राकेश भारतीय

यह संयोग ही था कि उस स्कूल में मेरी बिटिया की इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा का केंद्र पड़ा, जहां भव्य भवन के पचास फिट दाएं या बाएं कोई और भवन नहीं था, भवन क्या, सड़क तक पर दुकान सजाए कोई चायवाला नहीं था। पार्क भी नहीं था, बस स्टॉप भी नहीं था।… तीन घंटे समय गुजारूं तो गुजारूं कहां, यह सोचते-सोचते मैं सड़क पर एक दिशा पकड़ कर चलता चला जा रहा था, चलता चला जा रहा था कि ढाई-तीन सौ फिट चलने के बाद उस छोटे-से शॉपिंग कॉम्प्लेक्स पर मेरी नजर पड़ गई।
खुश होकर मैं उस कॉम्प्लेक्स की ओर बढ़ा, जो शायद और आगे नजर आ रहे दड़बेनुमा फ्लैटों के निवासियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए अस्तित्व में आया होगा।
खस्ताहाल से कॉम्प्लेक्स की एक परिक्रमा ही करते हुए संयोग से मुझे अपने खुश्क हो रहे गले को तर करने में समर्थ एक चायवाला दिख गया।
वहां अधिकतर दुकानें बंद ही दिख रही थीं। चार-पांच औरतें सब्जी सजाई हुई एक दुकान पर जमीं थीं और दूसरा एक दुकानदार दूध के पैकेट की के्रट ढंग से न रखने पर अपने किशोर नौकर को गरिया रहा था। आदमजाद की विरल ही उपस्थिति पाकर मैंने अंदाजा लगाया कि या तो इन फ्लैटों में रिहाइश ही कम होंगी या यह शॉपिंग कॉम्प्लेक्स भी भूमंडलीकरण के निशाने पर आ गया होगा।
बहरहाल, मैं तेज-तेज कदमों से चायवाले की ओर बढ़ा।
मुझमें एक अदद संभावित ग्राहक देख कर शायद वह चायवाला भी उतना ही खुश हुआ, जितना मैं उसकी यहां उपस्थिति पाकर हुआ था।
तत्परता से उसने एक पुराना स्टूल आगे सरकाया और कहा- ‘बैठिए, साहब।’
किंचित करियाया हुआ भगोना, पुरानी चायपत्ती से भरी हुई छन्नी, मंडराने में एक-दूसरे से होड़ लगा रही मक्खियां; सब बारी-बारी से निहार लेने के बाद मैंने मन ही मन सोचा- ‘चाय पीने की तलब लगी है, तो इन सबको नजरंदाज करना ही होगा।’
और मैंने उस चायवाले से कहा- ‘भाई, एक चाय पिलाओ।’
भगोने में एक चाय की नाप से पानी डाल कर उसने स्टोव पर चढ़ाते-चढ़ाते पूछा-
‘चीनी कम या ठीक-ठाक।’

‘कम मतलब!’
‘आधा चम्मच।’
‘तो कम वाली ही बनाओ।’ कह कर मैं अपने चारों ओर नजरें दौड़ाने लगा।
इस बीच दाहिनी तरफ एक और दुकान खुल गई दिखी। दूर से यह तो नहीं दिखा कि दुकान है किस चीज की, पर दुकानदार लग रहा आदमी अंदर से लाकर बाहर कुछ सामान सजाता हुआ जरूर दिख रहा था।
‘साहब, चाय!’
चाय का गिलास थामते हुए मैंने देखा कि साथ फांकने-कुतरने के लिए नमकीन-बिस्किट जैसी कोई सामग्री उसके पास नहीं है। फिर भी मैंने पूछ ही लिया- ‘कुछ बिस्किट-नमकीन वगैरह नहीं रखते क्या?’
‘खपत नहीं है, साहब।’ चायवाले ने इतना कह कर सॉसपैन में बची हुई थोड़ी-सी चाय एक गिलास में अपने लिए डाल ली।
चाय वाकई अच्छी बनी थी। शायद मेरे लिए उसने ताजा पत्ती का प्रयोग किया था और दूध भी सही था। मैंने घड़ी देख कर निश्चय किया कि ऐसी कम से कम दो चाय तीस-चालीस मिनट के अंतराल पर पी लूंगा, इंतजार का दो-तिहाई समय ऐसे ही कट जाएगा।
‘आप साहब पहली बार दिखे इधर।’ चायवाले ने कहा।
‘हां, पहली बार ही इधर आया हूं।’
‘अंगरेजी वाले स्कूल के काम से?’
‘हां।’ मुझे उसकी सहज-बुद्धि प्रशंसनीय लगी।
‘यहां दो स्कूल हैं, एक अंगरेजी वाला और एक हिंदी वाला। अंगरेजी वाला इस इलाके में अभी जोर नहीं पकड़ पाया है, आज जैसा परिच्छा-वरिच्छा होता है तभी रौनक लगती है। मेरा बेटा हिंदी वाले स्कूल में पढ़ता है।…’
चायवाला अपनी रौ में कहे जा रहा था कि मेरी दृष्टि में एक बंद शटर के सामने सीढ़ियों पर बैठा एक आदमी अटक गया। आते समय तो यह नजर नहीं आया था, शायद अभी-अभी आकर बैठा होगा। जमीन से ऊपर कॉम्प्लेक्स की दुकानों तक जा रही तीन-चार सीढ़ियों की सबसे ऊपर वाली सीढ़ी पर बैठे उस आदमी के चेहरे पर छाई हुई निराशा यहीं से मुझे दिख रही थी। और उस पर नजर अटकाए-अटकाए मुझे उसका दाहिना हाथ भी दिखा, जो रह-रह कर ऊपर जाता था और फिर उसकी दाहिनी जांघ पर आ गिरता था।
अच्छी बनी चाय की चुस्की लेते हुए मैं उसकी ओर ही देखता रहा। समय बिताने के एक तरीके के रूप में नहीं, बल्कि यहां से भी स्पष्ट दिख जा रही उसके चेहरे की उदासी की वजह से।

शायद उसके अदंर उमड़-घुमड़ रही किसी बेचैनी से ताल मिला कर, उसका दाहिना हाथ रह-रह कर वैसे ही उसकी दाहिनी जांघ पर आ गिरता था।
चाय खत्म कर मैंने चायवाले से कहा- ‘अभी और चाय पिऊंगा, थोड़ी देर बाद। अच्छी चाय पिलाई तुमने।’
‘पीजिए पीजिए, साहब। चाय पिलाने के लिए ही यहां बैठा हूं।’ उसने मुस्कुरा कर कहा।
मैं फिर उस आदमी को देखने लगा। उसकी अपरिवर्तित चल रही भंगिमा ही मुझे उसकी ओर नजरें टिकाने की उत्प्रेरक थी।
दस-बारह मिनट ऐसे ही बीत गए, तो मैंने चायवाले से कहा- ‘एक और चाय पिलाओ, पांच मिनट ठहर कर।’
‘जी, बिलकुल।’
मैंने घड़ी देखी, तो तसल्ली हुई कि इंतजार की अवधि का सवा घंटा गुजर चुका है। दूसरी चाय खत्म करते-करते दो घंटे ही हो जाएंगे और तब मैं वापस स्कूल की ओर चल पड़ूंगा, मैंने सोचा।
चायवाले ने चाय का दूसरा गिलास पकड़ाया और मेरी नजरें फिर उसी आदमी की ओर टिक गर्इं। उसकी भंगिमा इतनी देर से अपरिवर्तित बनी हुई थी कि रह-रह कर उसका हाथ उठता-गिरता नहीं, तो उसे बुत ही समझ लिया जाता।
‘बिसेसर को देख रहे हैं?’ चायवाले ने अचानक ही मुझसे पूछा।
ओह! तो इतनी देर से उसकी ओर ही नजरें गड़ाए रहना इस चायवाले की निगाह में भी था!
‘तो उसका नाम बिसेसर है?’ मैंने कहा।
‘हां। दुखी आत्मा है वह।’ चायवाले ने लापरवाही से कहा।
‘पर वह करीब डेढ़ घंटे से वहां वैसे ही उदास-उदास सा बैठा दिख रहा है। आखिर क्या…
‘वह वहां सूरज डूबने तक ऐसे ही बैठा रहेगा। बीस दिन से तो मैं ही देख रहा हूं। बीच में बस एक बार पेसाब-फेसाब करने उठे तो उठे।’ मेरी बात के बीच में ही वह बोला।
‘पर क्यों?’

‘क्योंकि जिस दुकान के सामने वह बैठा है, उसका मालिक सात महीने की तनख्वाह दबा कर बैठा है। तीन महीने से वह दुकान बंद पड़ी है। मालिक पता नहीं कहां लापता है, पर कहीं से बिसेसर को पता चला है कि वह सामान समेटने आने वाला है। और तभी से वह हर रोज इसी टाइम उसी जगह आकर बैठ जाता है।’
‘हर रोज सुबह से शाम उसी जगह उतनी देर बैठा रहता है!’ अविश्वास से मेरा मुंह खुल गया।
‘हां, साहब। आठ साल काम किया है उस दुकान पर और तबसे उसे मैं जानता हूं। सच्चा और सीधा आदमी है बिसेसर। गरीब आदमी की सात महीने की तनख्वाह अटक जाए तो उसका दिमाग हिल ही जाएगा। हम कई बार समझाए भी, पर बिसेसर के दिमाग में बैठा है कि मालिक जहां उसे दिखेगा, वह वहीं उसे चांप कर तनख्वाह ले लेगा। मैं तो डरता हूं कि कहीं कोई बवाल हो जाए तो यह बेचारा गरीब आदमी बड़ी मुसीबत में न फंस-फंसा जाए। छोटे-छोटे बच्चे हैं इसके गांव में।…’
मैं चायवाले की बात सुन भी रहा था और बात के केंद्र में बने हुए आदमी को देखे भी जा रहा था।
बीस दिन से हर रोज सुबह से शाम तक उसी जगह उसी भंगिमा में इंतजार करता हुआ!
विश्वास करना मुश्किल था, पर आखिरकार पिछले डेढ़-दो घंटों से तो मैं भी उसी जगह उसी भंगिमा में उसके इंतजार करते रहने का गवाह था।
चाय मेरी कब की खत्म हो चुकी थी। घड़ी देखने पर अहसास हुआ कि बिटिया की प्रवेश परीक्षा समाप्त होने तक का मेरा इंतजार खत्म ही हुआ चाहता है। अभी यहां से उठूंगा तो आराम से चलते-चलते उस स्कूल तक पहुंच ही जाऊंगा समय से।
मैं उठा। चायवाले से चाय का दाम पूछ कर उसे रुपया थमाया और अच्छी चाय पिलाने के लिए धन्यवाद भी दिया।
अपनी दिशा में आगे बढ़ने से पहले मैंने एक आखिरी नजर उस दिशा में डाली, जहां सात महीने की तनख्वाह मिल जाने का इंतजार करता हुआ वह बैठा था।
वह उस जगह पर उसी भंगिमा में यथावत था और उसका दाहिना हाथ धीरे-धीरे ऊपर उठता हुआ दिख रहा था। ०