किशोरावस्था में बच्चों के भीतर बहुत तेजी से अनेक तरह के बदलाव होते हैं। इसके चलते उनके व्यवहार में भी बदलाव लक्षित होता है। इस नाजुक दौर में बच्चों को सबसे अधिक संभालने, प्यार देने की जरूरत होती है। आज के भाग-दौड़ भरे महानगरीय जीवन में कामकाजी माता-पिता के सामने किशोरावस्था में पहुंचे बच्चों को संभालना खासा कठिन काम होता है। किशोरों का लालन-पालन कैसे करें, पेश हैं रवि डे के सुझाव।
किशोरावस्था जीवन का बहुत नाजुक दौर होता है। इस अवस्था में इतनी तेजी से शरीर के भीतर रासायनिक और मानसिक बदलाव होते हैं कि उसके व्यवहार में चिड़चिड़ापन, जल्दबाजी, अवसादग्रस्तता आदि दिखाई देने लगते हैं। ऐसे में अक्सर बच्चे माता-पिता से उलझते, उनकी बातों को अनसुना करते या फिर जिद पर अड़ते देखे जाते हैं। अगर इस अवस्था में बच्चे को ठीक से न संभाला जाए, तो उसके विकास में मुश्किलें पैदा होती हैं। अच्छे माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों के किशोरावस्था में पहुंचने पर उनका खास ध्यान रखें। अगर कुछ बातों का खयाल रखा जाए तो बच्चे का अच्छा लालन-पालन हो जाता है। किशोरावस्था में बच्चे की जिंदगी रोज बदल रही होती है। मगर बहुत-से माता-पिता उनके भीतर के उन बदलावों को ठीक से देख और समझ नहीं पाते। बुजुर्ग इसे कुछ अधिक ठीक से समझ पाते हैं। इसकी वजह है कि किशोरावस्था में बच्चा धीरे-धीरे अपने हारमोन के वश में आता है। जबकि बुढ़ापे में व्यक्ति हारमोन्स के नियंत्रण से बाहर निकलने लगता है। इसलिए बुजुर्ग लोग किशोरों की मानसिकता को थोड़ा समझ पाते हैं। मगर मध्य आयु के लोगों को किशोरों की मानसिकता के बारे में अधिक जानकारी नहीं होती।
वैसे भी अधिकतर माता-पिता अपने कामकाज में इस कदर उलझे रहते हैं, अपने ही कामों के तनाव से इस कदर ग्रस्त रहते हैं कि उन्हें अपने बच्चे में किशोरावस्था में हो रहे बदलावों की तरफ ध्यान देने का वक्त ही नहीं मिलता। इसी वजह से अक्सर माता-पिता और किशोरों के बीच तकरार की स्थिति बनी रहती है। किशोरावस्था के कई पहलू होते हैं। एक, उनकी प्रतिभा हारमोनों द्वारा संचालित होने लगती है। अचानक उनको पूरी दुनिया काफी अलग-सी नजर आने लगती है। वे लिंग-भेद के प्रति अधिक सचेत हो उठते हैं। यह अपने आप में एक बड़ा बदलाव है। माता-पिता को यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि किशोरों के लिए यह स्थिति नई है और वे उससे तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में उनके अच्छे दोस्त बन कर उनकी समस्याओं को समझ और सुलझा सकते हैं।
मगर अधिकतर माता-पिता अपने बच्चों के दोस्त नहीं बन पाते। उन्हें अनुशासित करने के लिए डांट-फटकार लगाते रहते हैं। इसलिए किशोर अपने लिए दूसरे दोस्त बनाते हैं। चूंकि उनके दोस्त भी उसी अवस्था और मानसिकता से गुजर रहे होते हैं, इसलिए वे उनको बेतुकी सलाह ही देते हैं। बेहतर स्थिति तो यह है कि अगर उन्हें कोई समस्या है तो वे आपके पास आएं। इसलिए माता-पिता की पूरी कोशिश होनी चाहिए कि कम उम्र से ही उनके सबसे अच्छे दोस्त बनें और कम से कम तब तक बने रहें जब तक वे अठारह से बीस साल के न हो जाएं। आप अपने किशोरों से निबटने की कोशिश न करें, बल्कि खुद को उनके लिए हमेशा उपलब्ध रखें। उन्हें हर चीज या काम के लिए जिम्मेदार बनाएं। घर के कुछ काम उनके जिम्मे डाल दें। कभी ऐसा भी कर सकते हैं कि उन्हें घर के जरूरी सामान वगैरह जुटाने और उनका हिसाब-किताब रखने की जिम्मेदारी सौंप दें। कभी ऐसा भी कर सकते हैं कि घर के पूरे महीने के खर्च का पैसा उन्हें सौंप दें और कहें कि तुम्हें इसी में पूरा घर चलाना है। इस तरह बच्चा न सिर्फ सही ढंग से पैसा खर्च करना सीखता है, बल्कि उसे रोजमर्रा की जरूरतों का अहसास भी होता है। ऐसा नहीं कि बच्चा जब जितना पैसा मांगे उसे दे दें और वह अपने दोस्तों के बीच शेखी बघारता फिरे और अतार्किक ढंग से बाजार की चमक-दमक में खो जाए।
अगर आप वाकई अपने बच्चे के साथ कुछ करना चाहते हैं तो आपको उन्हें अपने विस्तार का मौका देना चाहिए, क्योंकि यही तो वे भी करने की कोशिश कर रहे हैं। अगर आप इस विस्तार को रोकने की कोशिश करेंगे तो आपको बहुत ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ेगा। अगर आपको बेटा है तो आपकी समस्या एक तरह की होगी, लेकिन अगर आपकी बेटी है तो आपको दूसरी तरह की समस्या का सामना करना पड़ेगा। जब बच्चे छोटे होते हैं, तो वे असहाय होते हैं, हर चीज के लिए माता-पिता की तरफ देखते हैं। इस तरह माता-पिता को लगता है कि वह उनके ऊपर निर्भर है और वे सुख पाते हैं। मगर जब बच्चा किशोरावस्था में पहुंचता है और आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करता है, माता-पिता से उसकी अपेक्षाएं बदल जाती हैं, तब अक्सर माता-पिता अपने बचपन और अपने जमाने के हवाले देकर उन्हें हर समय कुछ न कुछ सीख दिया करते हैं। इससे बच्चे को उलझन होती है। वह चिड़चिड़ा होता है और माता-पिता से दूरी बना कर रहने लगता है। फिर होता यह है कि अक्सर माता-पिता उसमें बुराइयां निकालना शुरू कर देते हैं। यहां तक कि रिस्तेदारों और बच्चे के दोस्तों के सामने भी उसकी बुराइयां बताने लगते हैं। दूसरे बच्चों से उसकी तुलना करने लगते हैं। ऐसा करने से बचें। जब वही छोटा था और आप पर निर्भर था, तब तो आप बहुत खुश रहते थे, पर जब उसमें विकास हो रहा है, वह जिम्मेदारियां वहन करने की शक्ति अर्जित करना चाहता है, तो आप उसे नाकारा क्यों समझने लगते हैं।
अक्सर माता-पिता बच्चों को नादान ही समझते हैं। मगर हकीकत यह है कि किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते बच्चा काफी दुनियादार हो चुका होता है। वह अपने समय को अपने नजरिए से देखने लगता है। इसलिए जब भी घर की किसी समस्या पर विचार करें, तो किशोर बच्चे को भी उसमें जरूर शामिल करें। उसकी राय लें। कई बार आप हैरान हो सकते हैं कि जिस समस्या को आप बहुत बड़ी समझ रहे थे, उसका हल वह चुटकी बजाते पेश कर देता है।
घरेलू समस्याओं में किशोरों को शामिल करने के दो लाभ हैं। एक तो यह कि वह घर की वस्तु स्थिति से वाकिफ होता है, उसके अंदर आने वाले समय में ऐसी समस्याओं का सामना करने की क्षमता विकसित होती है। दूसरे, कि वह माता-पिता के कुछ अधिक करीब आ जाता है। अगर आप सचमुच अपने बच्चों के बेहतर विकास को लेकर संजीदा हैं तो सबसे पहले आपको अपने व्यवहार, बोली, काम करने के तरीके या आदतों में सुधार लाने का प्रयास करना चाहिए। बच्चा आपको देख कर ही बहुत कुछ सीखता है, इसलिए जब आप उसे किसी चीज को करने से मना करते हैं और फिर खुद वही करते हैं तो उसका आपकी बातों, आपकी सीख, आपके आचरण पर से भरोसा कमजोर होता है।
ऐसा न करें कि अपने कारोबार, नौकरी आदि का तनाव घर लेकर आएं और अपनी उलझनों, झुंझलाहटों को बच्चों पर उतारें। पत्नी या पति से किसी मसले पर बात करते हुए अगर मतभेद हो तो बच्चों के सामने न लड़ने-झगड़ने लगें। इससे बच्चों में माता-पिता के प्रति दुराग्रह पैदा होता है। कईआ माता-पिता अपनी कामकाजी उलझनों की वजह से बच्चों पर पयाप्त ध्यान देने के बजाय समझ लेते हैं कि उनकी जरूरतें पूरी होती रहें तो उन्हें प्यार भी मिल जाता है। इसलिए वे उनकी अनुचित मांगों को भी मान लेते हैं। ऐसे में किसोर बच्चे माता-पिता की इस कमजोरी का पायदा उठाना शुरू कर देते हैं और वे दबाव बना कर अपनी मांगें पूरी कराने लगते हैं। इसलिए उन्हें पैसे के बजाय प्यार दें तो वह उसके विकास में ज्यादा कारगर साबित होगा। उनके साथ बैठ कर बातें करने का समय जरूर निकालें। १

