प्रमोद कुमार दुबे

आधुनिकता के प्रभाव और नया रचने की होड़ में अगर सबसे अधिक नुकसान किसी चीज का हुआ है, तो हमारी लोक संस्कृति का। इस होड़ में हमारी लोककलाएं और लोक साहित्य कहीं हाशिए पर डाल दिए गए हैं या उनका कोई महत्त्व नहीं रह गया है। जबकि सच्चाई यह है कि लोक कलाओं और लोक साहित्य पर हमारी पूरी संस्कृति टिकी हुई है। सवाल है कि क्या हम अपनी लोककलाओं और लोक-संस्कृति को नजरअंदाज कर भारतीय संस्कृति की मुकम्मल तस्वीर पेश कर सकते हैं। उसे पूरी तरह जान-समझ सकते हैं, उस पर अधिकार के साथ बात कर सकते हैं। उत्तर है, नहीं। दरअसल, हमारी लोक-संस्कृति दर्पण है, हमारी आधुनिक संस्कृति की। लोक-संस्कृति में तमाम आधुनिक कलाओं, साहित्य और संस्कृति के उपादानों के तत्त्व छिपे हुए हैं। जैसे-जैसे हम पीछे जाते हैं, इससे विश्व संस्कृति के रिश्ते भी स्पष्ट होते जाते हैं। लोककलाओं से आधुनिक भारतीय कलाओं का पता मिलता है। यह अलग बात है कि आधुनिक तत्त्वों को ग्रहण करते हुए हमारे कुछ कलाकारों ने लोककलाओं को सायास प्रयोग में शामिल किया, तो कुछ ने मात्र अनुकरण के आधार पर, इसके सैद्धांतिक पक्षों को समझे बिना, इसे अपनी कला का हिस्सा बनाया। लोककलाओं को पहचान मिलने लगी, प्रश्रय मिलना शुरू हुआ तो उनके सिद्धांतों के अनेक पक्ष उजागर होते गए। आदिवासी कला के अनेक प्रमाण अब हमारे सामने हैं। जनगढ़ सिंह श्याम जैसे कलाकारों ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा पाई।

हालांकि अनेक कलाकारों ने लोककलाओं से तत्त्व ग्रहण करते हुए उन्हें शास्त्रीय आयाम दिए। सैयद हैदर रजा के बिंदु और ज्यामितिक प्रयोग उन्हीं में एक हैं। चित्रकला सिर्फ रंग और रेखाओं का खेल नहीं है। वह एक दर्शन है। जब वह अपनी परंपरा से रस खींचते हुए आधुनिकता में प्रवेश करती है, तो उसका प्रभाव स्थायी होता है। रजा ने आदिवासी कला, वैद्रि कला और लोककलाओं से रस ग्रहण किया और फिर उन्हें आधुनिक संदर्भों से जोड़ते हुए रूपायित किया।
रजा की चित्रकृतियां ऐसी कला-भाषा से रची हुई हैं, जिसमें भारत के प्राचीनतम शैल चित्रों और पुरावशेषों में दिखने वाला स्वस्तिक है, जिसमें वनों-गांवों की कलाओं सहित वैद्रि यज्ञ वेदी की परंपरा दिखाई देती है। बिंदु और वर्ग की युगलबंदी से पैदा होने वाली रेखाओं के दैवीय स्वर हर जगह सुनाई नहीं देते। ये देहाकार में नहीं, रेखाओं के तार में होते हैं। इसीलिए भारतीय कला में रेखाओं को अधिक महत्त्व दिया गया।

बिंदु रेखागणित का शून्य है, जिसका अस्तित्व तो है, लेकिन परिमाण नहीं है और न कोई स्थान। देशकाल रहित इसी अज्ञात सत्ता के विस्तार का नाम सृष्टि है। बिंदु ही चारों दिशा में रेखाओं का विस्तार करता है, तब वह जोड़ के चिह्न (+) की तरह आगे बढ़ स्वस्तिक बन जाता है। स्वस्तिक वर्ग बनता है, वर्ग गतिशील होकर वृत्त। यही ब्रह्म का बृहण है। पर्व-त्योहार के अवसरों पर बनने वाले वनों-गावों की कलाओं के रेखीय आकारों में बिंदु, वर्ग और वृत्त के अवयव देखे जा सकते हैं। लोक कलाएं यज्ञ वेदी से उपजी हैं, इसीलिए इन्हें बनाने का समय वार्षिक कालचक्र में निर्धारित है। जैसे पितृ पक्ष में ही ब्रज की कला सांझी बनाई जाती है। इस कला का बीज है बिंदु और इसकी इकाई स्वस्तिक। स्वस्तिक के विस्तार से वर्गीय आकार बनता है, यही वेदी है। वेद-मंत्रों की ध्वनि तरंगों का रेखीय आकार वेदी है। मंत्र मानसिक ध्वनि है। यही ध्वनि मौखिक बनती है और यही रेखाओं द्वारा वेदी। मूलत: वेदी की रेखाएं मानसिक हैं, इसीलिए वेदी का निर्माण कल्पशास्त्र के अंतर्गत रखा गया है। प्रकृति ब्रह्मा का कल्प है और मानुषी कलाकृतियां मनुष्य कलाकार का कल्प। अविकृत कल्प वर्गाकार है, वेदी है। जब मनुष्य प्रकृति की अनुकूलता में सृजन करता है, उसकी कृति भी वर्गाकार होती है, वेदी होती है। वर्ग का गतिशील रूप वृत्त है, वृत्त का केंद्र बिंदु। यजुर्वेद का मंत्र है- इयं वेदि परो अंत: पृथिव्या अयं यज्ञो भुवनस्य नाभि:। यही वेदी पृथ्वी का अंत है और यही यज्ञमय भुवनों की नाभि है।

वर्ग और वृत्त वेदी के दो रूप हैं, एक स्थिति है, दूसरे में गति। वेदी गतिशील रूप वृत्त की नाभि को यजु:, व्यास को ऋक् और परिधि को साम कहा जाता है। वेदी का एक बहुप्रचलित रूप है- सर्वतोभद्र। इनसे रजा की चित्रकृति की तुलना करने पर सहज संबंध दिखाई देता है। भारतीय कला का मूल चरित्र वर्गाकार है। वनों की कला के वर्गीय आकार से घनवादी कला शैली प्रेरित तो हुई थी, पिकासो ने उसे आगे बढ़ाया, लेकिन जिस वैदिक कला सिद्धांत पर वर्गीय कला आधारित है, वह आधुनिक कला के क्षेत्र में उपस्थित नहीं है। जबकि वह प्राचीन संस्कृतियों में व्याप्त है। यह जान कर विस्मय होता है कि जोड़ के जिस चिह्न (+) से स्वस्तिक का विकास हुआ, वह ब्राह्मी लिपि का ‘क’ वर्ण है, यानी वर्गीय आकार वाली कला में आवाज भी है। यह कला छंद की दृष्टि से अनुष्टुप है, यानी सबका हित करने वाले स्वस्ति के मांगल्य भाव से युक्त है। यही प्रकृतिसंगी सृजन है- प्रोनेचर। आज आधुनिक संत्रासों के शमन के लिए इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। यज्ञ के समान वेदी ही मंगलमय सृजन का एकमात्र आधार है। भारतीय शिल्प और स्थापत्य इसी पर आधारित हैं।

बिंदु कभी अकेला नहीं होता, नाद के साथ ही होता है। रजा की कला में बिंदु है, तो नाद भी अवश्य होगा। नाद, बिंदु और कला क्रमश: हैं। ये तांत्रिक शब्दावलियां हैं। इनका प्रकट रूप वेदी है। नाद का घनीभूत होकर बिंदु बन जाता है। नाद श्रव्य है और बिंदु दृश्य। बिंदु पश्यंती वाक् है। बिंदु ही कला का अचल पद है। यह श्रव्य-दृश्य दोनों है। तंत्र के इन परोक्ष विषयों का मुखर विवेचन वेदी से होता है, क्योंकि वेद प्रत्यक्ष है और तंत्र गुह्य- गुरुमुखी।
आज भी लोक में भित्ति चित्रों के रूप में शास्त्रीय कला के प्रेरणा स्रोत मौजूद हैं। पर्व-त्योहारों पर मांडने बनाने, दीवारों पर चित्र उकेरने, रंगोली बनाने, जिउतिया पर टोनही की आंख बनाने जैसे परंपरागत कला-कर्म लोक का हिस्सा हैं। इसके अलावा मधुबनी, कालीघाट, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र आदि की अपनी लोक-शैलियां हैं। इनमें देखें तो ज्यामितिक रचनाएं होती हैं। इनमें वर्ग, वृत्त और त्रिकोण की बहुलता है। इनसे रस खींच कर शास्त्रीय कलाओं ने काफी कुछ नया रचा-बनाया है। आधुनिकता के मोह में इसे क्षीण नहीं होने देना चाहिए। १