वन के रंग-रेशों पर सजग दृष्टि रखने वाले नरेंद्र मोहन का नया कविता संग्रह है ‘जितना बचा है मेरा होना’। उनकी कविताओं में नाटकीय भंगिमा, सघन बिंब विधान और तरल कथ्य हैं। वे बड़ी सहजता से जीवन के बहुत मामूली अनुभवों को उठाते हैं और उन्हेें दार्शनिक उंचाई पर प्रतिष्ठित कर देते हैं। उनकी कविताओं की चिंता समकालीन चिंताओं से अलग नहीं है, पर नरेंद्र मोहन की कविताएं में बड़े फलक पर खुलती और प्रभाव छोड़ती हैं। छीजती मनुष्यता को पुन: रस सिंचित करना, उसे पुष्पित-पल्लवित होते देखने की आकांक्षा, प्रकृति के अतर्किक दोहन और फिर अनेक समस्याओं, वीभिषिकाओं से पार पाने की तड़प इन कविताओं में बार-बार नजर आती है। इनमें मरती हुई नदियों का शोकगीत है, तो शहरों की अझेल अमानवीयता, निस्संग नातेदारियां भी। राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के चलते मूल्यों के क्षरण से उपजी पीड़ा है, तो बेहतरी के सपने भी हैं।
नरेंद्र मोहन चूंकि दक्ष नाटककार हैं, उन्हें रंगभाषा और शैली की गहरी समझ है, इसलिए उनकी कविताओं में भी यह झलकती है। रंग-विधान में लिखी कविताएं कम लोगों के यहां हैं, पर नरेंद्र मोहन के यहां इसकी बहुतायत है। उनकी कविताओं में मंचीय आभा बार-बार प्रकट होती है। संवाद शैली में भी कई कविताएं आकार लेती हैं। वे अपनी बातों को दार्शनिक उंचाई देने के लिए गंभीर शब्दों का वार नहीं करते, बल्कि सामान्य जीवन में बरते जाने वाले शब्दों को बड़ी सावधानी से सही जगह रखते हैं और उससे गहरा प्रभाव पैदा हो जाता है। यही वजह है कि इन कविताओं के अर्थ कहीं दुबक कर नहीं बैठे होते, बल्कि कोमल पंछी के परों की तरह सहज ही खुलते और आकाश में उड़ान भरते चलते हैं। वे बार-बार मृत्यु के प्रश्न से टकराते हैं और जीवन को उसके सही अर्थों में देखने-परखने-समझने का प्रयास करते हैं। इस तरह इस संग्रह की कविताएं एक विस्तृत वितान रचती हैं।
जितना बचा है मेरा होना : नरेंद्र मोहन; बोधि प्रकाशन, सी-46, सुदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, 22 गोदाम, जयपुर; 250 रुपए।
कोणार्क
सूर्य हमारी प्रकृति की अनिवार्य उपस्थिति और अक्षय ऊर्जा का स्रोत है। इसे लेकर अनादिकाल से जिज्ञासाएं रही हैं, इसे देवता की तरह पूजा जाता रहा है। तमाम ग्रंथों में इससे जुड़ी कथाएं, प्रार्थनाएं हैं। देवता रूप में इसकी पूजा के निमित्त अनेक जगहों पर मंदिर भी बने। कोणार्क उनमें से एक था। कोणार्क शब्द कोण और अर्क के मेल से बना है। अर्क का अर्थ होता है सूर्य और कोण का अर्थ किसी किनारे से है। यह मंदिर भारत के ओड़ीशा प्रांत में जगन्नाथपुरी के समीप स्थित है। इस मंदिर को लेकर अनेक कथाएं और ऐतिहासिक साक्ष्य हैं। इस पुस्तक में कोणार्क को काव्य रूपक की तरह इस्तेमाल किया गया है। इसमें कोणार्क को लेकर सत्तानबे कविताएं हैं। इस तरह यह पुस्तक एक प्रबंध काव्य की तरह है। पर इसमें किसी कथा का वितान नहीं है, सभी स्वतंत्र कविताएं हैं और वे कोणार्क के सौंदर्य, स्थापत्य, मिथकीय और लोक आख्यानों को आधार बना कर बुनी गई हैं। इस पुस्तक में कोणार्क विषय-वस्तु है, तो कवि के अनुभव संसार को व्यक्त करने का एक माध्यम भी। इस तरह कवि के अनेक भाव इसमें उतरते चलते हैं। इसमें मनुष्य के अंतर्मन को पहचानने, समझने की सूक्ष्म दृष्टि स्पष्ट है।
कोणार्क : संजीव कुमार; इंडिया नेटबुक्स, सी-122, सेक्टर-19, नोएडा; 350 रुपए।
सियासत-ए-उत्तराखंड
त्तराखंड नया राज्य है। उत्तर प्रदेश से काट कर इसे स्वतंत्र राज्य इस मंशा से बनाया गया था कि इसे अपना वास्तविक हक मिल सकेगा, यहां विकास योजनाएं पहुंच सकेंगी और किसी तरह की उपेक्षा का शिकार नहीं होगा। इस तरह इस पहाड़ी राज्य के लोगों की जीवन-दशा में बदलाव आएगा। मगर इस राज्य के बनने के बाद से अब तक इस मकसद में कितनी कामयाबी मिली है, इसे लेकर प्रश्न उठते रहे हैं। खुद उत्तराखंड के लोग ही इस मकसद को प्रश्नांकित करते रहे हैं। यह पुस्तक इन्ही प्रश्नों को उठाती है। इसमें स्थानीय लोगों के उनके जीवन से जुड़े बुनियादी सवाल हैं।
उत्तराखंड की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्थितियों को केंद्र में रख कर अनेक लेख और पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं, पर यह पुस्तक इस अर्थ में उनसे भिन्न है कि इसमें वास्तविक स्थानीय लोगों की पीड़ाएं, उनकी भावनाएं और विचार दर्ज हैं। लेखक ने भूमिका में स्वीकार भी किया है कि ‘इस पुस्तक के सभी पात्र अपने हैं, असली हैं, उनके नाम भी असली हैं, उनसे अपनत्व का गिला, कृतज्ञता भर है यह पुस्तक। अपना दुख-दर्द सबसे बड़ा होता है, इसलिए लिख क्या रहा हूं, अपनी पीड़ा, अपना दर्द, अपना घाव लिख रहा हूं।’
इस तरह यह किताब एक तरह से पूरे पहाड़ का दर्द है। इसमें पहाड़ का सियासी परिदृश्य है, तो जीवन के तमाम पक्षों की हलचलें भी। इस तरह यह वर्तमान उत्तराखंड को नजदीक से और वास्तविक रूप में देखने अवसर देती है।
सियासत-ए-उत्तराखंड : प्रभात कुमार उप्रेती; समय साक्ष्य, फालतू लाइन, देहरादून; 350 रुपए।
चाहती क्या है लड़की
स संग्रह में निर्मला डोसी की कुल बाईस कहानियां संकलित हैं, जो उन्होंने असम प्रवास के दौरान लिखी थीं। यह समय 1985-1990 के बीच का है। इसलिए इस समय को इन कहानियों में धड़कता हुआ सुना जा सकता है। जैसा कि किताब के नाम से ही ध्वनित हो जाता है, इसमें संकलित कहानियों के केंद्र में स्त्री जीवन है। स्त्री के जीवन में घटित होने वाली घटनाएं और जिन स्थितियों से होकर उसे गुजरना पड़ता है, वे सब इनमें रूपायित होती चलती हैं।
पिछले कुछ दशक से स्त्री विमर्श पर जोर है। उसमें स्त्री अधिकारों, उसकी आकांक्षाओं, उसके सपनों, उसकी आजादी के प्रश्न बहुत गाढ़े होकर रेखांकित हुए हैं। इस तरह स्त्री लेखन पर उन विमर्शों का बहुत गहरा असर पड़ा है और बहुत-सी कहानियां एक सैद्धांतिकी के तहत बुनी जाने लगी हैं। मगर निर्मला डोसी का कहानियों में स्त्री विमर्श उस तरह मुखर नहीं है। इसकी घटनाएं सहज, स्वाभाविक रूप से घटित होती और पात्रों के जरिए आगे बढ़ती जाती हैं। इस तरह वे जीवन की स्वाभाविक घटनाएं बन उठती हैं। कहानियों की भाषा उनके परिवेश के अनुसार बनती चलती है। असमी, बांग्ला, राजस्तानी आदि इसमें जगह-जगह गुंथी है। इससे कहानियों का प्रभाव बढ़ता ही है।
चाहती क्या है लड़की : निर्मला डोसी; अमन प्रकाशन, 104 ए/ 80 सी रामबाग, कानपुर; 160 रुपए।

