साहित्य का अस्तित्व भाषा संबद्ध है। भाषा में संपूर्ण साहित्य रचा जाता है। इसी को व्यक्त करने के लिए साहित्य का एक नाम वांग्मय है। इस पुस्तक में जो आलोचनात्मक निबंध हैं, वे हिंदी भाषा में रचित साहित्य के विभिन्न रूपों और पक्षों का बोध कराते हैं। यह पुस्तक तीन खंडों में विभाजित है। पहले खंड में एक ओर हिंदी के भक्तिकाल के कवियों के काव्य का विद्यानिवास मिश्र और विश्वम्भरनाथ उपाध्याय द्वारा विवेचन और मूल्यांकन का पुनर्मूल्यांकन है, तो दूसरी ओर आधुनिक काल के महावीर प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा के चिंतन और लेखन का विवेचन है। साथ ही महाकवि जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य ‘कामायनी’ पर मुक्तिबोध के चिंतन और लेखन का पुनर्मूल्यांकन है। इसी खंड में विष्णुचंद्र शर्मा द्वारा जनकवि नागार्जुन की कविता की पक्षधर समालोचना का मूल्यांकन है। पहले खंड में ही वीरेन डंगवाल, बल्लीसिंह चीमा और मिथिलेश श्रीवास्तव की कविता का विवेचन और मूल्यांकन है। साथ ही कृष्णा सोबती की पुस्तक ‘लद्दाख’ और भीष्म साहनी के नाटक ‘आलमगीर’ का विवेचन भी है।
दूसरे खंड के निबंधों में सैद्धांतिक सोच और व्यावहारिक विश्लेषण की एकता है। इसी में हिंदी के रीतिकालीन काव्य में मौजूद इतिहास बोध की व्याख्या भी है। साथ ही वैश्वीकरण के दौर में प्रगतिवाद की स्थिति की पहचान और व्याख्या की कोशिश है। दूसरे खंड के अंत में भारतीय दलित साहित्य के बारे में बजरंग तिवारी की अनेक पुस्तकों पर एक समीक्षात्मक लेख है। तीसरे खंड के निबंधों का एक संबंध एक ओर तमिल, तेलुगु और बांग्ला की कविता से है तो दूसरी ओर एक विदेशी विचारक-आलोचक के चिंतन और लेखन से। इसमें तीन निबंध तमिल के सुब्रह्मण्य भारती, बांग्ला के बाउल गायक लालनशाह फकीर और तेलुगु के कवि वरवर राव पर हैं। अंत के एक निबंध का संबंध मूलगामी आलोचना के लेखक एडवर्ड सईद के विचारों की व्याख्या और मूल्यांकन से है।
शब्द और साधना : मैनेजर पांडेय; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 250 रुपए।
गांधी को समझने का यही समय
महात्मा गांधी वह महामानव हैं जिनकी प्रासंगिकता हर दौर में बनी रहेगी। व्यवस्थित जीवन जीने के लिए गांधी जी ने जो सूत्र दिए, वे उनके व्यक्तित्व की भांति आज भी उतनी महत्ता रखते हैं जितनी तत्कालीन समज में थी। जीवन के जिस भी क्षेत्र में उन्होंने जो भी अनुभव प्राप्त किए, वही अनुभव उन्होंने साररूप में मानव जाति को प्रदान किए। वे जीवन के हर क्षेत्र- चाहे वह शैक्षिक हो या राजनीतिक- के प्रति बहुत गंभीर थे। उनका विचार था कि सामयिक क्रांति के पहले सुषुप्त समाज को जाग्रत करना जरूरी है और ऐसा तभी हो सकता है जब शिक्षा की प्रकाश-किरणें सब तक पहुंचें। इसके लिए उन्होंने वैचारिक चिंतन ही नहीं किया, अपितु व्यावहारिक प्रयोग भी किए।
गांधी जी का मानना था कि शिक्षा वही उचित है जो बच्चों को उनके उत्तरदायित्व और कर्तव्य का बोध कराए। उनके अनुसार शिक्षा तो वही वही है जो चरित्र का उचित दिशा में निर्माण करे। प्रस्तुत पुस्तक ‘गांधी को समझने का यही समय’ अपने में गांधी जी द्वारा प्रतिपादित चारित्रिक, शैक्षिक, सामाजिक एवं राजनीतिक मूल्यों को समाहित किए हुए है। इन मूल्यों में जो विकृति आई है, उसे दूर करने के लिए हमें गांधी को समझना होगा और गांधी को समझने का यही समय उपयुक्त है।
गांधी को समझने का यही समय : जगमोहन सिंह राजपूत; किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 300 रुपए।
मैजिक मुहल्ला-एक
मराठी और अंग्रेजी के अन्यतम कवि दिलीप चित्रे की कविताओं के इस विशद अनुवाद-संकलन के प्रकाशन से हिंदी कविता और भाषा को एक नया भावबोध और स्वर-संपत्ति मिल रही है। दिलीप चित्रे और उनके समानधर्मा अरुण कोलटकर हिंदी में पहले से समादृत हैं, बल्कि इनकी उपस्थिति लगभग हिंदी कवि सरीखी रही है। इनके अनुवाद भी शुरू से होते आए हैं। लेकिन संभवत: पहली बार दिलीप चित्रे की अंग्रेजी और मराठी कविताओं का ऐसा समावेशी प्रतिनिधि संकलन सामने आ रहा है। एक विशेष अंतर, और सुखद अंतर यह है कि यह अनुवाद किसी मराठीभाषी मित्र ने नहीं बल्कि हिंदीभाषी तुषार धवल ने किए हैं। तुषार स्वयं बेहद संवेदनशील कवि हैं और अपनी भाषा के संस्कार व स्थापत्य से अंतरंग भी। इसलिए दिलीप चित्रे की संश्लिष्ट, ऋजु व दुर्गम कविताओं तथा पंक्तियों के भी प्राय: समतुल्य पाठ प्रस्तुत करने में वह सफल रहे हैं। ये अनुवाद हिंदी मूल का भ्रम देते हुए भी समकालीन हिंदी कविता को एक सर्वथा भिन्न और अमूल्य आयातित स्वर प्रदान करते हैं।
दिलीप चित्रे भारतीय कविता की उस धारा के प्रतिनिधि हैं जिसने आधुनिकतावाद एवं देशज परंपराओं का संयुक्ताक्षर बनाया और अपने समय को, जो एक साथ वैश्विक और भारतीय है, बिल्कुल नए मुहावरों, बिंबों तथा लयों में व्यक्त किया। पिछले सौ वर्षों में पाश्चात्य कविता, भावबोध तथा साहित्य-विचार से भारतीय कविता के संबंध घट-बढ़ और तनाव के साथ बदलते रहे हैं। रामानुजन, कोलटकर, जयंत महापात्र और दिलीप चित्रे जैसे कवियों ने, जो एक साथ अपनी भाषा और अंग्रेजी में लिखते रहे, इस संबंध को नई परिभाषा दी और अपनी भाषा को एक इतर ऊर्जा से आविष्ट किया। यहां संकलित बहुत-सी कविताओं में इसे देखा जा सकता है। साथ ही, संत तुका और शैव परंपरा ने दिलीप चित्रे की कविता को अप्रत्याशित पौराणिकता भी दी और इस प्रकार एक नया काव्य रसायन निर्मित हुआ। तुषार धवल ने सावधानी और धैर्य के साथ इन सभी रसों को हिंदी में ढाला है।
मैजिक मुहल्ला-एक : दिलीप चित्रे, अनुवाद: तुषार धवल; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 695 रुपए।
राग पद्मश्री
इस किताब में हमें वर्मा जी के व्यक्तित्व का वह आयाम देखने को मिलता है जिसमें वे तिरछी निगाहों से अपने आसपास के मंजर को देखते हैं। एक जगह वे बहुत सही कहते हैं कि ‘संवेदनशील आदमी कभी सुखी नहीं रह सकता।’ और क्योंकि वे संवेदनशील हैं, जो कुछ चारों तरफ घटित हो रहा है उसे देखकर दुखी होते हैं। लेकिन व्यंग्य लेखन की यही तो विशेषता होती है कि उस दुख को भी कुछ ऐसे लहजे में हमारे सामने लाया जाता है कि हम भीतर से भले ही तिलमिलाएं, मुस्कुराए बगैर भी नहीं रह पाते हैं।
वर्मा जी के व्यंग्य लेखन की एक बड़ी विशेषता यह है कि वे सामान्य बात कहते-कहते व्यंग्य कर जाते हैं। बहुत बार वे किसी लतीफे से अपनी बात शुरू करते हैं और फिर बड़े सहज भाव से उसी लतीफे में से कोई सार्थक व्यंग्य निकाल लेते हैं। वर्मा जी के इन लेखों में अनेक विषय मौजूद हैं। उनका मन ऐसे विषयों और प्रसंगों में अधिक रमता है जहां शास्त्र चर्चा का अवसर निकल सके। इस दृष्टि से इस संग्रह का लेख ‘जिस क्रिया में जैसे होय तैसे’ अद्भुत है।
असल में वर्मा जी के लेखन की भी यही विशेषता है कि उसे बहुत सावधानी से पढ़ना होता है। उनकी एक और खासियत यह है कि वे उन प्रसंगों में भी हास्य-व्यंग्य ढूंढ़ लेते हैं जहां आप इस बात की कल्पना भी नहीं कर पाते हैं।
राग पद्मश्री : विजय वर्मा; बोधि प्रकाशन, सी-46, सुदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, 22 गोदाम, जयपुर; 250 रुपए।

