ठाकुर प्रसाद सिंह की इस कृति में संग्रहित निबंधों की छटा-खुशबू अपनी अलग धज लिए है। हृदयग्राही हंसमुख भाषा, स्थानीय रंजकता, व्यंग्य की मार्मिकता, मिथक और इतिहास की गहरी समझ तथा सांस्कृतिक भाव-संपन्नता से ये लेख समृद्ध हैं। साहित्य-संस्कृति और राजनीति से जुड़े समसामयिक मुद्दों और घटनाओं पर लिखे गए ये आलेख लेखक की सामाजिक संलग्नता और बेचैनी को द्योतित करते हैं। सजावटी और निरर्थक लेखन से कोसों दूर रहने वाले तथा अपनी ईमानदारी एवं सांस्कृतिक सक्रियता के लिए ख्यात श्री सिंह अपने समय के बहुत जरूरी सवालों से यहां मुठभेड़ करते दिखते हैं। धर्म, वाद और पार्टी निरपेक्ष उनकी दृष्टि सत्यानुसंधान की अपनी कोशिश में तात्कालिकता को लांघती है, राजनीति से लेकर धार्मिक-साहित्यिक सामंतों-महंतों का मुलम्मा उतारने से हिचकती नहीं, अपने मनीषियों के दाय, शिक्षा, सांस्कृतिक परंपरा को भी भूलती नहीं।

इनमें पत्रकारीय पैनापन है सनसनी नहीं, साहित्यिक अंतर्दृष्टि है सतहीपन नहीं। बनारस-लखनऊ-इलाहाबाद का परिपार्श्व, उनकी छोटी-बड़ी साहित्यिक-राजनीतिक शख्सियतें और अकादमिक-सांस्कृतिक संस्थाएं- बहुत कुछ विवेचन के घेरे में है भारतेंदु-प्रेमचंद, कबीर-तुलसी और गांधी की अंतर्दृष्टि के साथ, गंगा और हिंदी की संवेदना के साथ।
हम अपनी परंपरा नहीं छोड़ेंगे : ठाकुर प्रसाद सिंह; प्रतिश्रुति प्रकाशन, 7 ए, बेंटिक स्ट्रीट, कोलकाता; 180 रुपए।

जन्म से ही जीवित है पृथ्वी
इस संग्रह का कवि कलाओं की समानधर्मिता का नहीं, कलाओं के पारस्परिक रूपांतरण का कवि है। यही नहीं, वह कलाओं के पारस्परिक रूपांतरण को कविता का विषय बनाते हुए कलाओं के आंतरिक जगत तक जा पहुंचता है। कलाओं का यह पारस्परिक रूपांतरण कवि की कल्पना भर नहीं है। दरअसल यह कलाओं के संसार की निजी वास्तविकता है। इसी में कलाओं का अध्यात्म भी खुलता है। प्रेमशंकर शुक्ल कला के इस अध्यात्म के कवि हैंं। कला के अध्यात्मजगत में वस्तुएं अपना अंतर खोलती हैं, जड़ चेतन हो उठता है, चेतन जड़ बन जाता है। ‘जन्म से ही जीवित है पृथ्वी’ का कवि कहता है कि श्रवणकुमार को तीर लगता है, और मुर्च्छित होता है गायक का इकतारा; गायक इकतारे के तार को छेड़ रहा है, तार से होने की हिचकी उठती है। इन कविताओं में कवि कला की सृष्टि और उसके अस्वाद दोनों की रमणीय व्याख्या करते हैं।

आज के समय में जब कविता और सारी कलाएं लगातार हाशिये पर पटकी जा रही हों, कलाओं के संसार को कला के द्वारा ही फिर से पहचानने का यह उपक्रम उन्हें हमारे समय और समाज से सार्थक रूप में जोड़ने की एक पहल कहा जा सकता है। इन कविताओं को पढ़ कर हम अनुभव करते हैं कि कलाएं हमारे लिए क्या कर सकती हैं। वास्तव में यह कविता संग्रह कलाओं के विस्मयलोक का चकित कर देने वाला आख्यान है। वह हमें उस अनोखे संसार में ले जाता है जिसमें हम अपने खोये हुए मनुष्य को फिर से पा सकते हैं।
जन्म से ही जीवित है पृथ्वी : प्रेमशंकर शुक्ल; सूर्य प्रकाशन मंदिर, नेहरू मार्ग (दाऊजी रोड), बीकानेर; 500 रुपए।

अच्छा तो तुम यहां हो
राजेंद्र करीने के कथाकार हैं। वे कहानियों का ‘कंटेंट’ इर्द-गिर्द घट रही घटनाओं में तलाशते हैं। लोक के वृत्त में रहते हुए चीजों का संधान करने की कला उनके पास है और उनका यह हुनर उनकी कहानियों में बखूबी झलकता है। चाहे ‘अच्छा तो तुम यहां हो’ के स्त्री-पुरुष हों या ‘जयहिंद’ के कलेक्टर या कमांडर या ‘पाइपर माउस’ का नायक चूहा, हमें बेहद अपने लगते हैं, हमारे अपने बीच के परिचित और जाने-पहचाने।

राजेंद्र घटनाओं और संवादों की लटों से कहानी को बहुत जतन से गूंथते हैं। उनकी भाषा उनका साथ देती है। कहीं लड़खड़ाते नहीं और न ही हड़बड़ी में भागते दीखते हैं। सधी हुई चाल। तनाव और लगाव दोनों को बहुत सलीके से व्यक्त करते हैं। वे अपनी ओर से नहीं बोलते, बल्कि वाकये और किरदार बोलते हैं। उनके पात्र पाठक को अपने साथ देर और दूर तलक ले चलने की कुव्वत रखते हैं। वे श्ब्दों को विचारों की मद्धिम अंच में पकाते हैं। रिश्तों की सांद्रता को चीन्हते हैं और कलम से रिश्तों की देह में धंसी किरचों को बीनते हैं। उनकी कथायात्रा हताशा, नैराश्य, अवसाद अथवा पलायन के साथ समाप्त नहीं होती, वह साहसपूर्वक आगे की यात्रा की भूमिका रचती है। इन लंबी कहानियों में वे कहीं भी शिथिलता या स्फीति के शिकार नहीं होते। आज के समय की ये कहानियां समकालीन कथा जगत को समृद्ध करती हैं।
अच्छा तो तुम यहां हो : राजेंद्र चंद्रकांत राय; भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 220 रुपए।

साहित्य मीडिया संवाद
हर साहित्यकार में एक पत्रकार रहता है। इसलिए कई साहित्यकार और पत्रकार दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से सन्नद्ध होते हैं जब वह साहित्यकार होता है तो ‘वस्तु सत्य’ को उलांघ कर सर्जक हो जाता है। यों दोनों का सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक यथार्थ एक ही होता है। दोनों की परिस्थितियां और परिदृश्य भी समान होते हैं, सरोकार भी लगभग एक से होते हैं। अंतर यहां आता है कि साहित्यकार भी लेखन-प्रक्रिया दोहरी होती है। पहले बाहर से भीतर को आए यथार्थ को अपने भीतर संजो कर उससे अलग होना, दूरी बनाकर भीतर से बाहर के सच पर आना। अर्थात दिए गए यथार्थ से साक्षात, उसका संमजन, फिर उस सृजनात्मक अनुभव का सृजन। लेकिन पत्रकार सिर्फ बाहर के यथार्थ में ही जूझता है। उसका ‘वस्तु सत्य’ ही प्रमुख होता है तो भी उसकी ‘संवेदना’ और ‘सृजनात्मकता’ उसकी पत्रकारिता को अधिक मार्मिक और संवेदी भी बना देती है।

साहित्यकार अपने यथार्थ को सामाजिक, राजनीतिकस सांस्कृतिक परिदृश्य में पात्रों, स्थितियों और किसी घटना या कथ्य में गढ़ता है। उनके नीचे होकर भी उनसे अलग। पत्रकार की यात्रा एकतरफा होती है। दिए गए यथार्थ से मुठभेड़। जो जैसा है, वही सत्य है। उसी का उद्घाटन उसका लक्ष्य है। इस पुस्तक में संकलित लेख, साहित्य और पत्रकारिता के बीच संचरण और संवाद है।
साहित्य मीडिया संवाद : कमल कुमार; यश पब्लिकेशंस, 1/10753 सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा, नई दिल्ली; 395 रुपए।