इस किताब के माध्यम से यूआर अनंतमूर्ति के समग्र साहित्य का गहरा विवेचन-विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। हिंदी आलोचना को इस तरह की आलोचना की किताबें समृद्ध ही नहीं करेंगी, अपितु उसे एक व्यापक परिप्रेक्ष्य देकर भारतीय आलोचना के अनुशासन में भी बदलने में भी मदद करेंगी। यहां हम हिंदी का अन्य भारतीय भाषाओं के साथ सीधा संवाद होता देखते हैं। एक अखिल भारतीय रचनाशीलता इस किताब के जरिए पूरी दुनिया के बड़े विमर्शों के साथ सीधा संवाद करती हुई भी दिखाई देगी। यहां हम अनंतमूर्ति की मार्फत मनुष्य को मनुष्य बनाने वाली सामर्थ्य की पहचान से युक्त होता हुआ पाते हैं। यहां हम एक तरफ अस्तित्ववाद को एक भारतीय रूप प्रदान करने की जरूरत तक आ रहे होते हैं, तो दूसरी तरफ अपनी जड़ परंपराओं की तीखी शल्य क्रिया होती हुई भी देख पाते हैं। सदियों से चले आ रहे संस्कारों द्वारा नियंत्रित चेतना को अपने समय के अनुकूल बनाने के लिए मुक्त करने वाली यह रचनाशीलता किसी भी पाठक के भीतर अपने मनुष्य होने के संबंध में आस्था को जगाने वाली साबित हो सकती है। इस तरह की कथा आलोचना की किताबें हमें भारत के समग्र कथा परिदृश्य को जानने-समझने का मौका देती हैं।
यूआर अनंतमूर्ति- प्रतिरोध का विकल्प : अंकित नरवाल; आधार प्रकाशन, एससीएफ 267, सेक्टर-16, पंचकूला; 495 रुपए।
रक्तबीज आदमी है
मोहन सपरा की बीज कविताएं अत्यंत मार्मिक, सटीक एवं गहन संवेदना से उपजी हैं: ‘यह वक्त कैसा है/ हथेलियां बैसाखियों पर/ और मनुष्य एक लंबी यात्रा पर निकल पड़ा है।’ यह आज के मनुष्य की समर गाथा है- बैसाखियों पर चलते हुए अनवरत संघर्ष में लिप्त। यह संलग्नता कवि को कई कविताओं में ऐसे प्रयोगों से रूबरू कराती हैं, जो इधर विरल ही हैं। ये कविताएं पाठकों को हतप्रभ करती हैं। इसका तात्पर्य यह नहीं कि ये जादुई करिश्मों के साथ उपस्थित होती हैं। आज जब कविताएं दुनिया के हाशिये पर चली गई हैं, मोहन सपरा की कविताएं पाठकीय निगाह, दिमाग और विचारों में आकर बैठ गई हैं। इसलिए भी कि इनका अपनी रचना तकनीक, रचना कौशल है। ये वक्त को ज्यादा खुली आंखों से देखते हैं और जो कुछ भी देखते हैं, उसका खुला बयान भी करते हैं। कारण, इनकी कविताएं पीड़ित और उपेक्षित लोगों के जीवन को मार्मिक ढंग से पेश करती हैं। कवि अकृत्रिम रूप से कविताएं गढ़ते नहीं हैं, बल्कि समय और परिस्थितियों का दबाव ही ऐसा होता है जो स्वयं अपनी भाषा तथा शब्द और कविता को अपने वैचारिक सांचों, भाषा शिल्प के साथ गढ़ या मोल्ड कर लेता है। ये बीज कविताएं गागर में सागर भरती हुई काव्यनिधि से सराबोर कविताएं हैं।
रक्तबीज आदमी है : मोहन सपरा; आस्था प्रकाशन, लाडोवाली रोड, जालंधर; 160 रुपए।
श्रीलाल शुक्ल : व्यंग्य के विविध आयाम
श्रीलाल शुक्ल में व्यंग्यात्मकता धड़कन की तरह मौजूद है। उनकी बौद्धिक सघनता, वैचारिक ईमानदारी, संवेदनात्मक गहनता और प्रतिरोध की बेधक-मारक क्षमता उनके उपन्यासों-कहानियों एवं व्यंग्य निबंधों में सहज ही दिखाई देती है। अर्चना दुबे ने उनके समग्र साहित्य को खंगालते हुए उसमें व्यंग्य के विविध आयामों को बड़े ही श्रमपूर्वक विवेचित किया है। प्रस्तुत कृति में उनका यही प्रयास रहा है कि उनका सम्यक विवेचन करते हुए उनकी व्यंग्य दृष्टि को मूल्यांकित किया जाए। इस व्यंग्य-लेखन की परंपरा में शुक्ल जी के अवदान का सही मूल्यांकन करते हुए उन्होंने बदलती सामाजिक-पारिवारिक स्थितियों, मूल्यों के विघटन, नारी जीवन की विसंगतियां, पूंजी और अपराध जगत के संबंधों आदि पर शुक्ल जी की धारणाओं का बेबाकी से विवेचन किया है। राजनीतिक, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, अफसरशाही तथा सत्ता की राजनीति में दिन-प्रतिदिन हो रहे अवमूल्यन के कारण आज का जीवन बहुत अधिक प्रभावित हुआ है। अर्चना दुबे ने इन स्थितियों के भी शुक्ल जी के साहित्य के आधार पर बड़ी कुशलता से विवेचित किया है।
श्रीलाल शुक्ल- व्यंग्य के विविध आयाम : अर्चना दुबे; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 695 रुपए।
