पंकज पराशर
पिछले दशकों में साहित्यिक लोकवृत्त में होने वाले वाद-विवाद आमतौर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ करते थे और सारा मामला साहित्य के दायरे तक सिमटा रहता था। श्लीलता-अश्लीलता की सीमा और लेखक की रचनात्मक स्वतंत्रता को लेकर होने वाली बहसें महीनों तक चलती थीं। सार्वजनिक और साहित्यिक मसलों पर शुरू होने वाली बहसें जब व्यक्तिगत हमले में रूपांतरित हो जाती थीं, तो साहित्यिक योद्धा अपने व्यंग्य वाण से ‘निराला’ को ‘अनोखे लाल’ बना देते थे और ‘उग्र’ के साहित्य को ‘घासलेटी साहित्य’ कह देते थे। जो लोग ऐसा मानते हैं कि आज के समाज में असहिष्णुता बढ़ गई है और पहले के समाज में सहिष्णुता बहुत थी, वे इस तथ्य को भूल रहे हैं कि इस्मत चुगताई, सआदत हसन मंटो, आदि को लंबे समय तक मुकदमे का सामना करना पड़ा। उनकी रचनाओं में यौनिकता और दैहिक संबंधों के वर्णन के औचित्य को तय करने के लिए लोग न्यायालय तक गए। यह बहस महज साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के दायरे तक सिमटी हुई नहीं रही। आज लेखकीय स्वतंत्रता की सीमा तय करने के लिए शायद ही किसी लेखक को न्यायालय तक घसीटा जाता हो।
राही मासूम रजा के उपन्यास ‘आधा गांव’ को जोधपुर विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में लगाया गया, तब भी उसमें गालियों/ भदेस शब्दों के प्रयोग के कारण अकादमिक और साहित्यिक हलके में अप्रियता की हद तक बहस चली थी कि इस उपन्यास को कक्षा में पढ़ाया जाए या नहीं। इसके लिए परंपरावादियों से लेकर प्रगतिशीलों तक की राय ली गई थी। तब भी यह मुद्दा जेरे-बहस था कि आखिर श्लीलता और अश्लीलता की सीमा क्या हो? रचनाकार की स्वंत्रतता और रचना की स्वाभाविकता के नाम पर ऐसी शब्दावली के प्रयोग को कहां तक जायज माना जाना चाहिए? बहस कई महीनों तक चली, जिसके कारण उपन्यास और आचार्य दोनों की बलि हुई थी, मगर यह मुद्दा अंतत: तब भी तय नहीं हो पाया था।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने बंगाल के भक्त कवियों और ‘अन्य’ लोगों द्वारा विद्यापति में भक्ति और आध्यात्म की गहराई देखे जाने को ‘आध्यात्मिक रंग के चश्मे’ का सस्ता हो जाना माना था। गोया प्रेम और शृंगार का भक्ति से वैर हो! स्थिति यह है कि तबसे लेकर आज तक परीक्षाओं में छात्रों से यह तय करने को कहा जाता है कि विद्यापति भक्त कवि थे या शृंगारिक?
यौनिकता और स्त्री-पुरुष संबंधों की स्वाभाविकता के मामले में हमारा समाज ऐसा है कि आज भी अनेक अध्यापक सहजता से विद्यापति को नहीं पढ़ा पाते हैं। प्रकृति और भक्ति से संबंधित उनकी कविता पढ़ाते-पढ़ाते, वे जैसे ही अभिसार और विशुद्ध शृंगार से संबंधित पद तक पहुंचते हैं, उनका गला सूखने लगता है। श्लीलता और अश्लीलता की बहस में यह देखना विडंबनापूर्ण लगता है कि जीवन और समाज में भले अश्लील चर्चाओं, द्विअर्थी बातों और गालियों की उपस्थिति हो, लेकिन साहित्य में कोई जिक्र नहीं होना चाहिए। क्योंकि पुस्तक चाहे धार्मिक हो या शुद्ध साहित्यिक, वह बहुत पवित्र चीज है और इसकी पवित्रता के लिए आवश्यक है कि ऐसे कुरुचिपूर्ण वर्णनों से वह पूर्णतया मुक्त हो।
इस प्रकार का सरलीकरण इन दिनों सिर्फ परंपरावादी नहीं, बल्कि समकालीन रचनाशीलता और समाज-बोध से परिचित कुछ विगत और अनुगत प्रगतिशील भी कर रहे हैं, जिनसे प्राय: अग्रगामी सोच की उम्मीद की जाती है। लेकिन उनके बीच भी कई नरम और गरम दल के लोग रहे हैं। क्योंकि भारतीय समाज जिस तरह के संस्कारों और परंपराओं के बीच बच्चों के मस्तिष्क को अनुकूलित करता है, परंपराओं से आबद्ध करता है, उसके बाद किसी विपरीत ध्रुवीय विचारधारा के संपर्क में आने के बाद भी उनकी सोच-समझ में कुछ विशेष अंतर आ पाना संभव नहीं होता। रामविलास शर्मा इसके एक उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी ही विचारधारा के लेखक यशपाल को ‘साड़ी-जंपर उतार लेखक’ कहा था। समकालीन परिदृश्य में अनेक वाममार्गी और वाम के प्रति सहानुभूति रखने वाले कवि-लेखक ही काशीनाथ सिंह, राजेश जोशी, कुमार अंबुज, शुभम श्री की रचनाओं में गालियों और अश्लील वर्णनों की कड़ी आलोचना कर रहे हैं। दरअसल, सोशल मीडिया और सूचना क्रांति के इस दौर में अतिरंजना और अतिवादिता का बोलबाला इतना बढ़ गया कि हर पक्ष के लोग किसी भी कीमत पर अपनी बात दूसरे पक्ष से मनवा लेना चाहते हैं। वे यह सोचने और मानने को तैयार ही नहीं हैं कि इसी भारतीय समाज में हमारे पूर्व पुरुषों ने कहा था, ‘मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना’ और ‘वादे वादे जायते तत्त्वबोध:’। परंपरागत ज्ञान की पद्धति भारत में इसलिए पनपी और फली-फूली, क्योंकि यहां वाद-विवाद और संवाद की प्राचीन परंपरा मौजूद थी, लेकिन पिछली दो सदियों में हमारी इस ज्ञान-संपदा की घोर उपेक्षा हुई है।
शास्त्रार्थ की जैसी गहरी परंपरा हमारे यहां मौजूद रही है, वैसी शायद कहीं और रही हो। प्रश्न करने की संस्कृति का ही प्रतिफलन भवभूति की रचनाओं, कबीर के पदों में दिखाई देता है। कोई भी वाद-विवाद और संवाद एकल दृष्टिकोण में संभव नहीं है, क्योंकि वाद एकवचन में नहीं, बहुवचन में जीवित रहता है। भारतीय ज्ञान-परंपरा में बहुवचन की परंपरा बहुत पुराने समय से विद्यमान है और अनेक वादों के फलने-फूलने के लिए अन्य वादों की उपस्थिति को अधिकतर प्रोत्साहित किए जाने की सूचना मिलती है। आलोचना ही नहीं, जीवन के किसी भी क्षेत्र में जब इतिहासबोध क्षरित होता है, तो स्मृतिहीनता बढ़ जाती है। ऊपरी तौर पर सब कुछ शांत और भला-भला दिखाई देता है, लेकिन इस शांति से न आलोचना का भला होता है, न लोकतंत्र का। लोकतंत्र और जनतंत्र का आज हम चाहे जितना शोर मचा लें, सच्चाई यह है कि तमाम संस्थाओं, विचारों और सार्वजनिक बहसों में लगातार लोकतंत्र क्षरित हुआ है। हमेशा पुरातनता में रूढ़िवादिता हो और आधुनिकता में प्रगतिशीलता, ऐसा नहीं है। किसी मामले में पुरातन काल प्रगतिशील नजर आता है, तो किसी मामले में आधुनिक काल अत्यंत पुरातन और रूढ़िवादी। चार्वाक, कबीर, तुलसी, मीर, और गालिब ने जैसी रचनात्मक और अभिव्यक्ति की छूट ली थी, वैसी आज उन्हें शायद नहीं मिल पाती। रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर आज मांसल सौंदर्य, स्त्री-पुरुष संबंधों के उन्मुक्त वर्णन और गालियों के औचित्य को सिद्ध करने के लिए इसके पक्षकार कालिदास के ‘कुमारसंभवम्’, विद्यापति की ‘पदावली’ और ‘दुर्गा सप्तशती’ के वर्णनों को उद्धृत करते हैं, वहीं दूसरे पक्ष के लोग साहित्य की पवित्रता और पावनता का हवाला देकर इससे पूरी तरह मुक्त रचना के सृजन की वकालत करते हैं।
इस सबके बीच प्राय: इस तथ्य को प्राय: अनदेखा किया जा रहा है कि किसी चीज की स्वीकार्यता और अस्वीकार्यता के पीछे कई तरह की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कारक होते हैं, जिनके कारण कोई चीज एक समय जहां अश्लील मानी जाती है, वही बाद में नहीं मानी जाती। यही स्थिति स्त्री-पुरुष संबंधों के वर्णन के मामले में भी है। हिंदी की एक नवोदित कवयित्री ने देवी सरस्वती के अंगों-उपांगों का जिस तरह अति उन्मुक्त भाव से अपनी कविता में वर्णन किया है, वह अनेक कारणों से जरूरी और उचित नहीं लगता। हालांकि इन वर्णनों से किसी धर्म की सुरक्षा या खतरे का कोई लेना-देना नहीं है, बावजूद इसके इस चीज पर बहस जरूर होनी चाहिए कि वर्तमान संदर्भ में किसी चीज की कोई सीमा हो या नहीं। ०
