राजेश झरपुरे
मोला गुस्से में तमतमाई मेरे नजदीक आई और लगभग लताड़ने वाले अंदाज में बोली ‘…पिताजी ने आज फिर पानी नहीं डाला। जाइए! आप जाकर साफ कीजिए। थोड़ी फिनाइल की शीशी भी उड़ेल देना।’ मैंने उसके चेहरे पर नजर डाली। क्षण भर उसे देखता रहा। उसे इस तरह गुस्सा कम ही आता था। गुस्से में उसकी आखें लाल हो उठती और आखों की महीन नसों का गुच्छा अलग दिखने लगता। क्रोधाग्नि की लपटों में झुलसने से पहले मैंने अखबार का स्थानीय पेज मेज पर रखा और चुपचाप उठ कर पीछे बाथरूम की तरफ चल पड़ा। दफ्तर के लिए तैयार होने में मेरे पास पूरे डेढ़ घंटे थे। इस दौरान मुझे स्नान कर एक अगरबत्ती वाली पूजा करनी थी। स्नान के तुरंत बाद और अगरबत्ती लगाने के ठीक पहले मैं चालीसा पाठ और बाद में कुछ मंत्रों का उच्चारण करता। यह मैं बचपन से नित्य करता आ रहा हूं। किसी भी स्थिति में, कहीं भी मुझे पाठ करने में परेशानी नहीं हुई। चालीसा और मंत्रों के अक्षरों की आवृति और मर्म मेरे दिमाग में रच-बस चुके थे। समयानुसार मैं इसका निर्वहन करता। ज्यादा समय होने पर अक्षरों की अंगुली पकड़ कर आगे बढ़ता। अन्य किसी कारण से विलंब होने पर उन्हें गुब्बारे की तरह हवा में उड़ा कर… पर पाठ अवश्य करता।
सुबह से घर में विवाद की स्थिति बने, ठीक नहीं… जैसा सोच कर मैं उठ खड़ा हुआ था। क्रोध ही एक ऐसा भाव है, जिसका तुरंत सम्मान कर दिया जाए तो झुक जाता है। उसके प्रकट होने पर तुरंत अपमान कर दिया जाए, तो भड़क उठता है। भड़काना मेरा स्वभाव नहीं। एक छोटी-सी भूल दिन भर घर और आॅफिस में तनाव का कारण बन जाए यह मैं नहीं चाहता था। मैं बीच के कमरे में बैठ कर अखबार पढ़ रहा था। पिताजी शौच क्रिया से निवृत्त होकर अपने कमरे की तरफ जा रहे थे। मैंने ही उन्हें अखबार का मुख्य पृष्ठ और प्रादेशिक समाचार के पेज दिया था। उनके चेहरे पर अद्भुत शांति और संतोष था। वे पिछले कई दिनों से जठराग्नि के कमजोर हो जाने को लेकर परेशान थे। दिन में सात-आठ बार शौच क्रिया के लिए जाते और उद्विग्न होकर लौट आते। उनके चेहरे पर एक अस्वस्थ भाव होता। मैं उनकी परेशानी को समझ रहा था। मैंने उनसे कहा भी था कि वे मेरे साथ डॉक्टर के पास चलें। ‘ठीक हो जाएगा…’ कह कर वे टालते रहे। मां जब भी उनके पास होती, वे एक ही शिकायत करते… पेट ठीक नहीं है। फूला-फूला लगता है। थकान बहुत लगती है। खाने की इच्छा तो होती है, पर हाजमा नहीं होता।’
मां ठिठोली करती ‘…यह तो कल का पाठ सुना रहे हो। कोई आज का पाठ सुनाओ।’ फिर उन्हें चिढ़ाने वाले अंदाज में कहती ‘… अब क्या बुढ़ापे में जवान जैसा लगेगा। बुढ़ापा नाम ही थकान और बीमारी का है। थोड़ा परहेज करो। लालच बुरी बला है। ज्यादा ललचाओ मत। पानी ज्यादा पीयो। सब ठीक हो जाएगा।’ कहते हुए उनके पोपले मुंह से हंसी का फव्वारा फूट पड़ता। पहले से परेशान पिता का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ जाता। पिता का गुस्सा फूट पड़े उसके पहले मां वहां से झटपट हट जाती। रसोई में बहू के साथ काम में हाथ बटाने लगती, जहां पिता कभी नहीं जाते। जब उनका गुस्सा शांत हो जाता तो वे घर में जो भी खट्टा-मीठा नाश्ता रखा होता, एक कटोरी में लेकर पहुंच जातीं।
आहार, अल्पाहार का उनके पास कोई निश्चित समय नहीं था। मां के हाथों से दिन में जितनी बार मिल जाए, मना नहीं करते। उन्हें खाता देख मां तृप्त होतीं। इस तरह और उन पलों में हमने पिता को एक लालची बच्चे के रूप में देखा और मां को उनकी मां के रूप में। हम सोचते, क्या मां सदा से मां रही हैं..? पिता के हठ करने और उनके चिड़चिड़े व्यवहार को वे बड़े ही लाड़-दुलार से शांत करा देतीं, ठीक वैसे ही जब हम बचपन में रूठते, चिल्लाते और रोते थे। मिठाई, आईसक्रीम, कस्टर्ड और मीठे फलों में सबके हिस्से निश्चित होते। पिता के भी। उनके हिस्से में किसी की नजर नहीं होती, पर मां के हिस्से में उनकी नजर अवश्य होती। मां स्वत: अपना आधा हिस्सा उन्हें और बाकी अपने नाती-पोतों में बांट देतीं। उनके हिस्से में एकाध कौर आता। बावजूद इसके सबसे अधिक तृप्त और खुश वही नजर आती।
पिता अपने समय से ही अच्छे खाने के शौकीन रहे। मां को वह अन्नपूर्णा का अवतार मानते। पिता के विवाह के बाद ही घर में आर्थिक संपन्नता आई थी। पिता का बचपन विपन्नता और जवानी संघर्ष में गुजरी। प्राथमिक शिक्षा के बाद उन्होंने स्कूल का मुंह नहीं देखा। दादा के साथ दिहाड़ी में जाने लगे। हालांकि उन्हें दादा से कम दिहाड़ी मिलती थी, लेकिन उनकी मेहनत और लगन को देख कर जल्द ही दादा के जितनी हो गई थी। उस वक्त उनके चेहरे पर मूंछ की रेखा भी सही ढंग से नहीं बनी थी। कमाने वाले चार हाथ हुए तो घर के चूल्हे की लपटें खिलखिला उठीं। दादी के सपनों में एक सपना और जुड़ गया। दूर के रिश्तेदार ने एक संपन्न घराने में बात चलाई। बात बन गई। उन्होंने पिता के घर की गरीबी नहीं देखी, गरीबी से जूझने का हौसला देखा। एक उज्ज्वल जीवन का भविष्य देखा और विवाह संपन्न हो गया।पिता के अतीत में हमें अंगुली पकड़ कर ले जाती मां खुश होती और गौरान्वित भी। अगर उन्हें खाने, खिलाने का शौक था तो मां को स्वादिष्ट और रुचिकर भोजन बनाने का। बड़ी उम्र में भी उनकी भूख यथावत रही, पर हाजमा कमजोर हो गया। रात में किसी आयुर्वेदिक चूर्ण के प्रभावशाली हो जाने पर सुबह शौचक्रिया की सफलता में वे शौचालय में पानी डालना भूल गए हों… जैसा अनुमान मैं उनके चेहरे पर आई प्रसन्नता और पत्नी को आए गुस्से से लगा चुका था।
क्रोधाग्नि की लपटें जितनी तेजी से ऊपर उठतीं, अवलंबन न मिलने पर उतनी ही तेजी से नीचे भी गिर पड़तीं। रमोला, जो थोड़ी देर पहले गुस्से से तमतमाई हुई थी, मुझे टॉयलेट साफ करते देख ग्लानि से भर उठी। यह उसका काम था। घर में सबके जिम्मे कुछ न कुछ काम बंटे थे। मेरे हिस्से बाजार-हाट आया। उसके हिस्से घर द्वार। बच्चों के पास पढ़ाई के अलावा और कोई काम नहीं था। सप्ताह में दो दिन वह घर और घर के आसपास तक सफाई करती। उसे शुरू से ही स्वच्छ रहना पसंद था। आसपास के घिन्नटों के घर वह झांकती तक नहीं थी। हमारे घर में मकड़ी कभी जाला नहीं बना पाई। मोहल्ले के चूहे हमारे घर के आसपास से निकल जाते, पर कभी हमारे घर की तरफ मुड़ने का साहस नहीं करते। मक्खी मच्छरों का घर से दूर का भी रिश्ता नहीं था। उन्हें घर में आसन प्राप्त नहीं था। कभी-कभार कोई दिख भी गया, तो गंदगी फैलाने वाले सदस्य पर वह बिफर पड़ती। सभी जानते थे कि रमोला साफ-सफाई के मामले में किसी तरह का समझौता नहीं करती। कल ही उसने सफाई की थी। टॉयलेट भी चमकाया। दिन भर की थकी-हारी वह रात को चौका-बासन कर मेरी बगल में लस्त-पस्त पड़ी लंबे-लंबे खर्रांटे ले रही थी। नींद पहले मेरी लगती, उसके बाद उसकी, पर कल वह जल्दी सो गई थी। हालांकि वह कब सोती, कब जाग जाती, मुझे पता नहीं चलता। कल थक कर चूर हो चुकी थी, इसीलिए मुझसे पहले ही नींद के आगोश में चल दी। इस परिस्थिति में उसका गुस्सा जायज था। उसे इस बात का मलाल रहा हो कि इतना मरने-खपने के बाद भी कोई स्वच्छता के महत्त्व को नहीं समझता…! पिता के शौचालय में पानी न डालने पर उसका क्षुब्ध हो जाना स्वाभाविक था।
सफाई पूरी कर मैं नहाने बैठ गया। इस अभियान के बाद नहाना जरूरी होता है। मैंने बिना किसी संकोच या हठ के उसके कहे का मान रखा। सफाई हो चुकी थी। मुझे जरा भी नहीं अखरा। रमोला तौलिया लेकर खड़ी थी। उसके चेहरे पर अब तनाव नहीं था। वह खेद या प्रायश्चित जैसे भाव से भर उठी थी। मैंने सहज नेत्रों से उसे देखा, जैसे घर में कुछ घटा ही नहीं। पिता से न कोई भूल हुई, न पत्नी को क्रोध आया। मेरी सहजता पर वह मुस्करा उठी। मुस्कराने में मैंने भी उसका साथ दिया। मैंने मुस्कराते हुए बहुत धीरे से कि कोई और न सुन ले, कहा ‘…रमोला बुजुर्गों से भूल हो जाती है। तुम्हें अपना आपा नहीं खोना चाहिए। कल हम भी बूढ़े होंगे। हमारी याददाश्त भी कमजोर पड़ जाएगी। उस वक्त तुम्हारी बहू मुझ पर इसी तरह गुस्सा करेगी तो क्या तुम सहन कर पाओगी?’ ‘मुंह नोच लूंगी उसका…!’ कहते हुए उसने आंखें बाहर निकाली और बिल्ली के पंजे की तरह अपनी हथेली तान दी। हम दोनों फिर खिलखिला कर हंस पड़े। ०
