मीरा सीकरी

वह मुंह से महामृत्युंजय मंत्र का जाप कर रही थी, पर उसकी आंखों के सामने लगातार यह इबारत घूम रही थी- उम्रे पीरी (बुढ़ापा) में- सब लोग बच के चलते हैं, इसका भी क्या गिला? गिरती दीवारों से- सब बच के ही निकलते हैं! कभी दांत, कभी आंत और कभी आंखों की समस्याओं से परेशान वह विचलित हो जाती है और भगवान ‘त्रयंबकम्’ से प्रार्थना करने लगती है- ‘हे प्रभु, जीवन यात्रा की इस ढलान पर, अंतिम सांस तक मेरा अंग-प्रत्यंग स्वस्थ रहे, संतुलन बना रहे, मैं आत्मनिर्भर और निर्भय रह सकूं, जड़ता और निष्क्रियता का जीवन नहीं, सार्थक जीवन जी सकूं।’  जब भी वह अस्वस्थ होती है, अकेलापन और असुरक्षा की भावना उसे घेर लेती है। डरपोक मन चिंता और अवसाद में डूब जाता है। मन सोचता है, खालीपन की इस लक्ष्यहीन जिंदगी में उसने अब और क्या हासिल कर लेना है? बिना कष्ट पाए आखिरी सांस निकल जाए- यह उसकी कामना हो सकती है, इसके लिए वह प्रार्थना कर सकती है! पर प्रार्थना वास्तविकता में रूपांतरित हो जाए यह जरूरी तो नहीं?

लोग उसे बहादुर कहते हैं, हर स्थिति में हिम्मत रखने वाली- धैर्यशील। अपनी दिखावटी छवि पर वह रोए या हंसे- बहादुर होने का तो उसने कवच बांधा हुआ है- मात्र एक मुखौटा- ओढ़ा हुआ खोल! आशंकित और असुरक्षित मनस्थिति में उसके सामने आ खड़ी होती है स्कूल की वह लड़की, जो अपनी क्लास की मॉनीटर थी। यह वह समय था, जब स्कूलों में ही कई रोगों के टीके लगा करते थे। अपनी क्लास की लड़कियों की लाइन लगवा कर उन्हें मेडिकल रूम के बाहर खड़ा कर देती। खुद अगुआई करने के लिए सबसे पहले भीतर जाकर होंठों को भींच, टीका लगवा लेती। दर्द की शिकन, दूसरों के सामने आए, इससे पहले ही उससे निपट लेना और हंसते-मुस्कुराते हुए बाहर निकल आना।  बचपन में दर्द को पी जाने का नाटक जीवन की वास्तविकता बन जाएगा, यह तो उसने सोचा भी नहीं था। कहां गई वह आत्मविश्वास से भरी, खिलंदड़ी, सदा उल्लसित, हरफनमौला लड़की, जो खेलखेल में ही हर स्थिति का सामना कर लेती थी। अकेलेपन का चुनाव उसका तो हो नहीं सकता।

उसने तो प्रेम-विवाह किया था- मां-पापा के विरोध करने के बावजूद। यह प्रेम-विवाह ही उसे अकेला कर गया। ब्याह को तीन साल भी नहीं हुए थे कि जीवनसाथी की मोटर साइकिल ट्रक से टकराई और वह डेढ़ साल के बेटे के साथ उसे छोड़ कर चला गया। मां-पापा अपने साथ ले जाने के लिए आए थे, पर उसने साथ जाने से इनकार कर दिया था।  अगर वह पढ़ा न रही होती और बेटा न होता, तो शायद वह पागल हो गई होती, पर घोर डिप्रेशन में तो थी ही। उस समय में जब डिप्रेशन-ग्रस्त व्यक्ति को पागल समझ लिया जाता था, वह बच्चे को साथ लेकर मनोरोग चिकित्सक के पास गई थी। उसका दिया मूलमंत्र था- ‘अपने लिए जिओ, अपने आप से प्यार करो- अपने आप से प्यार किए बिना अपने और अपने को कैसे पाल-पोस सकोगी? सुरक्षा के लिए अगर तुम्हारे कॉलेज में रहने की व्यवस्था हो सकती है, तो वहां शिफ्ट हो जाओ।’ डॉक्टर की दी मंत्रणा को उसने समझ तो लिया था, पर जान नहीं पाई थी कि अपने लिए जीना और अपने से प्यार करना क्या होता है? वैसे जिंदगी से मुंह उसने कभी नहींं मोड़ा- हर स्थिति में उसका सामना किया- पर अब सचमुच वह जीना चाहती थी- अपनी जान के लिए।

अपनी तो उसे परवाह ही नहीं थी- अपने रोग-शोक, हारी-बीमारी, दर्द-पीड़ा से बेखबर वह तो बस सींच रही थी अपने पौधे को- उस पर आते हर नए अंकुर की सार संभार में डूबी। कब वह पौधा पेड़ बन गया, इसका पता उसे तब चला जब सुहासिनी को उसने उसके सामने ला खड़ा किया- ‘मॉम, यह है सुहासिनी, तुम्हारी बहू। इसके मां-बाप के पास जाकर इसे मांग लो, क्योंकि कनाडा में इसने पी-आर के लिए आवेदन दिया हुआ था, वहां से इसे स्वीकृति मिल गई है। इससे पहले कि यह चली जाए…’

उसे जबरर्दस्त धक्का लगा था, पर जिंदगी में जो कुछ सामने आया, उसे स्वीकार करने के अलावा वह और कुछ कर ही क्या सकती थी? बेटा मनचाही जिंदगी जिए, यह वह चाहती थी, पर इसका क्या करे?  जिसके ब्याह की वह खुशी मनाती, वह बेटा उसे यह दिलासा देकर कि ‘गर्मी की छुिट्टयों में आप हमारे पास आएंगी और रिटायर होने पर तो हमारे पास ही रहेंगी’, सुहासिनी के साथ कनाडा चला गया था।  वह बिना बुढ़ाए ही बूढ़ी हो गई थी। अपने भीतर बिल्कुल अकेली। अपने आप को जान-समझ रही थी, इसलिए मनोरोग चिकित्सक के पास जाकर क्या करती? उसकी सहकर्मी जबर्दस्ती उसे आर्ट आॅफ लिविंग के बेसिक कोर्स में ले गई थी।  बेसिक कोर्स के पहले ही दिन, सबसे आपसी परिचय के समय- ‘आई बिलांग टू यू’ कहते हुए मिलना उसे प्रभावित कर गया था। सभी तो अपने हैं, साथ हैं- अकेले कहां हैं वे? उसे अच्छा तो लगा था, पर वह तात्कालिक सच था, वास्तविकता नहीं। उसकी आप सराहना कर सकते हैं, महसूस नहीं। निजी संबंध, रिश्ता, मैत्री, इनको तो दोनों ओर से पोषित करना पड़ता है- गिव ऐंड टेक- लेना और देना, पर मां-बेटे का संबंध तो ऐसा नहीं। वह तो एहसास है- चाहे पास हो या दूर। योग और प्राणायाम भी उसे देहात्म के स्वास्थ्य के लिए ठीक लगे थे। देहात्म का संतुलन बैठ जाए, इतना क्या कम है?
बेटे के प्रति उसके मन में कोई शिकायत नहींं थी, न ही कोई अपेक्षा। सबको अपने ढंग से जीने की स्वतंत्रता मिलनी ही चाहिए! सारी उम्र अपनी व्यवस्था में बिताने के कारण, रिटायर हो जाने के बावजूद वह कनाडा में बेटे के साथ रहने के लिए अपने मन को मना नहीं पाई। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहे वह- उसकी देह यहां होती है और मन की सोच बेटे में। जानती-समझती है कि बेटा अचानक उसके पास नहीं आ सकता, पर अपने मन का क्या करे। बेटे की डील-डौल वाले किसी भी युवक को देख, उसे लगता है जैसे उसका बेटा ही उसके पास आ रहा हो!

अपने को व्यस्त रखने की कोशिश में वह दिन की शुरुआत योग और प्राणायाम से करती है, किताबें तो उसकी साथी हैं ही। देखे या न देखे, धीमी आवाज में दिन भर टीवी चलता रहता है। नाटकों में उसकी रुचि है, पर अकेले उससे जाया नहीं जाता। यात्राओं पर निकल जाती है और अक्सर अपने से पूछती है- मनचाहा खाती हूं, मनचाहा पहनती हूं। मन में जो आए वह करती हूं, क्या इसे ही अपने से प्यार करना कहते हैं? प्यार में अपने को बेखबर होते, सुधबुध खोते तो सुना था, इतना एकाकी होते तो नहीं! तभी घंटी बजने की आवाज उसे अपनी सोच की दुनिया से बाहर ले आई थी। दरवाजा खोलने से पहले उसने बालकनी से झांक कर देखा कि गेट पर कौन है। किसी के दिखाई न देने पर, कांच के दरवाजे को बंद करने से पहले उसने कहा- ‘अगर कोई नीचे है तो गेट से बाहर आ जाइए।’ उसके ऐसा कहते ही, उसने देखा एक शिष्ट-संतुलित-सा दिखता, चेहरे पर मुस्कुराहट के साथ ऊपर की तरफ मुंह किए, अपनी उपस्थिति जताने के लिए अपना हाथ खड़ा कर रहा था। उसके मन में आया- उसकी खोज-खबर लेने के लिए, बेटे का कोई दोस्त या परिचित है? सावधानी बरतते हुए दरवाजा खोलने के लिए आने से पहले उसने पूछा- आप कौन? जवाब में उसके कानों ने ‘एज’ शब्द पकड़ा, जिसको उसने हेल्प के साथ जोड़ लिया।

अपने बचपन में उसने खाकी हाफ पैंट कमीज पहने हाथ में रजिस्टर लिए सेवासमिति वालों को दरवाजा खटखटाते और मां को उन्हें यह कहते सुना था- ‘हमारी जो श्रद्धा होगी, हम आपके यहां खुद पहुंचा देंगे’ और हाथ जोड़ते हुए दरवाजा बंद कर लेती थीं। अपराधों के इस बढ़ते युग में किसी अनजान पर विश्वास करना बहुत मुश्किल हो गया है। सबसे ज्यादा तो बूढ़े ही इनका शिकार बनते हैं। पर इस भद्र और विनम्र से दिखते युवक से क्या कहे कि उसके कानों ने सुना- ‘मैम आप दो मिनट के लिए नीचे आएंगी?’  उसने दरवाजा खोल दिया और उससे कहा था- ऊपर चलो, वहीं बैठ कर तुमसे बात करते हैं। उसे बालकनी में बैठने के लिए कहा था, ताकि सड़क दिखाई देती रहे। वह युवक उसके आत्मविश्वास और निर्भीक व्यवहार से प्रभावित हुआ था या उसको खुश करने के लिए कह रहा था या पूछ रहा था- ‘मैम आप डायरेक्टर हैं?’
‘नहींं नहींं, मैं तो कॉलेज से रिटायर हुई हूं।’
‘ओह, मैम आप बहुत लर्नेड लुक दे रहीं हैं।’ .

उसने अपनी प्रशंसा को अनसुना-सा करती हुई उससे कहा- तुमने तो एजेड लोगों की सहायता का बीड़ा उठाया है न? मैं तो तुम्हें कॉलेज का लड़का समझी थी, जिसने कॉलेज की विविध गतिविधियों में से ‘सोशल वर्क’ को चुना हो। दरअसल, कॉलेज में हमने ‘हेल्पेज’ के लोगों को लेक्चर्स के लिए बुलाया था, उनके अनुसार स्कूल-कॉलेजों से उनसे जुड़े लड़के-लड़कियां अकेले जरूरतमंद बूढ़े-बूढ़ियों को अपनी गतिविधि के तौर पर अपना लेते हैं, तुम भी क्या ऐसे ही एक्टिविस्ट हो? अपने बारे में कुछ बताओ। कश्मीर से हूं। (कश्मीर शब्द सुनते ही वह घबरा गई। कहीं यह आतंकवादी तो नहीं! वह डर गई।) वह युवक बिना उसकी तरफ देखे, कुछ कह रहा था। पर अपनी आशंका और घबराहट में कुछ भी ग्रहण न करते हुए- कानों में आ पड़े शब्दों को जोड़ते हुए उसने यह समझा और जाना कि वह युवक कश्मीर में पोस्टेड आर्मी आॅफिसर का बेटा है, जिसने आइआइएम से मास्टर्स किया और अच्छी प्लेसमेंट को ठुकरा कर सेवा कार्य को अपना लिया। वह बोल रहा था- ‘मैम, आपने भी देखा होगा कि सर्दियों की तीखी ठंड और गर्मियों की झुलसाती धूप और लू में अकेले रहते बजुर्ग कितने असहाय और बेबस हो जाते हैं।’

पर मन के आशंकित हो जाने से वह उस युवक पर विश्वास नहीं कर पा रही थी। उसने उसे ऊपर आने ही क्यों दिया। उसे बाहर कैसे किया जाए, सोचते हुए, प्रकट रूप में उससे कह रही थी- ‘संभावनाओं से भरी अपनी इतनी अच्छी नौकरी छोड़ तुमने इस सेवाकार्य को अपनाया इसके लिए शाबाशी। बूढ़ों के प्रति तुम्हारी यह करुणा बनी रहे! मैं चाय बना कर लाती हूं, फिर और बात करते हैं।’ कहते हुए वह किचन में आ गई थी। गैस पर चाय के लिए पानी रख कर वह सोचने लगी कि क्या वह पुलिस को फोन करे? पर इस सोच को झटक प्लेट में बिस्कुट रख, दूसरे हाथ से लैंड लाइन के हैंडसेट को कान से लगा कर कुछ ऊंची आवाज में बोलने लगी, ताकि वह युवक भी उसकी बात सुन सके- ‘आपके घर में आज शाम एओएल की लघुक्रिया का फॉलोअप है, बताने के लिए धन्यवाद, मैं जरूर आऊंगी।’

चाय की ट्रे वह मेज पर रख रही थी कि युवक ने उससे पूछा- ‘मैम आप श्रीश्री रविशंकर की ‘सुदर्शन क्रिया’ वाली लघुक्रिया की बात कर रहीं थी न, जय गुरुदेव, मैंने भी उनका बेसिक कोर्स किया हुआ है।’ सुन कर उसे अच्छा लगा, आश्वस्त-सी हुई कि अब इस युवक से कोई डर नहीं, क्योंकि वह भांप गई थी कि इन जैसे युवको ने सेवा जैसे कार्य को भी बाजार में उतार दिया है।चाय के कप को मेज पर रख, युवक अपने आॅर्गेनाइजेशन की उपलब्धियों, चित्रों, सूचियों द्वारा पूरी ऊर्जा से प्रभावित करने की कोशिश ही नहीं कर रहा था, पूरी उम्मीद से कह रहा था- ‘आप जैसी संवेदनशील महिला हमारी संस्था को भरपूर सहायता देगी।’
उसके मन में आया कि उससे कह दे कि उसने तो उसमें अपने बेटे की झलक देखते हुए दरवाजा खोल दिया था। नहीं, गलती से भी युवक को ऐसा संकेत नहीं मिलना चाहिए कि वह अकेली रहती है। संवेदना के नाम पर स्वार्थ साधने के लिए निकले युवक से वह बोली- ‘बच्चे तुम तो बूढ़ों के लिए करुणा रखते हो, तुम्हें तो यह समझना चाहिए कि इस उम्र में हम अपने आप को संभाल सकें यही बहुत बड़ी बात है। रही बात अपनी उम्र के जरूरतमंद साथियों की सहायता करने की, उसके लिए किसी संस्थान के माध्यम से परोक्ष सहायता के स्थान पर निजी तौर पर हम जो कर सकते हैं, करते ही हैं- उसको कहने-सुनने की जरूरत हम नहींं समझते।’
उसने देखा, युवक का मुंह फीका-सा पड़ गया था। दरवाजा बंद कर, सीढ़ियां चढ़ते हुए वह अपने से पूछ रही थी- ‘मैं जिंदगी को जी रही हूं, देख समझ रही हूं या केवल सामना कर रही हूं?