रमाकांत श्रीवास्तव की कहानियों को पढ़ना एक सुलझे हुए जानकार आत्मीय के साथ आसपास की घटनाओं, स्थितियों और व्यक्तियों को समझना है। रमाकांत श्रीवास्तव को जीवन आचरण के सौंदर्य की गहरी पहचान है। उनके पास संगीत और कलाओं के सौंदर्यबोध के संस्कार ही नहीं, वे घटनाओं और व्यक्तियों को देखने की अंतर्भेदी दृष्टि भी रखते हैं। वे घटना खंडों, चेष्टाओं को परस्पर मिला कर प्रवृत्तियों, चरित्रों का संधान करते हैं और उसे नाटकीयता में साक्षात कर सकते हैं। वे उन प्रगतिशील रचनाकारों में से नहीं हैं, जो सैद्धांतिक समीकरणों को लेखन में उतारने को इतने आतुर होते हैं कि रचनाएं इकहरी हो जाती हैं।

रमाकांत एक घटना-स्थिति को अगली घटना स्थिति से स्वाभाविक ढंग से सटाते हैं। इससे कहानी की गति स्वतंत्र होकर आगे बढ़ती है। रचना छोटे-छोटे विवरण, चित्रण खंडों (डिटेल्स) का पुंज होती है। इन विवरण चित्रण-खंडों में दरार नहीं होती। वे एक अखंड, समूची वस्तु लगते हैं। इसके लिए लाजिम है कि हर आगामी विवरण-चित्र या वक्तव्य पूर्ववर्ती का परिणाम लगे। रचना में गति स्थितियों के द्वंद्व से हो।

रमाकांत श्रीवास्तव के शिल्प में व्यंग्य-विनोद प्राय: सर्वत्र विद्यमान है। ऐसा व्यंग्य समझ का ही एक तेवर है। पाखंड, असामाजिकता, स्वार्थ, ओछापन बहुत प्रच्छन्न हैं। उदारता, सामाजिकता, देशभक्ति मानवता के छद्म ने उसे ढंक रखा है, लेकिन समझदार आदमी सब समझ लेता है। वह प्राय: कुछ कर नहीं सकता। पाखंड के प्रति उसका सारा तिरस्कार उसके विवरण-चित्रण के ढंग से आता है। यह लेखन का प्रतिष्ठान विरोध है।
थाने के नगाड़े : रमाकांत श्रीवास्तव; भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूश्नल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 170 रुपए।

रत्नकुमार सांभरिया की प्रतिनिधि कहानियां
रत्नकुमार सांभरिया की कहानियों के कथानक भिन्न हैं। एक ही पृष्ठभूमि में रची गई कहानियों के कथ्य में तो भिन्नता है ही, कहानीकार का विजन ऐसा लगता है जैसे आशा और उपेक्षा के अन्यान्य धरातलों को उकेरते हुए जनसंघर्ष और मुक्तिकामिता की प्रेरणा का भावबिंबन कराना है। भिन्न निम्न, उपेक्षित, वंचित सामाजिक-सांस्कृतिक स्थितियों को मानस पटल पर उकेरती कहानियां संभावनाओं के अनंत आकाश भेदती हैं। इनमें नवीन ऊर्जा से संपन्न रचाव है। विरासती वेदना को दरकिनार करती इन कहानियों में सामाजिक समरसता की अनुपम झांकी है। समरसता के तानेबाने से जातीय वैषम्यता की जकड़ दूर होती दिखाई दे रही है। वर्चस्व के समक्ष सामर्थ्य को रचने का प्रयास किया है। वर्चस्व का ओज रोज टूटता है और रोज के रोते हुओं की शक्ति आज के समाज को दिशा देती है। ये सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पटल पर अपनी कोमल अभिव्यक्ति में सामान्य व्यक्ति के स्वप्न और संघर्ष की रचना हैं। लोकतंत्र के संघर्ष की कथा हैं। यथार्थ और आदर्श के भिन्न नूतन मिलन है। पूर्व निर्धारित आदर्शों को तिलांजलि और नवीन आदर्शों को सामाजिक पटल पर लाकर यथार्थ का भिन्न बोध प्रदर्शित करती कथाएं हैं।

ये कहानियां कुरीतियों के साथ-साथ सामाजिक बुराइयों को भी उकेरने में पीछे नहीं हटती हैं। आधुनिकता के दबाव में नैतिकता के टूटते स्तर स्पष्ट होते हैं। कह सकते हैं नैतिकताओं के पुराने प्रतिमान अब जायज नहीं हैं। लेखक व्यक्ति जिजीविषा के भाव में खुद्दारी को खूब उकेरता है। खुद्दारी चरित्रों में कूट-कूट कर भरता है। गलत, अनैतिक और लोलुपता को लेखक दुत्कारता है।
रत्नकुमार सांभरिया की प्रतिनिधि कहानियां : चयन- लोकेश कुमार गुप्ता;श्रीसाहित्य प्रकाशन, डी-580, अशोक नगर, गली नंबर-4, निकट वजीराबाद रोड, शाहदरा, दिल्ली; 250 रुपए।

अव्यक्त हम
किसी कवि के लिए यह मजेदार बात होगी, अगर वह पुस्तकालय में जाए और अपनी किताबों के पन्ने पलटते हुए देखे कि पाठकों ने उन पर क्या लिखा है। कौन-सी कविताओं पर निशान बनाया है, किन पन्नों को मोड़ा है, किन पर नाम लिखा है? जब हरिमोहन जी का संग्रह पुस्तकालय में उलट रहा था तो देखा कि तमाम कविताओं पर ‘स्टार’ बने हुए हैं। किसी पर एक ‘स्टार’, किसी पर दो, किसी पर तीन ‘स्टार’ बने हुए हैं। लगा इसे किसी छात्र, किसी युवा ने पढ़ा होगा। इसके तमाम पन्ने मोड़े गए थे। जगह-जगह पंक्तियों को घेरा गया था। तब लगा कि कविता का घर अभी आबाद है। कवि और कविता की खुशी इसी आतिथ्य में तो है। लगा कि कविता का यह घर तब तक आबाद रहेगा जब तक हमारे अंदर भावना और स्मृतियों का गाढ़ा खून रहेगा। इसलिए कविताओं को प्रोफाइल मैनेजर की जरूरत नहीं पड़ती। वह सप्तपर्णी मटियल गंध की तरह है, जो आपको चुंबक की तरह खींचता है।

इस संग्रह में अधिकतर प्रेम कविताएं हैं। कविताएं छोटी हैं। इतनी सहज हैं कि आपको रोक लेती हैं। तमाम कविताएं याद हो जाती हैं। कुछ कविताएं पढ़ने में बहुत सहज हैं, पर उनमें अनुभवजन्य जीवन-दृष्टि है। इस हाहाकार में ये कविताएं बहुत धीरे, बहुत संकोच से बोलती हैं। जो लोग बड़बोली क्रांतिधर्मिता को ही कविता समझते हैं उन्हें समझना चाहिए कि यह काम माइक का है। कविता का काम तो मानवीय भावों का संस्कार करते हुए क्रांति की तरफ जाना है। अगर कविता का काम हथियार और बारूद बनाना है तो मानवीय भावों को बचाए रखना भी उसी का काम है। और इसके लिए हरिमोहन अपने समकाल में तो हैं ही, मूलत: वहीं हैं, पर वे स्मृति में भी लौटते हैं।
अव्यक्त हम : हरि मोहन; विश्व हिंदी साहित्य परिषद, एडी-94/डी, शालीमार बाग, दिल्ली; 200 रुपए।

नदी की उंगलियों के निशान
कथाकार कुसुम भट्ट के इस नए संग्रह में उनकी ग्यारह कहानी संकलित हैं। ये कहानियां मानवीय संवेदनाओं की कहानियां भर नहीं हैं, बल्कि नारी-मन का आख्यान हैं। एक ऐसा आख्यान जिसकी मौलिकता में प्राकृतिक सौंदर्य और उसकी निश्छलता को अपने भीतर पूरी तरह समेटे हुए है। अगर इन कहानियों के बारे में जरा खुल कर कहें, तो ये कस्बाई और अर्द्धशहरी स्त्री-मन के उस आख्यान का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिसने एक बनावटी नारी-विमर्श गढ़ लिया है। एकदम अछूते कथ्य, चमकते शिल्प और बहुआयामी भाषा की ठसक इन कहानियों की अपनी पहचान है। इस संग्रह की कई कहानियां पाठक की अंगुली पकड़, उसे रह-रह कर ऐसे भारतीय गांवों की ओर ले जाती हैं, जहां अपनत्व एक हद तक शोषण का रूप ले चुका है। बिना किसी नए प्रयोग का सहारा लिए कुसुम भट्ट ने अपना विश्वास पारंपरिक कथा शैली में बनाए रखा है। इन कहानियों को पढ़ते हुए बार-बार स्त्री, वह भी ग्रामीण स्त्री, की वह छवि नजर आती है, जिसमें वह अपने आप से संघर्ष करती है। लेखक के अवचेतन में कहीं न कहीं अपने मूल परिवेश का वह छीजता अपनापा और भरोसा साफ नजर आता है, जो आपसी विश्वास की धुरी होती है। कहना होगा कि ये विस्मृत और छूटे हुए अतीत की कहानियां नहीं हैं, बल्कि वर्तमान और आगामी अतीत की ऐसी आहटें हैं, जो पाठक के अंतर्मन को देर तक थपथपाती रहती हैं। पहाड़ी धूप की धोती में नदी के साफ पानी-सी ये कहानियां पाठक की अंगुली पकड़ उसके साथ ठिठक-ठिठक करक दूर तक चलती हैं।
नदी की उंगलियों के निशान : कुसुम भट्ट; अमन प्रकाशन, 104 ए/80 सी, रामबाग, कानपुर; 125 रुपए।