इस कदर समा चुकी थी कि भजन कीर्तन करना, देवदर्शन करना, धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन, धार्मिक पुस्तकें सब बेमानी थे। दौलत और शोहरत की अभिलाषा ने लोगों को अति महत्त्वाकांक्षी बना दिया।

पर यह सवाल अपनी जगह बना रहा कि क्या धन हमें मानसिक सुकून दे सकता है? क्या शोहरत पाने से हमें आत्मिक संतुष्टि मिल सकती है? सब कुछ पा लेने के बाद भी लोगों को जीवन में अजीब-सी रिक्तता महसूस होने लगी, भौतिकता का नशा ठंडा पड़ने लगा। कार्य की अधिकता, समय का अभाव, रोजाना की भागमभाग वाली जीवन-शैली से थका-हारा इंसान टूटने लगा। फिर वह ऐसे किसी दरबार, ईष्टदेव, गुरु को तलाश्ने लगा, जहां उसे अपने अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर मिल सकें, सुकून, मानसिक शांति प्राप्त हो सके। आज स्थिति यह है कि बड़े से बड़ा राजनेता, फिल्म अभिनेता, उद्योगपति, खिलाड़ी, अफसर, विद्यार्थी यहां तक की बेरोजगार युवक-युवतियां भी ईश्वरीय सत्ता के सम्मुख नत-मस्तक हैं। आखिर इसका क्या कारण है?

असुरक्षा की भावना
इसका एक कारण है असुरक्षा की भावना। आजकल लोगों का मन कमजोर होता जा रहा है। रिश्तों की उलझन, पारिवारिक तनाव, आर्थिक परेशानी, बच्चों की समस्याएं जैसे मसलों पर आज का इंसान अपने को असुरक्षित महसूस करता है। होम्योपैथिक डॉक्टर एपी सिंह को जब पता चला कि उनकी बेटी को ब्लड कैंसर है तो जैसे उनकी दुनिया ही बदरंग हो गई। एपी सिंह के अनुसार, ‘मैं तो पूरी तरह हताश था, डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि अब वह पांच से छह महीने तक ही जीवित रहेगी। अपने एक दोस्त जो एक बाबा के भक्त हैं, उनके कहने पर मैं उसे वहां ले गया। वहां से वापस आने के बाद जब सिटिंग के लिए उसे डॉक्टर के पास ले गया, तो डॉक्टर हैरान रह गए। मेरी लड़की ठीक हो चुकी थी। पल-पल मौत के करीब जाने वाली मेरी बेटी हमेशा के लिए मेरे पास थी। अब तो मेरी आस्था ईश्वर में और बढ़ गई। मैं साल में दो बार वहां जाता हूं। भक्ति ने मुझे जीने का मकसद दे दिया।’ ऐसे विश्वास करने वाले अनेक लोग हैं, जिनके हताशा के क्षणों में कोई चमत्कार हुआ और वे आधुनिकता के तर्कों को छोड़ धार्मिक गतिविधियों में शामिल हो गए।

एकाकी जीवन
आजकल शहरों में रहने वाले युवा से लेकर बुजुर्ग तक बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिन्हें परिवार का सहारा प्राप्त नहीं है। वे एकाकी जीवन जी रहे हैं। ऐसे कई लोग भी निराशा के क्षणों में धार्मिक गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं। एक प्रतिष्ठित कंपनी के एमडी राहुल बनर्जी कहते हैं, ‘पैसा, शोहरत सब कुछ तो मेरे पास है। उम्र का एक लंबा समय बस काम करते-करते ही निकल गया। पहले तो पार्टी, मीटिंग, आउटिंग सब अच्छा लगता था। अब बच्चे भी अपने में व्यस्त हैं। कभी-कभी बड़ा अकेलापन महसूस होता था। पर जबसे मैंने एक आध्यात्मिक गुरु के शिविर में प्रशिक्षण प्रशिक्षण लिया है, तबसे मैं बहुत रिलैक्स महसूस करता हूं। मुझे तनाव से मुक्ति, भरपूर ऊर्जा, एकाग्रता, मानसिक शांति और सकारात्मक सोच मिली है।’

एक गृहिणी के अनुसार, ‘मेरे पति की असमय मृत्यु ने तो जैसे मुझे पागल ही कर दिया था। एक-दो बार मैंने अपने को मारने के प्रयत्न भी किए। तभी मेरे भाई ने मुझे एक आध्यात्मिक फाउंडेशन से जुड़ने को कहा। वहां के उपदेशों ने मुझे जीने का मकसद दे दिया। आज मैं अपने दो बच्चों के अलावा पचास अनाथ बच्चों की भी मां हूं। उनके चेहरों पर जब खुशी देखती हूं, तो अजीब सुकून मिलता है। पहले मुझे अकेलेपन से बहुत डर लगता था, पर अब मैं अपने साथ ईश्वर की उपस्थिति महसूस करती हूं।’

विफलता का डर
छब्बीस वर्षीय अमित चतुर्वेदी, जो हर हफ्ते सत्संग के लिए जाता है, का कहना है- ‘मेरे जीवन में एक समय ऐसा भी था जब मैं पूरी तरह से निराश हो गया था। तनाव ने मुझे घेर लिया था। मैं हमेशा से पायलट बनना चाहता था, लेकिन उसका प्रशिक्षण खर्चीला होने के कारण उसमें मेरा चयन नहीं हो सका। मैं अपने कमरे तक ही सीमित हो गया था। पर पापा के कई बार समझाने पर एक गुरु जी के प्रवचन सुन कर मेरी तो सोच ही बदल गई और फिर मैंने उत्साह के साथ तैयारी की और आज मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टेवयर डेवलेपर के पद पर कार्य कर रहा हूं। अब मुझे जिंदगी से कोई शिकायत नहीं है। मैं बहुत खुश हूं।’
दूसरी ओर, कैट परीक्षा की तैयारी कर रही स्वाती का कहना है कि, मैं रोज हनुमान मंदिर जाती हूं और हनुमान चालिसा का पाठ भी करती हूं क्योंकि मुझे विश्वास है कि हनुमान जी मेरी अच्छी नौकरी जरूर लगवाएंगे।

दिल्ली की मॉडल अनुश्री कहती हैं, ‘मैं पहले बिल्कुल पूजा नहीं करती थी, लेकिन अपनी दोस्त के साथ जबसे मैंने एक आश्रम से गुरुमंत्र लिया है, तबसे मेरी तकदीर ही बदल गई है। अब तो मेरे पास रोज मॉडलिंग के नए असाइनमेंट आते हैं। मुझे ही चुनना पड़ता है। मेरी तो जैसे सारी परेशानियों का अंत हो गया है।’

टूटता आत्मविश्वास
मैरिज ब्यूरो चलाने वाली शालिनी कहती हैं, ‘जिस दिन मैं पूजा नहीं करती हूं, मेरा पूरा दिन बेकार जाता है। आप यकीन मानिए, सुबह के बीस मिनट की पूजा से मुझमें गजब का आत्मविश्वास आ जाता है और मैं बिल्कुल तनाव मुक्त होकर अपना पूरा ध्यान अपने काम पर लगाती हूं।’
आॅफिस असिस्टेंट एकता शर्मा के अनुसार आॅफिस में आठ घंटे काम करना सच में बड़ा तनाव देता है। शरीर और दिमाग थक कर चूर-चूर हो जाते हैं। ऐसे में सुकून मिलता है तो सिर्फ प्रभु के चरणों में जाकर। मैं हर रोज बीस मिनट मंदिर में भगवान का ध्यान करती हूं, जिससे मुझे आत्मविश्वास मिलता है।

बढ़ता तनाव
गृहिणी रेखा शर्मा का कहना है, ‘आज से करीब दस साल पहले मेरे बेटे की मृत्यु ने मुझे तोड़ कर रख दिया था। मेरे पति के समझाने पर मैं एक आध्यात्मिक गुरु के संपर्क में आई। उन्होंने मुझे जीवन-मरण चक्र का भेद बताया। गीता का सार समझाया। इसके बाद मुझे जीवन से कोई गिला-शिकवा न रहा। ऐसे में मैं बाबा की शुक्रगुजार हूं जिन्होंने जीवन को सकारात्मक दृष्टि से देखने और सोचने में मेरी मदद की।’

बहुराष्ट्रीय कंपनी में मैनेजर शशांक सिन्हा कहते हैं, ‘आज हम वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं। मशीन की तरह काम करना पड़ता है, लेकिन हमारे अंदर का इंसान एक समय के बाद इस मशीनी जीवन से थक जाता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। सुबह से शाम तक एक मशीन की तरह जुटे रहने ने मुझे अजीब से तनाव ने घेर लिया था। मुझे अपनी जिंदगी निरर्थक लगने लगी। अपने दोस्तों के समझाने पर मैंने अध्यात्म का सहारा लिया। सच तो यह है कि आज हम बिल्कुल अकेले हैं। अपनों के होते हुए भी हमारे साथ कोई नहीं है। हमें अपने आप को खुद संभालना है। इसके लिए मेरे खयाल से अध्यात्म से अच्छा विकल्प दूसरा नहीं है। आज मैं अंदर से इतना मजबूत हो गया हूं कि अकेलापन, अपनों से बिछड़ने का भय, मृत्यु का डर, इन सब एहसासों से परे हूं। बस खुश रहना और दूसरों को खुशी बांटना यही मेरे जीवन का उद्देश्य है।’
इस तरह यह आधुनिकता के भागमभाग भरे समय में सुकून की तलाश में भटकते लोगों में आकर्षण पैदा करता आध्यात्मिकता का भी दौर है। यहां आधुनिकता और आध्यात्मिकता, वैज्ञानिकता और पारंपरिकता बार-बार टकराती और नया आकार लेने का प्रयास करती दिखती हैं।