वंदना देव शुक्ल
खाली घर, खाली मन की तरह होते हैं, जिनमें बंद खिड़की-दरवाजों के बाहर न जाने कितनी सुबहें ठिठकी खड़ी होती हैं। धूप न जाने कितने दिन खिड़कियों पर दस्तक देने के बाद थक कर किसी बगलगीर बालकनी के गमले में लगी बोगनबेलिया पर लटकी सुस्ता रही होती है। न जाने कितनी रातें, नींदों की आहटें सुनने को बेताब, आ-आकर रोज लौट गई होती हैं। पंद्रह दिन पहले। शाम कुछ गहराने को थी, जब ओला कैब हमें ख्वाबों सहित नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से हमारे नए आवास की ओर ले जा रही थी। इतना गमगीन माहौल तो मेरे विवाह की विदाई में भी नहीं हुआ था, जैसा जयपुर से गुड़गांव नौकरी के लिए आते वक्त हो गया था। मायका-ससुराल एक ही शहर में हो तो ऐसे मौके भावनात्मक रूप से और वजनदार हो जाते हैं। पंकज के परिवार वाले तो उदास थे ही, पूरा मायका और मायके के नौकर-चाकर, पड़ोसी भी हमें विदा करने आ गए थे, गोया हम नवविवाहित दंपति नौकरी के लिए दूसरे शहर नहीं, बल्कि कहीं विदेश बसने जा रहे हों। मम्मी के पड़ोस वाली शर्मा आंटी तो रोने ही लगी थीं। गोद में खेलाया है उन्होंने मुझे।
माना कि ब्याह को अभी छह महीने ही हुए थे और मम्मी-पापा ने अपनी इकलौती लाड़ली बेटी यानी मेरा विवाह इसीलिए जयपुर में ही कर दिया था कि हफ्ते दस दिन में मिलना होता रहे, लेकिन पंकज की नौकरी एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में गुड़गांव में लग गई थी और संयोग से मेरा बुलावा भी गुड़गांव की ही एक कंपनी से आ गया था। हालांकि सफर के दौरान याद आते अपनों के उदास चेहरे मुझे विचलित कर रहे थे, लेकिन सच कहूं तो इस महानगर में रहने का मुझे भी कम रोमांच नहीं था। नए शहर की हर सुबह कितनी हसीन होगी? बस हम दोनों और नया घर, खिड़की से दीखते नए दृश्य, अदेखी सड़कें, नए पड़ोसी, तमाम कायनात नई-नई सी। सोच कर सिहरन-सी भर जाती। पंकज के गुड़गांव में जॉब की खबर मिली, तब से मिलने-मिलाने का सिलसिला रुका ही नहीं था। कभी किसी के घर खाना, तो कभी किसी के यहां मिलने जाना। कई बार तो खीझ होती कि ऐसी भी क्या आत्मीयता, जो थका ही डाले। अच्छा हुआ गुड़गांव में सब अपरिचित हैं। जिंदगी के पूरे चौबीस वर्ष जयपुर के ही मुहल्लों, बाजारों, इमारतों, जाने-पहचाने चेहरों के बीच गुजर गए… हाऊ बोरिंग… मैंने सिर झटका।
हमने ट्रेन में ही योजना बना ली थी कि पहले अपने फ्लैट में जाकर भरपूर नींद लेंगे। सुबह थकावट उतर जाएगी तब सामान खोलेंगे और अन्य व्यवस्थाएं मसलन, मेड की तलाश, महीनों से खाली और बंद पड़े घर की सफाई, सामान जंचाना, बिजली-पानी से लेकर घर में कुकिंग गैस तक की व्यवस्था और फिर नई जिंदगी की शुरुआत… मौज मस्ती।
हाइवे, आधुनिक इमारतों और चौड़ी सड़कों से होते हुए टैक्सी ने हमें एक ऐसी ‘पॉश’ जगह लाकर उतार दिया, जो चारों ओर से बहुमंजली इमारतों से घिरा हुआ एक छोटा मैदान-सा था, जिसके एक ओर कुछ दुकानें और दूसरी ओर एक पार्क था। पंकज तो यहां पहले भी आ चुके थे, क्योंकि हम इमारतों की इस भीड़ के एक हिस्से की चौथी मंजिल के जिस फ्लैट में रहने आए थे, वह पंकज के बड़े भाई सुयश भैया का था, जो अब अमेरिका में बस चुके हैं। फ्लैट फर्निश्ड था, इसलिए हम निश्चिंत होकर यहां आए थे। हम संकरी-सी लिफ्ट से होते हुए जिस फ्लैट के सामने खड़े थे, उसके दरवाजे पर लोहे का एक बदरंग ताला लटका मिला। ताले में जंग लग चुकी थी। उसने चाभी के सभी प्रयासों को निरस्त कर बाहर का रास्ता दिखा दिया था। पंकज ने कुछ परेशानी भरी नजरों से मुझे देखा। बहरहाल, महानगर के कुरुक्षेत्र में हमारे हौसलों का बिगुल बज चुका था। अपार्टमेंट के गार्ड ने ताला तोड़ने के लिए कोई आदमी न भेजा होता, तो रात ही हो जाती यहां खड़े-खड़े। लोहे की रॉड का जुगाड़ कर आदमी ने बड़ी चतुराई से ताला खोल दिया। और ‘चोर ताला लगवा लो साबजी’ की सलाह दे, दो सौ रुपए लेकर चलता बना।
हम दोनों घूम-घूम कर पूरे घर का जायजा ले रहे थे। फ्लैट के दोनों कमरे, किचेन, बालकनी, छतों के कोनों पर मकड़ी के जाले चमगादड़ों की तरह लटके थे। घर का फर्नीचर, किताबें बर्तन सब उलट-पुलट और उन पर धूल का कब्जा था। छींक-छीक कर मेरा बुरा हाल था। ‘किसी सफाई वाले को बुला लेते हैं। व्यवस्था जमने में कुछ समय तो लगता ही है।’ पंकज ने कहा। ‘ठीक कह रहे हो। अभी बेडरूम ठीक कर लेते हैं। वहीं टेबल पर जरूरी सामान रख लेंगे। अभी अम्मा ने जो पूड़ियां रखी थीं, वही खाकर सो जाएंगे। सुबह नीचे होटल से कुछ खाने को ले आएंगे।’ मैंने सुझाया।
‘पानी दो, गला सूख रहा है…’ पंकज ने लैपटॉप निकालते हुए कहा।
‘सॉरी, पानी की बोतल लाना तो याद ही नहीं रहा। जो थी वह खत्म हो गई।’
‘तुम भी कमाल करती हो। नीचे दुकानें बंद हो चुकी हैं। अब इस वक्त पानी लेने कहां जाएंगे? अच्छा, तुम एक काम करो, अभी हम किसी को जानते नहीं। नया शहर है। ऐसे में पड़ोसी ही काम आते हैं। वैसे भी सौहार्द के नाते हमें उनसे मिलना चाहिए। उनसे पानी की एक बोतल भी ले आना और घर की सफाई और काम के लिए किसी मेड के लिए भी पूछ आना।’ पंकज का यह विचार मुझे पसंद आया।
अपने सामने वाले पड़ोसी की घंटी बजाई। ‘हू इज देयर?’ भीतर से आवाज आई।
मैंने कहा, ‘मैं हूं जी… आपकी नई पड़ोसन।’
दरवाजा खुला। एक गोरी-चिट्टी, लंबे कद की अधेड़ उम्र की स्त्री थी। ‘कहिए’- उसने द्वार पर खड़े हुए ही कहा।
‘मैं सुजाता हूं, हम आपके सामने वाले फ्लैट में आए हैं।’
‘अच्छा…’ उसने निर्भाव होकर कहा।
‘मेरे पति का ट्रांसफर जयपुर से यहां गुड़गांव हुआ है और मैं भी एक कंपनी में…’
‘आय एम सॉरी। अभी तो घर के सब लोग बाहर हैं। मुझे भी सोना है अब, इसलिए हम लोग फिर मिलते हैं… वैसे अच्छा लगा कि आप लोग इस फ्लैट में आ गए।’
‘ओके गुड नाइट।…’ कह कर मैं वापस बुझी हुई-सी अपने फ्लैट में आ गई।
‘पानी लार्इं? मेड वगैरह की बात…?’ पंकज मेरी प्रतीक्षा ही कर रहे थे।
‘उन्होंने मौका ही नहीं दिया।…’
‘मतलब?’
‘मतलब उन्होंने बैठने को कहना तो क्या, बात तक नहीं करनी चाही।’
पंकज कुछ देर मुझे देखते रहे, ‘कोई बात नहीं। मैं जाता हूं नीचे। गार्ड से पूछता हूं, कहीं पानी का इंतजाम हो जाए तो।’
करीब एक सप्ताह तक हमें बाहर खाना खाना पड़ा। घर में गैस अभी नहीं आई थी। मेड ढूंढ़ने के लिए एड़ी से चोटी का जोर लगा लिया। हार कर एक एजेंसी से बात की, लेकिन वहां भी कोई नतीजा नहीं निकला।
उस दिन सुबह-सुबह जब मैं चाय पीते हुए खिड़की से झांक रही थी, देखा कि अपार्टमेंट के पार्क में करीब दस बाइयां बैठी गपिया रही हैं। ‘अरे वाह, एक साथ इतनी मेड्स!’ मैंने चाय टेबल पर रखी और लिफ्ट से सीधे नीचे। पार्क में जाकर मैंने बहुत विनम्रता से उन्हें अपना परिचय दिया और उनसे कुछ ‘हेल्प’ करने को कहा।
मेरी घिघियाहट सुन कर उन्होंने एक-दूसरे की तरफ देखा। ‘ऐसा है मैडम जी, हमारे पास तो टेम नहीं है। किसी से पूछते हैं।’ उनकी टालू आश्वस्ति से मेरा मन बुझ गया। ‘प्लीज किसी तरह टाइम निकाल लीजिए ना।’ मैंने कहा।
उन्होंने आपस में कुछ बातचीत की, फिर बोली, ‘मैडम किस फ्लोर पर रहती हो?’
‘चौथे माले पर… नंबर है तीन ए।’
‘अच्छा फोर्थ फ्लोर पर थ्री ए… ऐ सकू, तेरी मैडम गई हैं, इनका पकड़ ले काम।’ एक हृष्ट-पुष्ट गहरी सांवली औरत ने एक लड़की से आदेश के स्वर में कहा।
सकू नाम की वो छरहरी सांवली सी फैशनेबल युवती मेरी ओर देखती रही, फिर मोबाइल हाथ में लेकर बोली, ‘आपका नंबर दो जी।’
मैंने नंबर दिया।
‘ठीक है शाम को आते हैं।’
लौटते वक्त मेरी चाल में एक विजयी उत्साह था।
घर आते ही मैंने यह खुशखबरी फोन से पंकज को बताई।
शाम को वह आई। मैं तो पलकें बिछाए उसी का इंतजार कर रही थी। ‘अरे आओ सरू बैठो।…’
‘कितने बजे बुलातीं तुम काम कू?’ उसने बिना लाग-लपेट के कहा।
‘देखो, साहब और मैं सुबह आॅफिस जाएंगे, इसलिए हमें जल्दी टिफिन चाहिए। सुबह साढ़े आठ बजे और शाम को छह बजे।’
‘दो टाईम आने का है?’
‘हां ….खाना तो दोनों ही टाईम बनेगा न!’ मैंने मासूमियत से कहा।
वह हंसी, ‘अरे यहां एक ही टाईम आते हैं मैडम… शाम के घर अलग हैं हमारे। सुबह भी साढ़े आठ बजे का रोकड़ा ज्यादसी होगा। क्यूंकि सबसे जादा डिमांड इसी टाइम का है न!’
‘पगार समय के अनुसार लेती हो?’
‘हौ मैडम जी।’ उसने हंसते हुए कहा।
‘कितनी?…’ मैंने डरते हुए पूछा।
‘एक टेम का झाड़ू पटका बर्तन, साढ़े तीन हजार। खाना भी बनाना है तो सात हजार… कोई बाहर के काम मतलब सब्जी भाजी लाना, धोबी के कपड़े, किराना वगैरह तो दो हजार और। महीने में चार छुट्टी विद फुल पेमेंट। कोई कंटाला हुआ तो हमारी यूनियन बात करेगी, हम नहीं। चाय-नाश्ता एक्स्ट्रा। आप देर-सबेर पर टोकेगी नहीं। हमारे मोबाइल से कोई एतराज नहीं होगा। त्योहारों पर नया सूट और नगदी। घर में कोई फेमिली फंक्शन हो तो स्कूटी में एक लीटर पेट्रोल का पैसा एक्स्ट्रा। बोलो मंजूर है?’ यह सब वह एक सांस में बोल गई।
मैं कुछ देर सहमी-सी उसे देखती रही, ‘हां मंजूर है।’ मैंने हौले से कहा। मुझे लगा जैसे उसके इस प्रश्न का केवल यही जवाब हो सकता है, इस महानगर में। ०
