मॉरिशस के बहुचर्चित हिंदी कथाकार रामदेव धुरंधर विश्वभर में उसी तरह प्रशंसित हैं, जैसे अभिमन्यु अनत। सच कहा जाए तो अपनी प्रयोगधर्मिता और चेतनापरक रचनाशीलता के लिए उनके जैसा कथाकार अपनी एक विशेष पहचान रखता है। ‘ढलते सूरज की रोशनी’ उनकी ऐसी ही रचना है, जिसे एक नया उपन्यास प्रयोग कहा जा सकता है। इस उपन्यास में मुख्य चरित्र ही रचनाकार से बगावत कर उठता है। उसकी इस बगावत के साथ ही रचना का पलड़ा भी फिर उसी की ओर झुक जाता है। इस मर्जी को आकार देने में उसके भीतर के पुरुष की मस्ती अहम रोल अदा करती है।
वास्तव में यह चरित्र है एक आईना, जिसमें हम मॉरिशस के समकालीन समाज का बिंब देख सकते हैं। रामदेव धुरंधर की विशेषता यह है कि इस चरित्र विशेष के सहारे वह उस बड़े जाल का पर्दाफाश करते हैं, जो अपने निजी स्वार्थों के लिए पूरे एक देश को खोखला कर डालने से भी नहीं हिचकता। इस उपन्यास के कथारस के प्रवाह में संभ्रांत नजर आने वाले लोगों की असल छवि तो प्रस्तुत होती ही है, पाठकीय विवेक भी खूब जागृत होता है।
इस उपन्यास में कथा के अनेक मोड़ हैं, जिनमें एक संभ्रांत चरित्र अपनी ही हरकतों से अपनी ही नजर में गिर जाता है। उसकी हताशा ऐसे में उसे कर्णिका जैसे चरित्र से भी छोटा कर देती है। कर्णिका जो अपनी मर्जी से अपना जिस्म बेचकर अपना दुख भुलाने पर विवश है। राजनीतिक हथकंडे ही नहीं, अवैध व्यापार की मूल्यहीनता कथा का एक ऐसा संजाल बुनती है कि पाठक कथा के आकर्षण में आ फंसे। यहां जीवन की थीसिस भी है, एंटीथीसिस भी और सिंथेसिस भी। इस रचना-समय में यह उपन्यास एक उपलब्धि ही है, क्योंकि यहां कथा में भारत भी है और मॉरिशस भी।
ढलते सूरज की रोशनी : रामदेव धुरंधर; सामयिक बुक्स, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, एनएस मार्ग, नई दिल्ली; 695 रुपए।
स्वर्ग में पांच दिन
असगर वजाहत जाने-माने लेखक होने के साथ-साथ यायावर भी हैं, जो अपने को सामाजिक पर्यटक या सोशल टूरिस्ट कहते हैं। उनकी यायावरी के अनेक रंग हैं। वे यात्रा में केवल स्थानों को नहीं देखते, बल्कि वहां के लोगों को जानने और समझने की कोशिश करते हैं। वे विवरण इतने सजीव तरीके से देते हैं मानो पाठक उनके साथ स्वयं यायावरी कर रहा है। ‘स्वर्ग में पांच दिन’ यूरोप के सुंदरतम देश, हंगरी की यात्राओं की पुस्तक है। इस पुस्तक में लेखक हंगरी की सुंदर प्रकृति, जनजीवन और वहां के लोगों से इतने प्रभावित हुए कि वे इसे जन्नत या स्वर्ग की उपमा देते हैं। उन्होंने हंगरी की कई बार यात्राएं कीं और कुल मिलाकर वहां पांच वर्ष व्यतीत किए। हंगरी में बिताए प्रत्येक वर्ष को वे एक दिन के बराबर मानते हैं और इसलिए इस पुस्तक का शीर्षक ‘स्वर्ग में पांच दिन’ है, जो अपने ढंग की अनूठी पुस्तक है। इसमें इस जन्नत के कोरे चित्र ही नहीं बल्कि हंगरी का जीवन उन्होंने पन्नों पर उतारा है।
स्वर्ग में पांच दिन : असगर वजाहत; राजपाल एंड सन्ज, 1590 मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली; 395 रुपए।
नई जमीन नया आकाश
इस संग्रह में तेजेंद्र शर्मा की लंदन में बसने के बाद लिखी गई कहानियां संकलित हैं। संकलन में शामिल ‘अभिशप्त’ लंदन प्रवास के बाद लिखी गई उनकी पहली कहानी है। यह भारत से अच्छे जीवन की उम्मीद में लंदन जाकर बस गए रजनीकांत की कहानी है, जो वहां भी सुख नहीं पाता। बीए करने के बाद भारत में कथित छोटे काम वह नहीं करता, लेकिन वहां बोझा ढोने का काम करने में उसे कोई हिचक नहीं होती। अपने से बड़ी लड़की से विवाह करता है और धीरे-धीरे उसके द्वारा उपेक्षित होने लगता है। जल्द ही यह उपेक्षा और उदासी उसका जीवन बन जाती है। धन के आगे कैसे मानवीय संबंधों से लेकर खुद मनुष्य तक का अस्तित्व बौना होता जा रहा है, इस सामाजिक विसंगति को ‘कब्र का मुनाफा’ कहानी में बड़े अनूठे ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इस कहानी का जो तथ्यपरक ढंग से व्यंग्यात्मक अंत लेखक ने किया है, वह इसे हिंदी की श्रेष्ठ कहानियों में शुमार कर देता है। ‘कोख का किराया’, ‘ये क्या हो गया’, ‘पासपोर्ट का रंग’ उल्लेखनीय कहानियां हैं।
‘कोख का किराया’ सरोगेसी के मुद्दे पर व्यापक परिप्रेक्ष्य में बात करती है। ‘पासपोर्ट का रंग’ कहानी में मुख्य पात्र बाऊजी की पीड़ा यह है कि उन्हें लंदन में बसे बेटे के साथ रहने की मजबूरी में भारत की नागरिकता छोड़ उस ब्रिटेन की नागरिकता लेनी पड़ रही है, जिसके खिलाफ आजादी की लड़ाई में वे गोलियां खा चुके हैं। इस कहानी में उन बुजुर्ग भारतीयों के देशप्रेम और प्रवास की विवशता के बीच के द्वंद्व को तो चित्रित किया ही है, प्रवासी भारतीयों के प्रति भारत सरकार की ढुलमुल कार्यप्रणाली को सामने लाने में भी प्रभावी ढंग से सफल रहा है।
नई जमीन नया आकाश : तेजेंद्र शर्मा; यश पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, 1/10753, सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 450 रुपए।
