रामदरश मिश्र

उस दिन नंदकिशोर कितना प्रशन्न हुए थे, जिस दिन उनका पुत्र समीर स्टेट्स गया था। प्रसन्न होकर कहते रहे कि उनका बेटा इंजीनियर होकर स्टेट्स गया है। इस देश में क्या रखा है? नौकरी के लिए इधर-उधर ठोकर खाते फिरो, वेतन भी कितना कम होता है। यहां आॅफिस में सौ लफड़े हैं। सोचते रहे- ‘मैं भी एक आॅफिस में क्लर्क हूं। क्या पा लिया? एक घर भी तो नहीं बनवा सका। पत्नी के लिए कभी कोई बढ़िया साड़ी नहीं खरीद सका, गहनों की तो बात ही जाने दो। हां, तिकड़मी क्लर्क रहा होता तो अवश्य कुछ हासिल हुआ होता।’
लेकिन मां शारदा कहती रहीं- ‘समीर इकलौता बेटा है, वह चला जाएगा तो घर कितना उदास हो जाएगा। यहीं कहीं उसे काम करने दीजिए। पैसे कम मिलेंगे तो क्या हुआ, आंख के सामने तो रहेगा।’  नंदकिशोर कहते रहे- ‘तुम नहीं जानती भागमान कि उसका स्टेट्स जाना हमारे लिए कितने गौरव की बात है। वहां से खूब रुपए भेजेगा तो तुम्हारी सारी उदासी दूर हो जाएगी। वह कभी-कभी आता रहेगा, यह वादा उसने किया है।’  शारदा सब कुछ सुन लेती, किंतु मां का हृदय भीतर-भीतर तड़पता रहता।

समीर ने स्टेट्स में नई दुनिया देखी। चमत्कृत हो उठा। शुरू में घर की याद आती रही और वह हर सप्ताह घर फोन करता रहा। धीरे-धीरे उसने घर बहुत-से रुपए भेजे। उन रुपयों से नंदकिशोर ने मकान बनवा लिया और शारदा के लिए काफी कुछ खरीदा। वे शारदा से बोले- ‘देखी स्टेट्स की कमाई।’ शारदा मुस्करा कर रह गईं, किंतु उनका हृदय सदा समीर समीर कहा करता था। धीरे-धीरे समीर को स्टेट्स भाने लगा। ज्यों-ज्यों स्टेट्स भाने लगा त्यों-त्यों घर और देश की याद की पीड़ा कम होने लगी। अब घर पैसा भेजने की उत्सुकता भी मंद पड़ती गई। समय बीतता गया। नंदकिशोर का समीर-गर्व हल्का पड़ता गया। शारदा की उदासी घनीभूत होती गई। बहुत दिनों बाद समीर का फोन आया तो शारदा ने कहा- ‘बेटा, बहुत दिन हो गए तुम्हें देखे हुए। एक बार आ जाओ। कोई लड़की पसंद करके शादी कर लो। कब तक कुंआरे रहोगे?’ ‘छोड़ो मां शादी की बातें।’  ‘क्यों छोड़ दूं बेटा। मेरी भी इच्छा होती है कि बहू आए, उसकी गोद भरे, बच्चे के साथ खेलती हुई मैं भी बच्चा बन जाऊं।’

‘मां, तुम्हारी एक इच्छा तो पूरी कर दी है।’
‘यानी!’
‘मैंने शादी कर ली है, एक अंगरेज लड़की से।’
‘हे राम, तूने यह क्या किया बेटा?’
‘मां, तुम लोग पिछले समय में जी रहे हो। समय बहुत बदल गया है।’
‘हां बेटा, तुम ठीक कह रहे हो।’

नंदकिशोर को नौकरी से अवकाश प्राप्त हो गया। अब घर में पति-पत्नी एक-दूसरे का सहारा बन कर जीने लगे। शारदा रह-रह कर समीर की चर्चा छेड़ देती। कभी-कभी रोष के साथ नंदकिशोर से कहती- ‘तुम्हीं ने उसे स्टेट्स भेजा है। वहां जाकर वह पराया हो गया।’ नंदकिशोर चुपचाप सुन लेते और कभी-कभार ऊब कर कहते- ‘मत चलाया करो चर्चा उस नालायक की।’  पता नहीं बेटे की चिंता से या यों ही एक दिन नंदकिशोर को हल्का-सा हृदयाघात हो गया। चिंता बढ़ गई कि पता नहीं आगे क्या होगा। बुरे दिन आते हैं तो एक साथ कई आते हैं। एक दिन शारदा को लकवा मार गया। अंग तो निर्जीव हो ही गए, आवाज भी चली गई। चलना-फिरना कठिन हो गया। मन की पीड़ा ने तन की पीड़ा को और गहरा कर दिया। दिन-रात समीर आंखों में नाचता रहता। आवाज बंद होने से वे मन की पीड़ा किसी से कह भी नहीं सकती थीं। नंदकिशोर शारदा की आंखों की भाषा समझते थे। आंखों से आंखें बात कर लेती थीं। घर का काम तो कामवाली कर देती थी, पर खाना नंदकिशोर ही बनाते ते। वे शारदा को नहलाते-धुलाते थे और आवश्यक जगहों पर उठा कर ले जाते थे।
यों ही सब कुछ चलता रहा। दोनों के कमरे अलग-अलग थे। नंदकिशोर सोने में जोर-जोर से खर्राटे भरते थे। उनके खर्रांटे से शारदा की नींद टूट न जाए, यह सोच कर वे दूसरे कमरे में सोते थे।

रोज सुबह को नंदकिशोर चाय लेकर शारदा के पास जाते थे। उस दिन नंदकिशोर प्रात: काल शारदा के पास नहीं आए। शारदा समझीं कि देर से नींद आई होगी। अभी सो रहे होंगे। जब दस बज गए तब शारदा चिंतित हो उठीं। पुकार सकती नहीं थीं, इसलिए हाथ के बल घिसटती हुई किसी प्रकार नंदकिशोर के पास आर्इं। वे अब भी खाट पर पसरे हुए थे। शारदा ने उनका शरीर छुआ। शरीर ठंडा पड़ा हुआ था। उन्होंने पड़ोसी के लिए अपना फोन घुमाया और नंदकिशोर के सिर पर अपना सिर टेक दिया। पड़ोसी ने नंबर देखा तो समझ गए कि यह फोन मूक शारदा ने किया है। वे झट से नंदकिशोर के यहां पहुंचे। किवाड़ थपथपाने लगे, आवाज देने लगे, किंतु भीतर कोई आहट नहीं हुई। और लोग भी जुट आए। पुलिस की उपस्थिति में किवाड़ तोड़ा गया तो लोगों ने देखा कि दोनों साथ-साथ अमरलोक चले गए हैं। लोग सोचने लगे कि समीर को फोन करना चाहिए, किंतु समीर का फोन नंबर कहां पाया जाए। पड़ोसी ने देका कि नंदकिशोर की खाट के पास रखें टेबुल पर टेलीफोन नंबर वाली डायरी पड़ी है। शायद उसमें समीर का नंबर हो। नंबर मिल गया। समीर को फोन किया गया। वह दो दिन बाद आया। मां-बाप की लाश उसी तरह पड़ी हुई थी। उसे लगा कि मां कह रही है- ‘तुम आ गए बेटा, लेकिन बहुत देर कर दी।’