अशोक गुप्ता
हवा में सनसनाता हुआ आता है जैवलिन और उसकी इस्पाती नोक जमीन में छह इंच धंस जाती है। उसका लंबा छरहरा दंड जमीन से पैंतीस डिग्री का कोण बनाता हुआ देर तक थरथराता है और उसके साथ हवा भी कांपती रहती है। महासमर्थ खुद को जैवलिन कहता है। बाकी सबके लिए वह महासमर्थ ही है। लंबे-लंबे डग भरता हुआ महासमर्थ आगे बढ़ता आ रहा है और एक घने, ठिगने पेड़ को देख कर ठहर जाता है। दिशा वाहक ने उसे इसी पेड़ की पहचान बताई थी। उसने दाहिनी ओर देखा। उसे बड़ा सा मैदान नजर आ गया। उसकी चौहद्दी कंटीले तार से घिरी हुई थी और मैदान सपाट खाली था। महासमर्थ पंद्रह-बीस कदम चल कर चौहद्दी के भीतर पहुंच गया। उसने मैदान में चारों तरफ नजर दौड़ाई। फिर अपने कंधे पर टंगे थैले में हाथ डाल कर मुट्ठी भर बीज निकाले और मैदान में एक तरफ बो दिए। फिर दूसरी तरफ और अंत में तीसरी तरफ। इसके बाद वह पेड़ की ओर वापस लौटा। पेड़ सचमुच शीतलता देने वाली छांह से भरपूर था। महासमर्थ ने कुछ राहत महसूस की, लेकिन भीतर एक बेचैनी भी थी। वह उठा और फिर मैदान की ओर चल पड़ा।
महासमर्थ ने मैदान में कब्रों के बीच बोये थे। देखते-देखते मैदान कब्रों से भर गया था। हर कब्र पर एक सफेद पत्थर लगा था, जिस पर कुछ नाम लिखे थे। वह चार कदम बढ़ा कर कब्रों के पास पहुंच गया। वह जिस कब्र को देखता उसमे से गहरा आर्तनाद उठ कर उसके कान को भेदने लगता। महासमर्थ इस मर्मभेदी चीख पुकार से विचलित होने वाला इंसान नहीं था, इसीलिए तो वह जैवलिन था।
तभी महासमर्थ का फोन बजा। उस तरफ से सेवक बोल रहा था। महासमर्थ ने सेवक को जवाब दिया, ‘यहां बहुत शोर में कुछ सुन नहीं पा रहा हूं। पांच मिनट बाद फिर कॉल करो।’ महासमर्थ फिर पेड़ के नीचे आ गया। सेवक का फोन बजा, ‘सत्तावन कब्रों में तीन-तीन लाशें हैं। बाकी में दो-दो को दफनाया गया है।’ सुन कर महासमर्थ ने फोन बंद कर दिया।
वह सर्वोच्च से हुई बात को सोचने लगा। आदेश के अनुसार दुधवारी गांव के मर्द, औरतों और बच्चों समेत महासमर्थ ने दो सौ बावन लाशें बिछाईं थीं। वह कुछ आगे सोचता कि तभी सहायक का फोन फिर बजा। ‘…दिशा वाहक आपसे मिलना चाहते हैं। आप वहीं पेड़ के नीचे इंतजार करें। उनकी गाड़ी आपको वहीं से पिक अप कर लेगी।’ महासमर्थ के चेहरे पर मुस्कान खेल गई। उसके कंधे पर टंगे जिस थैले में कुछ देर पहले तक कब्र के बीज थे, उसमें कुछ और भी है। एक पोटली में पांच सौ सोने के सिक्के हैं, वह पोटली सेवक के हिस्से की है। एक दूसरी पोटली में हजार सोने के सिक्के हैं, वह दिशा वाहक को देनी है और इसीलिए दिशा वाहक ने उसे बुलाया है। तीसरी पोटली जरा भारी है, पंद्रह सौ सोने के सिक्कों वाली, वह उसकी है। महासमर्थ इसी प्रसंग में सोचने लगा। सर्वोच्च ने दुधवारी गांव का सफाया करने का काम महासमर्थ को सौंपा था। योजना दिशा वाहक ने दी थी। सहायक तीर्थ यात्रा से लौटे भक्त का रूप धर के दुधवारी गांव के लोगों को भोज पर बुलाए, कि उसे स्वप्न में उसके गुरु जी ने आदेश दे कर दुधवारी गांव भेजा है। भोज हो और शराब न हो, यह कैसे मुमकिन है। नहीं नहीं… के बावजूद शराब वहां पहुंच जाती है। महासमर्थ सहायक के साथ रहेगा। रसोई सहायक खुद तैयार करेगा और महासमर्थ उस तैयार दाल तरकारी में विष मिलाएगा। शराब भी जहरीली रहेगी। और बस…।
योजना सटीक थी। फलीभूत हुई। सर्वोच्च को उस गांव की समूची भूमि को अपने हथियारों के कारखाने के लिए हथियाना था। मुखिया दलित था, इसलिए वह आमंत्रित नहीं था। लेकिन पोशीदा बात यह थी कि उसे सर्वोच्च ने खरीद लिया था। सर्वोच्च के इशारे पर महासमर्थ के हाथों यह दूसरा कांड हुआ था। उसमें सर्वोच्च के खिलाफ तीन गवाहों को अदालत पहुंचने के पहले महासमर्थ ने परमधाम पहुंचाया था। स्मृति के इस आवेग ने महासमर्थ को किंचित भावुक कर दिया। दुधवारी गांव के पास उसका ननिहाल है और वह दुधवारी के लौंडे-लपाड़ियों के साथ खेला-कूदा हुआ है। इसी बीच पेड़ पर बंदरों की उछल-कूद से चिड़िया का एक घोंसला पेड़ से नीचे गिर गया। महासमर्थ ने उसे देखा। घोसले में चिड़िया का एक नन्हा बच्चा था। गुलाबी रंग का नन्हा सा जीव, जिसके पंख आने में अभी देर थी। उसे देख कर महासमर्थ का मन भर आया। उसने हौले से उठा कर वह घोंसला पास की एक झाड़ी के भीतर करीने से रख दिया। वापस पेड़ के नीचे वह लौटा ही था कि उसे दिशा वाहक की कार आती नजर आई। महासमर्थ चौकन्ना हो कर फिर जैवलिन के रूप में खुद को गढ़ने लगा। दिशा वाहक के सामने उसे उसी रूप में पहुंचना था।
दिशा वाहक महासमर्थ का इंतजार ही कर रहा था। लंच का समय हो गया था। दोनों ने भोजन किया और दिशा वाहक दीवान पर लमलेट होने की तैयारी करने लगा। उसके इशारे पर महासमर्थ भी बड़े चौड़े सोफे पर पसर गया। दिशा वाहक की पोटली उस तक पहुंच गई थी। अब कुछ गपशप का माहौल बनने की तैयारी हो रही थी। महासमर्थ कुछ भावुकता से भरा हुआ था और दिशा वाहक सतर्क था। ‘दुधवारी को ले कर भावुक हो रहे हो जैवलिन… जब सब जाने पहचाने लोग सामने थे तब तो तुम नहीं डिगे, और आज कमजोर हो रहे हो। जबकि इस कांड को बीते हुए सत्ताईस दिन हो चुके हैं। मजबूत बनो। तुमने मोर्चा जीत लिया है। सर्वोच्च ने तुम्हें मालामाल कर दिया है। फिर क्या बात है? तुम सर्वोच्च के महासमर्थ हो, सही मानों में जैवलिन। साधो अपने आपको।’ महासमर्थ खुद को कुछ साधता है। उसे हैरत है कि दिशा वाहक को उसका भावुक होना, द्रवित होना कैसे पता चल रहा है। जब वह झाड़ी में चिड़िया का घोंसला रख रहा था, तब तो वहां कोई नहीं था।
दिशा वाहक ने महासमर्थ को फिर भौंचक किया।
‘चौंको मत महासमर्थ। मैं दिशा वाहक हूं। सब दिशाओं की हवा को यहीं से सूंघ सकता हूं।’
बात कहते-कहते दिशा वाहक हंसा। जैवलिन ने भी हंसने की कोशिश की।
अनायास दिशा वाहक के मुंह से निकला, शायद यह स्वगत संवाद था।
‘सर्वोच्च को अब गोकुल टोला जीतना है….’
‘गोकुल टोला, झंझरिया के पास वाला…’
‘हूं.. लेकिन जाने दो, उस ओर अपना दिमाग अभी मत दौड़ाओ।’
‘वहां तो सुजान जुलाहे….’
‘चोप्प… भाड़ में गया सुजान जुलाहा। वो तेरा बाप लगता है क्या?’
दिशा वाहक का स्वर अचानक तेज हो उठा था। महासमर्थ की नजरें झुकी हुई थीं, फिर भी उसने जरा सिर उठा कर दिशा वाहक का चेहरा देखा। उसकी आंखें सुर्ख लाल हो आई थीं और चेहरे पर एक भयानक सा भाव ठहरा हुआ था।
कुछ देर वहां स्तब्धता पसरी रही।
फिर दिशा वाहक उठा और भीतर चला गया। बाहर आने में उसे कुछ समय लगा। इस बीच उसका नौकर एक ट्रॉली में चाय और कुकीज ले कर आ गया। ट्रे में दो खूबसूरत कप रखे थे। दिशा वाहक बाहर आया तो वह सहज हो चुका था।
‘लो चाय पियो।’
चाय की चुस्की के साथ मुस्काते हुए दिशा वाहक ने सवाल किया, ‘गांव कब से नहीं गए हो…?’
‘छह महीने से ऊपर हुआ।’
‘तो गांव हो आओ। सर्वोच्च को कोई काम देना होगा तो बुला लेगा। मेरी बात उससे होगी तो मैं बता दूंगा। तुम तो जानते हो, कोई भी खुद सर्वोच्च से कोई बात नहीं कर सकता, उस तक पहुंच नहीं सकता। मैं भी नहीं। मुझे बुलाएगा तो मैं उसे तुम्हारे गांव जाने की खबर दे दूंगा। लगता नहीं कि अभी महीने भर उसके पास कोई ‘निशाना’ होगा।
तुम्हारे पास समय भी है और रकम भी, और क्या चाहिए?’
खुश हो गया महासमर्थ। गोकुल टोला प्रसंग से उठी दिशा वाहक की दहाड़ भूल गया। गांव की सुख बयार उसके भीतर हिलोरें लेने लगी।
दिशा वाहक की गाड़ी ने महासमर्थ को फिर उसी पेड़ के पास पहुंचा दिया। महासमर्थ ने सहायक को फोन करके बुला लिया था कि वह उसकी गाड़ी ले कर आ जाए।
इस बीच महासमर्थ उठ कर कब्रों से भरे मैदान की ओर बढ़ चला। सत्तावन कब्रों में, हरेक में तीन लाशें। एक सौ इकहत्तर उनमें समा गए। दुधवारी में कुल दो सौ बावन लोग निपटाए गए थे। बाकी बचे इक्यासी लोगों के लिए बयालीस कब्रें बनीं। अरे, यहां तो एक कब्र खाली भी है। वह अचंभित हुआ, फिर सहज होने लगा। कब्रों के बीज तो उसी ने बोये थे।
हंसा महासमर्थ। यानी उसके काम का रास्ता अभी बना हुआ है।
सहायक गाड़ी ले कर आया। महासमर्थ ने उसे उसकी पोटली थमाई। उसने उसे माथे से लगा कर महासमर्थ के पैर छुए। भावुक तो हो ही रहा था महासमर्थ, उसने सहायक को उठा कर भर आवेग गले लगा लिया।
‘गांव जा रहे हैं महासमर्थ?’ सहायक ने हंसते हुए कहा। ‘ठीक भी है, थोड़ा घर परिवार से भी मिलना-जुलना जरूरी है।’
भीतर से गदगद था महासमर्थ। उसके पास विस्मित होने का समय नहीं था।
महीना भर अपने गांव में सुख आनंद लूट कर महासमर्थ वास लौटा। इस बीच सर्वोच्च की ओर से उसे कोई ‘निशाना’ सौंपते हुए बुलाहट नहीं हुई। अलबत्ता, दिशा वाहक ने उसका हालचाल पूछते हुए, उसे फोन जरूर किया।
वापसी के बाद तीसरे दिन सहायक महासमर्थ से मिलने पहुंचा। महासमर्थ काम से खाली था। गांव से लौटने के बाद जरूरी था कि वह काम की आबोहवा में सांस लेना शुरू करे। अनायास ही उसने सहायक से कहा, ‘चलो, उस घने ठिगने पेड़ के नीचे की हवा खा कर आते हैं।’
सहायक को यह प्रस्ताव अनुकूल लगा। उसकी मन:स्थिति में हलचल मची हुई थी। सर्वोच्च ने उसे गोकुल टोला का ‘निशाना’ सौंपा था। दिशा वाहक ने उसे योजना विस्तार से समझा दी थी, और यह भी कि इसमें महासमर्थ की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए।
सहायक के लिए यह रोमांच का अवसर था। सर्वोच्च की ओर से उसे पहला काम सौंपा गया था और वह पल-पल दिशा वाहक की ओर से इशारे के इंतजार में था।
गोकुल टोला… सहायक बार-बार सोच रहा था कि उसे यह नाम बहुत जाना पहचाना क्यों लग रहा है। खैर, यह कोई बहुत प्रबल जिज्ञासा नहीं थी।
महासमर्थ और सहायक उस पेड़ के नीचे पहुंचे। ढलती शाम का समय था। मंद-मंद हवा शीतलता देने वाली थी। पेड़ पर चिड़ियों की चहचहाहट अपना अलग संगीत रच रही थी।
अकस्मात महासमर्थ उस झाड़ी की ओर बढ़ चले जिधर उन्होंने उस दिन चिड़िया का पेड़ से गिरा हुआ घोंसला संजोया था। हालांकि, इस बीच बहुत समय बीत चुका था, फिर भी महासमर्थ की उत्सुकता सघन थी।
महासमर्थ उस झाड़ी के पास, उसके भीतर झांकते हुए, वह ठौर ढूंढ़ रहे थे जहां उन्होंने वह घोंसला रखा था। तभी, एक जहर बुझा तीर सनसनाता हुआ आया और महासमर्थ की गर्दन में धंस गया।
जमीन से पैतीस डिग्री का कोण बनाता जैवलिन धीरे-धीरे झुकता चला गया और फिर जमींदोज हो गया। मैदान में एक कब्र पहले से ही उसका इंतजार कर रही थी। उसके कब्र के बीज भी तो उसी ने बोए थे। ०…
