गोविंद उपाध्याय
यह मेरे लिए नया शहर था। नई बस्ती, नए लोग। पर सब कुछ वैसा ही था, जैसा पिछले शहर में छोड़ कर आया था। दिन भर दफ्तर की व्यस्तता के बाद, यह घर भी एक घने जंगल में अकेलेपन का अहसास देता था। इस शहर का पहला आदमी था शिवानंद, जिससे मैं पहली बार औपचारिक रूप से अपने नए घर में मिला था। वह रविवार का दिन था। उसकी तीन साल की बेटी अचानक मेरे ड्राइंगरूम में प्रकट हुई। उसे देख कर मैं चौंकता, इसके पहले सात फीट का लंबा-चौड़ा आदमी भी तेजी से ड्रांइग रूम में प्रकट हो गया, ‘सॉरी सर, यह मेरी बेटी है। तनु है इसका नाम। बहुत शैतान है। आपका दरवाजा खुला था और यह अंदर आ गई। मैं आपके सामने रहता हूं।’ मैंने मुस्करा दिया- ‘कोई बात नहीं। आप बैठिए तो।’ ‘जी मेरा नाम शिवानंद है। वैसे लोग मुझे ‘शिब्बू’ के नाम से जानते हैं। रेलवे में मैकेनिक हूं। यहीं पास में रेलवे की कॉलोनी है। वहीं पर पिताजी रहते हैं। वह भी रेलवे में हैं। मैं वहीं रहता था। मेरी उनसे नहीं बनती थी, इसलिए यहां आ गया। एक भाई है। वह बैंक में नौकरी करता है। उसकी शादी नहीं हुई है। वह पापा के साथ ही रहता है। और आप?’ वह अपना परिचय देने के बाद मेरे बारे में जानना चाहता था। मैं हंसते हुए बोला, ‘मेरा नाम दीपांकर है। एक अखबार में काम करता हूं। मेरा तबादला राजधानी से यहां हो गया है। अगले सप्ताह पत्नी और बच्चे भी आ जाएंगे।’ शिब्बू लगभग काला था। हां, नाक-नक्श अच्छे थे। वह मुंह में कुछ चुभला रहा था, जिसे बीच-बीच में जीभ द्वारा बटोर कर इकट्ठा करता रहता। शायद गुटका खा रहा था। मैंने चाय की पूछी तो हाथ जोड़ कर हंसते हुए बोला, ‘जब भाभीजी आ जाएंगी तब पीऊंगा।’
उसने बेटी को आवाज दी। तनु बिना समय गंवाए, उसकी गोद में चढ़ गई। शिब्बू ने मुझे अपने घर आने का आमंत्रण दिया और बाहर निकल गया।
शिवानंद की उम्र चौंतीस-पैंतीस से ज्यादा नहीं होगी। उसका स्वर तेज था और थोड़े समय की बातचीत से ही यह पता चल गया कि वह ज्यादा पढ़ा-लिखा भी नहीं है।
मेरा परिवार आ गया था। पत्नी ने भाग-दौड़ कर दोनों बच्चों का दाखिला करा दिया था। उसके बाद जब शिब्बू को दाखिले के संदर्भ में पता चला तो सिर पर हाथ मार कर बोला, ‘क्या भाई साहब, मुझे बोलना था। जिस स्कूल में बोलते, आपका काम चुटकियों में करा देता। कभी इस तरह की बात हो, मुझे बताइए।’
शिवानंद के घर काम करने वाली महरी, मेरे घर भी काम करने लगी थी। वह रेलवे कॉलोनी के किसी अधिकारी के सर्वेंट क्वाटर में रहती थी और शिवानंद के माता-पिता के घर काम कर चुकी थी। महरी ने पत्नी को शिवानंद के बारे में ढेर सारी बातें बताई थीं, जिन्हें टुकड़ों-टुकड़ो में पत्नी ने मुझे बताया था।
शिवानंद बहुत जिद्दी और गुस्सैल था। बात-बात पर मारपीट पर उतारू हो जाता था। इस नौकरी के पहले लोडर चलाता था। बाप से तब भी नहीं बनती थी। बाप एक नंबर का कंजूस था। जब लड़का कमाने लगा तो वे चाहते थे कि पैसा उन्हें दे। बस, शिब्बू घर छोड़ कर अलग रहने लगा। लफंगों से दोस्ती हो गई। नशा-पत्ती भी करने लगा। उसी समय उसकी मुलाकात लता से हुई थी। ‘कौन लता?’ मैं पूछता, उससे पहले ही पत्नी ने बताया- शिब्बू की घरवाली। सुंदर तो है ही। जिस जगह उसका कॉलेज था, उसी रास्ते पर थोड़ा आगे गोदाम था, जहां शिब्बू माल चढ़ाने-उतारने जाता था। बस, वहीं दोनों की आंखें चार हो गर्इं। वह उस पर फिदा हो गया। कुछ दिन तक इश्क-मोहब्बत जैसा कुछ चलता रहा।
लता के परिवार में चार बेटियां थीं। लता दूसरे नंबर पर थी। पिता किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे। उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। लड़कियां सुंदर थीं। उस परिवार के लिए, लता की प्रेमकथा कोई नई बात नहीं थी। दो वर्ष पूर्व बड़ी बेटी ने एक रेस्तरां मालिक के लड़के से प्रेम विवाह किया था। लेकिन शिब्बू के परिवार में तो मानो तूफान खड़ा हो गया। मां अपनी जान देने और पिता बेटे की जान लेने की बात करने लगे। विजातीय लड़की से विवाह का मतलब था, बिरादरी में बदनामी। शिब्बू को इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था। उसने लड़की वालों की सहमति से कोर्ट में शादी कर ली। न मां ने जान दी और न ही पिता ने उसे गोली मारी। पर लता के लिए यह विवाह बहुत सुखकर नहीं रहा। शिब्बू जैसा दिखता था, वैसा बिलकुल नहीं था। वह एक क्रूर और जिद्दी पति था। बात-बात पर लड़ने-झगड़ने को तैयार रहता। गालियां हमेशा उसके मुंह में रहती हैं। शराब भी हर दूसरे-तीसरे दिन पी ही लेता था। जिस लोडर का उसे मालिक समझ रही थी, वह सिर्फ उसका ड्राइवर था। लता के प्यार का खुमार विवाह के कुछ दिनों बाद ही टूट गया था। शिवानंद के चेहरे का मुखौटा धीरे-धीरे उतर चुका था। इस बीच एक सुखद संयोग यह हुआ कि रेलवे में नौकरी का नियुक्ति-पत्र उसे मिल गया। इसका श्रेय उसके पिता को जाता था। तब लता गर्भवती थी और शिवानंद इसका सारा श्रेय आज भी अपनी बेटी तनु को देता है। वह जैसा भी है, पर तनु में उसकी जान बसती है। लता ज्यादातर मायके निकल जाती। तब उसके दोस्तों की जमघट बनी रहती। वे मीट-मुर्गा पकाते। शराब पीते और आधी रात को वहां से अपने-अपने घर चले जाते। बाहर मोटर साइकिल की आवाज से उसके दोस्तों के जाने का पता चलता।
मुझे इस शहर में रहते हुए छह महीने हो गए थे। अब यह शहर भी पराया नहीं रह गया था। रविवार को मैं साप्ताहिक छुट्टी लेता और पूरा समय अपने परिवार के साथ बिताता। शिब्बू की भी छुट्टी होती और दिन में दस-पंद्रह मिनट मुलाकात हो जाती। यह मुलाकात नीचे पार्किंग और लिफ्ट से शुरू होकर हमारे फ्लोर तक कहीं भी हो सकती थी। अधिकतर वही बोलता। उसके पास निश्चित विषय थे। पिछली कई मुलाकातों से वह प्लाट की बात करता था। शहर के दूसरे छोर पर उसने एक जमीन का सौदा किया था। चौंतीस लाख का प्लाट था। वह कहता- ‘तीन साल बाद वह नब्बे लाख का हो जाएगा। भाई साहब आप भी कहीं डाल दीजिए एकाध प्लाट, दो-चार साल में दूना तो देगा ही। कहिए तो पापा से बात करूं?’‘ये सिर्फ हवा में उड़ रहे हैं। इनके बाप, इनको एक धेला नहीं देंगे। सब छोटे भाई का है। इनका तो एक्को धेला नहीं लगा है। कहां से लगेगा। शाही खर्चे हैं। एक रुपया तो बचता नहीं है। दो रुपए का कर्जा भले हो जाए। कुछ बोलो तो मार-पीट शुरू कर देंगे। बस बातों के फाख्ते उड़ाते हैं।’ लता ने पत्नी को जब यह बात बताई, तो उसे सुन कर झटका लगा। कुछ दिन बाद ही शिब्बू का विषय बदल गया। अब वह भाई के विवाह के लिए आने वालों रिश्तों पर चर्चा करने लगा था। कहता- ‘भाई साहब आप विश्वास नहीं करेंगे, रोज कोई न कोई रिश्ता लेकर आ जाता है। मम्मी-पापा परेशान हो गए हैं। लड़का तो एक ही है, किसे हां कहें और किसे ना। इस साल जाड़े में उसकी शादी निपटा देना है।’
शिब्बू अब दिन में भी पीने लगा था। उसके मुंह से दिन में आती शराब की गंध इस बात का प्रमाण थी। हांलाकि वह बात करते समय मुझसे पर्याप्त दूरी बना कर रखता था। इसके बावजूद शराब की गंध मुझ तक पहुंच ही जाती थी। इधर उसका पेट भी काफी फैल गया था।
दो महीने बाद शिब्बू ने खुशखबरी सुनाई- ‘भाई साहब तैयार रहिएगा। बारात में चलना है। भाई की शादी फाइनल हो गई है। पार्टी एटा की है। स्टील के बर्तनों का कारखाना है। एटा के बहुत बड़े व्यापारी हैं। फोर्ड इको स्पोर्ट गाड़ी दे रहे हैं। भाई, चलिएगा जरूर। वहीं पर तिलक और शादी है। पापा को एटा से बहुत लगाव है। वहां हमारा पैत्रिक घर है।’ज्यादातर मैं उसकी बातों के उत्तर मुस्करा कर देता। इस समय भी उसके मुंह से देशी शराब की तेज गंध आ रही थी। वह किस्तों में खत्म हो रहा था। मुझसे रहा नहीं गया- ‘यार शिब्बू, ये पीना कम करो। यह अच्छी बात नहीं है। अपनी बच्ची और पत्नी के बारे में सोचो।’
उसने मेरी बात पर हंस दिया, ‘अरे नहीं भाई साहब, यह कल रात वाली है।’
मुझे मालूम था कि वह झूठ बोल रहा है। इसके बावजूद मैंने कोई प्रतिवाद नहीं किया।
कुछ दिनों से वह भाई की शादी में व्यस्त था। एक दिन अचानक क्रीम कलर की चमचमाती कार चलाते हुए मिल गया। मेरी गाड़ी सर्विसिंग में थी और मैं सड़क पर आॅटो का इंतजार कर रहा था। उसने गाड़ी मेरे पास रोकी, ‘भाई साहब, चलिए आपको छोड़ दूं।’
मैं मना नहीं कर सका। दरवाजा खोल कर उसकी बगल की सीट पर बैठ गया। वह स्वयं ही बताने लगा- ‘यह गाड़ी छोटे भाई को दहेज में मिली है। अभी कल ही शो रूम से उठाया हूं। बढ़िया कार है।’
वह फोर्ड इको स्पोर्ट भूल चुका था। अब वह इस कार की तारीफ में मगन था। तभी उसका मोबाइल बजने लगा। कोई उसे फोन पर हड़का रहा था। उसके चेहरे की चमक फीकी होती चली गई।
‘ठीक है… ठीक है। अभी दस मिनट में पहुंचता हूं। इतना काहे चिंचिया रहे हो।’ उसने फोन काट दिया। वह भुनभुना रहा था। उसके शब्द अस्पष्ट थे। चेहरे पर नाराजगी उग आई थी। उसने मेरी तरफ देख कर मुस्कराने की कोशिश की। बोला, ‘छोटा भाई है। आजकल ज्यादा उड़ने लगा है। पापा ने ज्यादा सिर चढ़ा लिया है। ऐसी कार पर मैं थूकता हूं। मैं जब चाहूं, फोर्ड इको स्पोर्ट अपने दरवाजे पर खड़ी कर दूं।’
मेरा दफ्तर आ चुका था। मैं उसे धन्यवाद देता हुआ नीचे उतर गया। फिर मैंने काफी दिनों तक शिब्बू को नहीं देखा। अचानक पत्नी ने एक दिन कहा- ‘कल समय निकाल कर सिटी हॉस्पीटल चले जाइएगा। शिब्बू कई दिन से वहां भर्ती है। उसकी तबियत अच्छी नहीं है।’
मैं काम की व्यस्तता के कारण जा नहीं पाया। दो दिन ऐसे ही निकल गए। रविवार को वह खुद मेरे पास आया। उसे देख कर मैं चौंक गया। वह बहुत दुबला हो गया था, लेकिन उसका पेट वैसे ही फूला हुआ था। आंखें पीली थीं और पूरा व्यक्तित्व भयावह लग रहा था। वह परेशान था। उसने मेरी तरफ देखा। उसके चेहरे पर दयनीयता थी, ‘भाई साहब, चार महीने से हालत खराब है। कुछ भी नहीं पच रहा। समझ ही नहीं आ रहा कि क्या करूं? विभाग का डॉक्टर बता रहा था कि ज्यादा पीने से लीवर में घाव हो गया है। ठीक होने में टाइम लगेगा।’
मैं चुपचाप उसकी बात सुन रहा था। पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लग रहा था कि वह अब भी पीए हुए है।
उस रात मैं ठीक से सो नहीं पाया। शिब्बू का चेहरा बार-बार मेरी आंखों के सामने कौंध जाता। उसके चेहरे पर सिर्फ मौत का खौफ था। पिछले लगभग दो वर्षों में उसके चेहरे पर मैंने न जाने कितने मुखौटे देखे थे, लेकिन अब उसके चेहरे पर कोई मुखौटा नहीं था।
दबे पांव आती मौत की आहट सुन चुके आदमी का भयभीत चेहरा। ०
