हेमंत कुमार पारीक

पता नहीं क्यों जब कभी खाली बैठता हूं, सू याद आ जाती है। ऐसी स्थिति में कई बार पत्नी ने मुझे टोका है, क्यों जी, क्या सोच रहे हो? कई बार मैंने उसके सवाल का जवाब नहीं दिया। वह चेहरा देखती रही और फिर अपने काम में लग गई। उसके सवाल का जवाब देना मतलब उससे जुड़े कई सवालों को न्योता देना है। हालांकि सूजी से मेरा कोई लेना-देना नहीं है। दफ्तर में मेरे साथ बैठती भर है। कभी-कभी हंसी-ठट्ठा भी हो जाता है। वह कुछ कहती है। उसकी निजी जिंदगी के कुछ अनसुलझे से सवाल होते हैं। मैं सुन सकता हूं, पर उनका कोई हल नहीं है मेरे पास। वजह कि हर किसी की जिंदगी में ऐसे सवाल होते हंै, जिनका हल किसी के पास नहीं होता। कल वह दफ्तर आई थी। लंबी छुट्टी पर है, लेकिन दफ्तर के जरूरी काम से उसे आना पड़ा था। सामने बैठी थी। दफ्तर का आला अधिकारी था और मैं। आला अधिकारी नई उम्र का है। सूजी से दस बरस और मुझसे पंद्रह बरस छोटा। वह सुनने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता। कभी मेरी तरफ तो कभी उसके चेहरे की तरफ प्रश्नवाचक नजरों से देख सकता है। बात उसने ही शुरू की, ‘मैम बताइए, और कितने दिनों तक अवकाश पर रहेंगी?’ उसने रूखा और संक्षिप्त जवाब दिया, ‘सर, कुछ कह नहीं सकती। सासू मां को कैंसर है।’ कैंसर सुन मानो उसे सांप सूंघ गया। मैं भी उसके चेहरे की तरफ देखने लगा। कहीं कोई सवाल की गुंजाइश ही नहीं थी। लेकिन बात आगे बढ़ानी थी। थोड़ी देर तक मौन छाया रहा। अधिकारी टेबिल पर रखे पेपरवेट से खेलने लगा था। और वह मेरे चेहरे को पढ़ रही थी। मैं सवाल ढूंढ़ने में लगा था। ऐसा सवाल, जो उसकी सास से कोई वास्ता न रखता हो। दरअसल, हुआ यह था कि कैंसर शब्द के उच्चारण के साथ उसकी आंखों में आंसू आ गए थे। इसलिए कैंसर शब्द से दूरी बनाना जरूरी था। वजह यह कि इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति पर किसी भी समय पूर्ण विराम लग जाता है। मतलब उसके विषय में बोलना व्यर्थ था। सोचते-सोचते मुझे उसका बेटा याद आ गया। मैंने पूछा, ‘अनिरुद्ध की पढ़ाई कैसी चल रही है?’ थोड़ा सहज हो गई वह। ‘ठीक है, पर…! जिस कारण मैंने छुट्टी ली है वह तो पीछे चला गया। अब असल कारण तो सास हैं।’

वह फिर वापस लौटती-सी लगी। दरअसल, मुझे वापस खींच रही थी। उस दलदल में, जहां चारों तरफ खौफ था। मैंने फिर विषय को पकड़ा। ‘आपके पति नहीं आए क्या?’ ‘आए थे। दो दिन रुके और चले गए।’ इतना कहते-कहते उसकी आंखों में फिर आंसू उतर आए। पलकें भारी होने लगीं। मैंने बाहर बैठे प्यून को आवाज दी, ‘मन्नू, जा तीन कॉफी ले आ।’
बोझिल माहौल थोड़ा हल्का हो गया था। वह भी माहौल में रमने लगी थी। कुछ देर के लिए मानो अस्पताल से बाहर आ गई। डॉक्टर, नर्स, और दवाइयों के वातावरण से दूर।… वह दफ्तर का वातावरण था, जहां सिर्फ कागज, कलम, काम और दाम की बातें होती हैं। और भी, जैसे कि किस-किस का प्रमोशन हुआ, किसकी कितनी तनख्वाह बढ़ी, किसके बच्चे की शादी तय हुई या किसका बच्चा नौकरी में लगा और नौकरी कहां लगी। विदेश चला गया या किसको कितना पैकेज मिला। एक स्पर्धा का वातावरण और साहब की छीछालेदार।
मन्नू कॉफी ले आया। अधिकारी ने एक चुस्की ली और बोला, ‘आप जैसी सिंसियर लेडी के न रहने से बच्चों का कितना नुकसान हो रहा है। पर कोई क्या कर सकता है?’ अधिकारी फिर उसी दिशा में जा रहा था। मैंने तुंरत विषय बदला, ‘मैम आप भी क्यों नहीं चली जातीं? अपने पति के साथ रहना अलग बात होती है।’
‘समय निकल गया सर। मैंने सोचा था अनिरुद्ध आइआइटी में निकल जाए तो…।’
‘मगर मैंने तो यही बात आज से चार पांच वर्ष पहले कही थी। चेन्नै में तो आला दर्जे की कोचिंग होती है।’
‘पर कैसे जाती? सास-सुर कहते हैं, हम अपनी जमीन छोड़ कर नहीं जा सकते।’
‘तो फिर आपके पति को वापस लौटना चाहिए था। अपने मां-बाप की देखरेख तो उनकी पहली जिम्मेदारी है। आखिर इकलौती संतान हैं। और फिर आपसे शादी की है। शादीशुदा इंसान कितने दिन अकेला रह सकता है?’ इस सवाल पर उसने एकदम चुप्पी साध ली। जल्दी-जल्दी कॉफी खत्म कर उठ बैठी। जाते-जाते बोली, ‘सर आपको तो सब मालूम है…। अब मुझे चलना चाहिए। मम्मी को आया के भरोसे छोड़ कर आई हूं।’
अगले दिन अचानक वह फिर आ गई थी। इस दफा मैं और वह आमने-सामने थे। उसे देखते ही मेरी सवालिया नजरें उसके चेहरे पर टिक गर्इं। बिना कुछ बोले वह समझ गई। थोड़ा मुस्कुराई और आने की वजह बताने लगी, ‘डॉक्टर कह रहे हैं कि मम्मी की तबीयत में सुधार है। बड़ी इच्छा शक्ति है।’
‘मगर आज यहां कौन-सा काम है?’
‘बस यों ही सर, अस्पताल के माहौल में मेरा दम घुटता है।… चलें कॉफी हाउस तक?’ मैं चौंका। पहली बार सुन रहा था। उसने न्योता दिया था।
मैंने कहा, ‘जरूर।’ उसने अपना पर्स कंधे पर रख लिया। चलते-चलते बोली, ‘सर, आप पर ही भरोसा है मुझे। अपने दिल की बात आपसे ही कह सकती हूं। और कोई तो है नहीं सुनने और समझने वाला।’
‘कहां चलना है?’
‘वहीं क्वालिटी रेस्तरां में…। थोड़ा माहौल बदल जाएगा। इसी वास्ते आ गई। बहुत दिनों से बेटा, मम्मी और घर के दायरे से बाहर नहीं निकली।’
‘कभी अपने पति के साथ…?’ मैंने उसके चेहरे की तरफ देखा। उसने चुप्पी साध ली। कार का दरवाजा खोलते हुए बोली, ‘आप चलाएंगे सर?’
‘नहीं, जिसका बंदर उसी से नाचता है! तुम्हीं चलाओ।’ वह ड्राइविंग सीट पर बैठ गई।
रेस्तरां के ठीक सामने उसने गाड़ी पार्किंग में लगा दी। सामने तालाब को देखते हुए बोली, ‘कितना खुशनुमा वातावरण है!’ वहां दो-चार कश्तियां पानी में तिर रही थीं। थोड़ी बारिश होने के कारण गर्मी से निजात मिली थी लोगों को। इसलिए लोगों की भीड़ थी तालाब के किनारे। जगह-जगह खोमचे और चाट के ठेले दिख रहे थे। ऐसी भीड़भाड़ में भिखारी और अवांछित लोग भी आ जाते हैं, जेबकतरे वगैरह। वह बोली, ‘चलिए सर।’ हम दोनों सीढ़ियां चढ़ने लगे। चढ़ते-चढ़ते मैंने पूछा, ‘कभी नाव में सफर किया है?’ वह व्यंगपूर्ण लहजे में बोली, ‘किसके साथ…?’ मैं चुप हो गया। एक ही सवाल से मेरे मुंह पर जैसे ताला जड़ दिया हो उसने।
दोनों टेबल पर आ बैठे। ‘क्या लेंगे?’ उसने सवाल किया। ‘जो तुम्हें पसंद है वही।’ उसने बैरे को आवाज दी। बैरा सामने आ खड़ा हुआ। ‘दो मसाला डोसा और दो कोल्ड कॉफी!’ उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा। बैरा आर्डर लेकर चला गया। उसके जाते ही मुझसे बोली, ‘आज मैं खुश हूं। बहुत खुश हूं। वजन ढोते-ढोते आजिज आ गई थी। अब उतार फेंकने की इच्छा हो रही है। आपको पता नहीं, पहली बार मैं आजादी महसूस कर रही हूं।’
‘पहले कभी पति के साथ यहां नहीं आई?’ पति शब्द सुनते ही उसके चेहरे की रंगत बदल गई। ‘पति…! पति किसे कहते हैं, आज तक समझ नहीं पाई। आईने के सामने खड़ी होकर मैं यही सवाल अपने आप से करती हूं। औरत को पत्नी की भूमिका में बांध कर आदमी स्वंतत्र हो जाता है। अब देखिए, मैं कितने बरसों से उसे ढो रही हूं। उसे क्या, उसकी संतान और मां-बाप को बहू की भूमिका में…। पति तो जैसे इस पूरे जीवन में कभी नजर ही नहीं आया। उसका कंधा तो कहीं दिखा ही नहीं। मेरे दोनों कंधे उसके मां-बाप को ढोते-ढोते टूटने लगे हैं।’ तभी बैरा डोसे ले आया। उसने बैरे से कहा, ‘कॉफी रुक कर लाना।’

छुरी-कांटों की आवाज आने लगी थी। वह चुप थी। एक अजीब-सा सन्नाटा तैरने लगा था वातावरण में। मैंने इस सन्नाटे को भंग करते हुए कहा, ‘बेमेल शादी का नतीजा है। अस्सी परसेंट कामकाजी महिलाओं के साथ-यही समस्या है।’ उसने छुरी अलग रख दी। ‘ये वे औरतें हैं, जो सैंडविच बन गई हैं। पुराने को छोड़ नहीं सकतीं और नए में कदम रखने की हिम्मत नहीं है, डरती हैं। उनके जेहन में कहीं समाज नाम का खौफनाक जानवर करवटें बदलने लगता है। अब मुझे ही देखिए, आपके साथ आने में कितना सोचना पड़ा। जब सोचती तो पति सामने दिखने लगता।’ उसने गले में लटकते मंगलसूत्र को छुआ। बोली, ‘यह स्पाई साथ चलता है। और माथे पर हाथ रख बोली, और यह सिंदूर!… मगर कुछ औरतों के लिए यह महज प्रदर्शन होता है।’
‘मगर यह सब क्यों हुआ? तुमने यह बेमेल रिश्ता क्यों स्वीकार किया?’
‘इस क्यों का जवाब नहीं है मेरे पास। समय के साथ यह ‘क्यों’ छूट गया है। अब कुछ हो नहीं सकता। यह क्यों घिस-घिस कर कपड़े की तरह छलनी हो गया है। औरों की तरह मैं भी इसे भाग्य के सिर डाल देती हूं। जैसे मेरी मां कहती है, तेरे भाग्य में यही बदा था।… भाग्यशाली है कि सास-ससुर की सेवा करने का मौका मिला। मौका क्या, एक सजा हो गई। इनका जाया तो दूर बैठ कर तमाशा देख रहा है। अगर मेरी परवाह होती, तो यहां से जाता ही क्यों?’
‘मगर तुमने उसे जाने ही क्यों दिया?’
वह खिसियाहट भरी हंसी हंसी। ‘यह सवाल तो उनसे करना चाहिए जो अभी बिस्तर पर पड़ी हैं। जीवन की अंतिम सांसें गिन रही हैं। और मैं कोल्हू का बैल हो गई हूं। सोचती हूं कि बच्चा बड़ा होकर मुझे निहाल करेगा, पर यह धोखे में जीना है। मुझे पता है, वह पढ़-लिख कर अपने बाप की तरफ ही झुकेगा। फिर भी और कोई चारा नहीं है। अगर कुछ किया नहीं उसके लिए तो भी पछताना है।’ वह आवेश में आ गई थी। छुरी कांटे तेजी से चलाने लगी। बैरा आ गया था कोल्ड कॉफी लेकर। उसने प्लेट अलग सरका दी। कॉफी का मग हाथ में ले लिया। मग हाथ में लेते ही उसका गुस्सा ठंडा पड़ने लगा था। एक-दो घूंट लेकर बोली, ‘मगर आपके साथ बैठ कर, दो क्षण बिता कर, लगता है मैंने जिंदगी के बेहतरीन लम्हे जी लिए। यह मुझे पहले ही करना था। खोल से बाहर आने की एक कोशिश है। मकड़ी के जाले में लिपटा कीड़ा अगर निकल भी गया तो क्या? कुछ कहा नहीं जा सकता कि वह जाले के उन धागों से निजात पाकर खुली हवा में सांस ले सकेगा या नहीं। पर इतना जरूर है कि वह उस खौफ से आजाद तो हुआ।’

कॉफी खत्म हो चुकी थी। मैंने कहा, ‘अब चलना चाहिए। अंधेरा घिरने लगा है। और शायद अस्पताल में तुम्हारा इंतजार हो रहा हो?’
‘मुझे उसकी परवाह नहीं है। थक गई हूं। आपने दस बरस पहले भी मुझे देखा है और अब देख रहे हैं। कोई बदलाव नोटिस किया? सच-सच बताना, मैं तो रोज बदल रही हूं। आईने के सामने खड़ी होती हूं तो वह सब कुछ साफ-साफ कह देता है। क्रीम पाउडर और लिपस्टिक में लिपटा यह चेहरा झूठा है। दरअसल, समय से पहले बूढ़ी हो चुकी हूं।…’ उसने सौ रुपए का नोट टिप के वास्ते अलग से ट्रे में रख दिया और चलने को उठी। हम दोनों कार तक आ गए थे। वह दरवाजा खोलने वाली थी कि मैंने कहा, ‘थोड़ा आगे चल कर देखते हैं।’ वह बिना कुछ कहे साथ चल पड़ी। ठंडी हवा के झोंकों से उसके बेतरतीब बालों से एक लट उसके चेहरे पर आ रही थी। वह सुंदर लग रही थी। उसने पर्स खोल कर मोबाइल निकाला और बोली, ‘आइए सर, मेरे साथ खड़े हो जाइए।’ मैं संकोच में पड़ गया। वह समझ गई। हंसते हुए बोली, ‘यह फोटोग्राफ मील का पत्थर होगा मेरे लिए।’ पीछे नाव और तालाब के बीच टापू का सीन चुना उसने और फ्लैश चमक गई। वह खुश थी। कार की तरफ बढ़ने लगे थे हम दोंनों। तभी पता नहीं कहां से एक मोटर साइकिल हमारे सामने रुकी। हम हकबका कर खड़े हुए कि उसके मुंह से आह निकली। कोई उसके गले का मंगलसूत्र खींच कर भाग रहा था। मैं शोर मचाने लगा- पुलिस-पुलिस। उसने मेरा हाथ पकड़ लिया, ‘रहने दें सर, वैसे भी वह बेकार-सा गले में पड़ा था। चलो किसी के काम तो आएगा।’ तभी भीड़ इकट्ठा हो गई थी। लोग पूछने लगे, ‘क्या हुआ? वह बोली, ‘कुछ नहीं।’ और आगे बढ़ गई कार की तरफ। ०