यह उपन्यास आंदोलन और स्त्री के बिकने के बारे में है। झारखंड की राजनीतिक-सामाजिक पृष्ठभूमि में जंगल और जमीन के सरोकारों को रेखांकित करते हुए अल्पना मिश्र यहां उन स्त्रियों की पीड़ा का बखान कर रही हैं, जिन्हें हरियाणा जैसे संपन्न इलाकों में, जहां पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों की संख्या बहुत कम हो गई है, बेच दिया जाता है। उनका भी इस्तेमाल यहां पुरुषों की उत्पत्ति के लिए ही किया जाता है। गर्भ में लड़की हो तो उससे पैदा होने से पहले ही निजात पा ली जाती है। अपने गर्भ पर स्त्री का कोई अधिकार नहीं, ठीक वैसे ही जैसे आदिवासियों को उनके उन जंगलों की संपदा पर कोई अधिकार नहीं, जिन्हें वे जाने कितनी पीढ़ियों से अपना घर मानते आए हैं। स्त्री-गर्भ यहां पृथ्वी के भीतर छिपी खनिज संपदा के दोहन का रूपक बन कर आता है। उपन्यास में उस राजनीति को भी बेनकाब किया गया है जो आदिवासी-अधिकारों की पैरवी के बहाने अपनी जड़ें फैलाने पर लगी है।
यह पूर्णतया राजनीतिक-सामाजिक उपन्यास है, और वह भी एक महिला कथाकार की संवेदनशील कलम से उतरा हुआ। उपन्यास में उस परिवेश को भी पकड़ने की कोशिश की गई है, जहां दूसरे पात्र अपने जीने का संघर्ष कर रहे हैं। वहां की शब्दावली, भाषा-भंगिमा और लोकगीतों के प्रयोग से कथा का ताना-बाना विशेष प्रामाणिकता हासिल कर लेता है।
अस्थि फूल : अल्पना मिश्र; राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 250 रुपए।
हमारे गांव में हमारा क्या है
दलित कवि ओमप्रकाश वाल्मीकि की प्रसिद्ध कविता है ‘ठाकुर का कुआं’। इस कविता के अंत में वह सवाल करते हैं कि सब कुछ तो दूसरों का ही है, फिर अपना क्या? सूरजपाल चौहान भी अपनी कविता ‘मेरा गांव’ में यही कहते हैं कि ‘मेरा गांव कैसा गांव/ ना कहीं ठौर ना कहीं ठांव।’ गांव के बारे में सभी दलित कवियों की अनुभूति लगभग यही है। यही सवाल युवा कवि अमित धर्मसिंह अपने संग्रह ‘हमारे गांव में हमारा क्या है’ की कविताओं में उठाते हैं।
इन कविताओं में अभिव्यक्त गांव, अपनी भाषा के साथ है। न बिंबों और प्रतीकों की चकाचौंध है, न शब्दों का पांडित्य या चमत्कार है। न कल्पनाओं की उड़ान भरती हैं और न आदर्श का यूटोपिया की दुनिया का निर्माण करती हैं। सभी प्रकार की जटिलताओं, दुर्वहताओं से मुक्त ये कविताएं किसी खांचे में बंधी हुई नहीं हैं। कविता की असली उसकी संप्रेषणीयता होती है। इस दृष्टि से ये कविताएं अत्यंत सफल और विशिष्टता लिए हुए हैं। सहज, सरल और जन-सामान्य की समझ में आने वाली भाषा में लिखी गई ये कविताएं पाठक से सीधा संवाद करती हैं। ग्रामीण जीवन में प्रयुक्त शब्दावली और मुहावरे तथा पात्रों द्वारा बोले गए शब्द या संवादों में खड़ी बोली का प्रयोग भाषा को जीवंत बनाता है। पूरी तरह जीवन से जुड़ी इन कविताओं में सर्वत्र जीवन है, उसका संघर्ष है। अमित धर्मसिंह की ये कविताएं जाति की कैद में बंद मनुष्यता की मुक्ति का आह्वान है।
हमारे गांव में हमारा क्या है : अमित धर्मसिंह; बोधि प्रकाशन, सी-46, सुदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, 22 गोदाम, जयपुर; 175 रुपए।
अभिव्यक्तियां
प्रस्तुत संग्रह की लगभग सारी कविताएं प्रकृति मूलक हैं। विविध प्रकार के पेड़-पौधे, मौसम, पक्षी आदि विविध भावों और विचारों के आलंबन के रूप में चित्रित किए गए हैं। इन कविताओं में दृश्यों और अनुभवों की बड़ी ताजगी है। प्रकृति के बिंबों की छवि सहज रूप में बहती हुई चलती रहती है और अंत में कोई मार्मिक गति, विचार या भाव पूरी कविता की दृश्यता को अपने से स्पंदित कर देता है। अनेक पेड़ हैं। सबका अपना-अपना सौंदर्य है, स्वभाव है, नियति है। सभी अपनी-अपनी तरह से जीवन का सत्य उजागर करते हैं और मनुष्य के साथ भावात्मक और व्यावहारिक लगाव व्यक्त करते हैं। सभी अपने-अपने तरीके से अपने को सुंदर ढंग से अभिव्यक्त करती हैं। ‘बोधि-वृक्ष’ कविता में पीपल के पेड़ की अभिव्यक्ति देखिए- पीपल था/ मेरा नाम बरसों से/ अब भी है/ मेरी छांव में बैठ/ सिद्धार्थ ‘बुद्ध’ हो गए/ तब से मैं बोधि वृक्ष भी/ कहलाने लगा…/ लाल धागों से बांधती हैं सुहागने मुझे/ मांगती हैं/ अपने सुहाग की सुरक्षा/ तब मेरे भीतर/ भर जाता है देवत्व/ मैं ‘शिव’ बन जाता हूं। इसी तरह पक्षियों में ‘घोंसले की गंध’ कविता है- घोंसले के/ तंग अंधेरे कोष्ठ में/ आवरण को तोड़/ अंडे से निकलते हुए/ उस क्षण/ जिसने मुझे देखा है/ वह मेरी मां है…/ घोंसले में मेरे हिस्से में/ न्यूनतम स्थान था/ जहां करवट लेना भी/ सरल नहीं था।
अभिव्यक्तियां : वासंती रामचंद्रन; सी 2-16-सह्याद्रि, प्लॉट-5, सेक्टर-12, द्वारका, नई दिल्ली; 350 रुपए।
