राजेंद्र चुघ के इस संग्रह में तेईस कविताएं और सात गजलें हैं। उनका रचना-संसार एकदम सीधा-सादा, कोई चामत्कारिक चकाचौंध नहीं, कोई पेचीदा बयानी नहीं और न ही कोई आग्रह-दुराग्रहों का कौतूहल से भरा हुआ मंच है। उनकी कविताएं-गजलें घोर वैयक्तिक होते हुए भी सामाजिक सरोकारों के खुले आसमान में प्रवेश करतीं अपनी उपस्थिति दर्शाती हैं और उनकी कहन से कहन तक सफर तय करतीं खुशबू की तरह फैल जाती हैं- पाठक के मन-मस्तिष्क को चीरती। ‘लाइव-वायर’, ‘फर्क’ तथा ‘तुम्हारे लिए’ जैसी कविताएं उद्धरण के रूप में देखी-पढ़ी जा सकती हैं। पर उनका फलक अर्थ की सीमा तोड़ते हुए बहुत आगे निकल जाता है, जो कवि की रचनात्मकता की खूबसूरती है, सच्ची और अच्छी कविता बनते हुए। राजेंद्र चुघ का कवि नितांत अपनी अनुभूतियों के महल सृजित करने वाला नहीं है। उनकी हर कविता अनुभवात्मक संवेदना की सेज पर से मूर्त्त रूप अख्तियार करती है। उनकी ज्यादातर कविताएं घर-परिवार की जमीन को व्याख्यायित करती हुई मानव-मन की तहों को खंगालती-सी लगती हैं। निश्चित ही यह संग्रह कविता पाठकों की पठनीय शर्तों पर खरा उतरेगा।
तनी हुई रस्सियां : राजेंद्र चुघ; आस्था प्रकाशन, लाडोवाली रोड, जालंधर; 260 रुपए।
दलित सशक्तिकरण
दलित सशक्तिकरण’ चार परस्पर संबंधित मुद्दों को संबोधित करती है। यह भारतीय समाज में बहिष्कृत और स्वदेशी समूहों के बहिष्करण संबंधी पृथक्करण की अवधारणा का निर्माण करती है। प्रस्तुत पुस्तक सामाजिक बहिष्करण की संकल्पना और अर्थ को सामान्य रूप में तथा जाति, अस्पृश्यता और नस्ल-आधारित बहिष्कार की अवधारणा और अर्थ को विशेष संदर्भ में प्रस्तुतीकरण के साथ ही मानव विकास के उपार्जन के क्रम में अंतर-सामाजिक समूह की असमानताओं को भी निरूपित करती है। तत्पश्चात इस पुस्तक में संसाधनों, रोजगार, शिक्षा और सामाजिक आवश्यकताओं तक न्यून पहुंच के संदर्भ में इन वंचित समूहों की उच्च अभावग्रस्तता से संबंधित कारकों का विश्लेषण किया गया है। अंतत: यह किताब आर्थिक, नागरिक और राजनीतिक क्षेत्रों में भेदभाव की भूमिका पर समूह की इन असमानताओं की जड़ता पर प्रकाश डालती है।
पाठकों की आसान और बेहतर समझ के लिए इन सभी मुद्दों को सरल भाषा का प्रयोग करके, प्रासंगिक और नवीन आंकड़ों, अलग-अलग जगहों के केस स्टडी और नागरिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित नवीन विशिष्टताओं की सहायता से समझाया गया है।
दलित सशक्तिकरण : संपादन- सुखदेव थोरात/ निधि सदाना सभरवाल; सेज पब्लिकेशंस, बी-1/1-1, मोहन कॉपरेटिव इंडस्ट्रियल एरिया, मथुरा रोड, नई दिल्ली; 645 रुपए।
भ्रष्टाचार – चर्चित कहानियां
भ्रष्टाचार भारत की सबसे बड़ी समस्या है। पिछले कुछ सालों से यह भारतीय राजनीति का एक सबसे बड़ा मुद्दा भी रहा है और इसकी वजह से बड़े राजनीतिक उथल-पुथल भी देखने को मिले। यह पुस्तक देश में भ्रष्टाचार के सभी आयामों को परिलक्षित करती है। भ्रष्टाचार के इकतालीस प्रकरणों के माध्यम से लेखक ने अधिकांश सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर किया है। भ्रष्टाचार से सभी त्रस्त हैं। आमतौर पर समाज के व्यापारों का संचालन रुक गया है। पुस्तक में आम जनता से संबंधित भ्रष्टाचार के मामलों को प्राथमिकता दी गई है। इसका समय एवं स्थान के अनुसार स्वरूप परिवर्तित होता रहता है। भारत में बदलते हुए परिवेश में रिश्वत देने वाला भी भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के अंतर्गत समान रूप से दोषी है। प्रस्तुत प्रकरणों के माध्यमों से सभी भ्रष्टाचार के प्रति जागरूक होंगे तथा उन्हें भ्रष्टाचार से लड़ने में सहायता प्राप्त होगी। यह पुस्तक सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों, भ्रष्टाचार निरोधक संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिज्ञों तथा आम आदमी के लिए समान रूप से उपयोगी है।
भ्रष्टाचार- चर्चित कहानियां : प्रमोद कुमार अग्रवाल; किताब महल पब्लिशर्स, 8, हरि सदन, ग्राउंड फ्लोर, 20 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 125 रुपए।
